संसदीय चुनाव से डेढ़ लाख करोड़ रुपये खर्च होने की उम्मीद

नई दिल्ली चार माह बाद होने वाले संसदीय चुनाव से बाजार गुलजार रहेगा। चुनाव करीब डेढ़ लाख करोड़ के व्यापार का अवसर प्रदान करेंगे। इस दौरान चुनाव आयोग, सरकारी विभाग, प्रत्याशियों और सियासी दलों द्वारा भरपूर खर्च किए जाने की उम्मीद है और इससे करोड़ों लोगों को रोजगार मिलेगा। लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र प्रदेश, ओडिशा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश विधानसभा के चुनाव होने हैं। आम चुनाव के 6 से 8 महीने बाद महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा, बिहार और दिल्ली में चुनाव हुए थे। दिल्ली को छोड़ अन्य चारों राज्यों की सरकारें समय से पहले विधानसभा भंग कर लोकसभा के साथ चुनाव करा सकती हैं। चुनावी खर्च का आकलन करने वाली संस्था सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) के अनुसार इस साल के शुरू में हुए कर्नाटक विधानसभा के चुनाव अब तक के सबसे महंगे चुनाव थे।

चुनाव में जितने ज्यादा दल होंगे, उतना ज्यादा खर्च होगा। विधानसभाओं के चुनाव खर्च को देखते हुए यदि अगले लोकसभा चुनाव में भी इसी तरह खर्च किया गया, तो सवा से डेढ़ लाख करोड़ रुपया बाजार में आएगा। – डॉ. एन भास्कर, सीएमएस निदेशक

कर्नाटक चुनाव में करीब 10,500 करोड़ रुपये खर्च होने की उम्मीद है तो वहीं उत्तर प्रदेश के चुनाव में 6050 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इसी तरह तेलंगाना चुनाव में 6000 करोड़ रुपये तो राजस्थान-मध्यप्रदेश चुनाव में 6000 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।

हवाई यात्रा और विज्ञापन पर सबसे ज्यादा खर्च
पार्टियां सबसे ज्यादा खर्च विज्ञापन और हवाई यात्राओं पर करती हैं। हेलीकॉप्टर का किराया दो लाख रुपये प्रति घंटा तक है, जबकि हवाई जहाज का किराया साढ़े तीन लाख रुपये प्रति घंटा तक है। यानी एक जहाज का किराया औसतन सोलह लाख रुपये प्रतिदिन है। लोकसभा चुनाव में 125-130 हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर प्रतिदिन उड़ान भरते हैं और यह सिलसिला डेढ़ से दो महीने तक लगातार चलता है।

इसी तरह प्रचार माध्यमों टीवी, रेडियो, अखबार और इंटरनेट के जरिये मतदाताओं को रिझाने का काम होता है। प्रचार के प्रभावी माध्यम थ्री-डी प्रोजेक्टर और सोशल मीडिया की पहुंच जितनी व्यापक है, उतने ही ये महंगे भी हैं। इनके अलावा झंडे, बैनर से लेकर रैली के लिए कुर्सी, टेंट लगाने पर खर्च। कार्यकर्ताओं के खाने-पीने का खर्च भी हर दिन लाख रुपये तक पहुंच जाता है।

सीमा 70 लाख, खर्च असीमित
हर लोकसभा क्षेत्र में चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा 70 लाख रुपये है, लेकिन पार्टियों के खर्च की कोई सीमा नहीं है। केंद्रीय नेताओं की हवाई यात्राओं का खर्च और विज्ञापनों का खर्च पार्टी उठाती है। सीएमएस के निदेशक कहते हैं कि अब दल कम खर्च कर रहे हैं, उम्मीदवार ज्यादा।

बढ़ता खर्च
जहां 1951 में प्रति वोटर 60 पैसे खर्च आया था, 2009 में यह 12 रुपये प्रति मतदाता था, जो 2014 में बढ़कर 17 रुपये हो गया। लेकिन कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में 5.06 करोड़ वोट पड़े और खर्च 10500 करोड़ रुपये था। यानी प्रति मतदाता 2100 रुपये खर्च करना पड़ा।