नाथ सरकार के लिए मुसीबत बनी 6600 किलोमीटर की सडक़ें

प्रदेश में बीते डेढ़ दशक तक सत्ता में रही भाजपा सरकार की कार्यशैली की वजह से प्रदेश की नई सरकार को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी खजाने की माली हालत बेहद खराब होने की वजह से प्रदेश के कई विकास कम ठप पड़े हैं। इसका असर प्रदेश की खराब सडक़ों पर भी पड़ा है। अब कुछ माह बाद ही लोकसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी मुसीबत खराब सडक़ों को लेकर खड़ी हो गई है। वजह है चुनाव के दौरान सडक़ों का सियासी मुद्दा

बनने की संभावना। दरअसल प्रदेश की 6600 किमी सडक़ों की स्थिति काफी नाजुक है, इनमें भी 3000 किमी लंबाई वाली करीब एक हजार सडक़ें तो चलने लायक ही नहीं बची हैं। बीते भाजपा सरकार के दौरान लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने इनके लिए एक साल पहले टेंडर जारी कर काम शुरू कर दिया था, लेकिन राशि के अभाव में विभाग ठेकेदारों का भुगतान नहीं कर सका, लिहाजा काम बीच में बंद हो गया। इंदौर में 92 और भोपाल संभाग में 100 सडक़ों के रखरखाव और मरम्मत का काम भी बंद है। हालांकि कमलनाथ सरकार ने इन सडक़ों के लिए अनुपूरक बजट में 100 करोड़ रुपए दिए हैं। पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों का कहना है कि इन सडक़ों को बनाने के लिए सरकार को 4 हजार करोड़ रुपए की डिमांड दी है। अनुपूरक बजट में भी एक हजार करोड़ रुपए मांगे गए थे लेकिन सिर्फ 10 फीसदी ही राशि मिल पाई है।
भाजपा सरकार में बिना बजट जारी हुए थे टेंडर
पीडब्ल्यूडी के सूत्रों का कहना है कि पिछली सरकार ने विस चुनाव के चलते दो से 10 किमी तक की जर्जर सडक़ें बनाने के लिए बिना बजट आवंटन के टेंडर जारी कर दिए थे। विभाग ने तत्कालीन मंत्रियों के दबाव में आकर आचार संहिता से पहले 1548 सडक़ों के टेंडर इस तरह जारी कर दिए। ठेकेदारों ने काम भी शुरू किया लेकिन अब उन्हें पैसा नहीं मिला तो काम रोक दिया। इसमें मात्र ढाई सौ सडक़ें ही बन पाई हैं। इधर संंबंधित अधीक्षण यंत्री इस बात को लेकर परेशान हैं कि अगर ठेकेदारों का समय पर भुगतान नहीं किया गया तो सडक़ की निर्माण लागत को बढ़ाना पड़ सकता है।
कहां क्या स्थिति
संभाग बनाना था इतनी बनी
भोपाल 455 83
इंदौर 214 38
जबलपुर 148 20
ग्वालियर 240 31
रीवा 152 28
सागर 122 18
उज्जैन 217 30