मध्य प्रदेशः टूट गई परंपरा.

परंपरा के विपरीत जाकर कांग्रेस ने स्पीकर और डिप्टी स्पीकर दोनों पद अपने पास रखे.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार को मिला मामूली बहुमत राज्य विधानसभा की विधायी परंपराओं पर भारी पड़ रहा है. विपक्ष को डिप्टी स्पीकर का पद देने की परंपरा करीब 29 साल से चली आ रही थी. लेकिन कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार हिना कावरे को इस पद पर नियुक्त कर इस परंपरा को खत्म कर दिया.

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने साल 1990 में यह परंपरा शुरू की थी कि राज्य में स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चयन आम सहमति से किया जाएगा. उनके बाद की सरकारों में—दो बार दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली और तीन बार शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहने के दौरान—इस परंपरा का पालन किया जाता रहा.आधिकारिक तौर पर कांग्रेस का दावा है कि स्पीकर पद के लिए उम्मीदवार खड़ा करके पहले भाजपा ने इस परंपरा को तोड़ा है और आम सहमति से चुनाव की तय परंपरा से अलग हटी है. दरअसल, चुनाव से एक दिन पहले भाजपा ने स्पीकर पद के लिए पूर्व मंत्री और आदिवासी विधायक कुंवर विजय शाह को अपना उम्मीदवार घोषित किया था. हालांकि, अंत में भाजपा विधायक विधानसभा से वॉकआउट कर गए और कांग्रेस उम्मीदवार एन.पी. प्रजापति 120 वोटों से जीत गए. उन्हें सदन में कांग्रेस, बसपा और सपा सहित निर्दलीयों के भी वोट मिले.

दो दिन बाद कांग्रेस ने यह आरोप लगाते हुए कि भाजपा उसके विधायकों को तोड़ रही है, घोषणा की कि वह डिप्टी स्पीकर का पद भी अपने पास रखेगी. प्रजापति के चुनाव के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा, ”राजनीति में काफी कुछ बदल गया है, अब समय काफी अलग है.” इस तरह उन्होंने पहले ही यह संकेत दे दिया था कि डिप्टी स्पीकर के मामले में क्या होने वाला है.

कई लोग यह मानते हैं कि अपने मामूली बहुमत को देखते हुए ही सत्तारूढ़ कांग्रेस ने दोनों पद झटक लिए हैं. पूर्व मंत्री और भाजपा के विधायक विश्वास सारंग कहते हैं, ”कांग्रेस तो भाजपा को डिप्टी स्पीकर के पद से वंचित करने का बस बहाना ढूंढ रही थी.” उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस नहीं चाहती थी कि भाजपा को यह पद मिले क्योंकि सदन की कार्यवाही के दौरान यदि कभी डिप्टी स्पीकर डिविजन की मांग कर देते तो कांग्रेस सरकार के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती थी.

कावरे के डिप्टी स्पीकर चुने जाने के बाद दिग्विजय सिंह ने कहा, ”पुरानी भाजपा अब अतीत की बात हो चुकी है, जिसमें सुंदर लाल पटवा जैसे नेता थे.” उन्होंने कहा कि ‘नई भाजपा’ ने किसी भी तरह से परंपराओं का पालन नहीं किया. भाजपा ने दोनों पदों पर अपने उम्मीदवार उतारे, जबकि उसके पास आंकड़े नहीं हैं. भाजपा के सूत्रों के मुताबिक, पार्टी की राज्य इकाई इस पर एकमत नहीं थी और कई विधायक उम्मीदवार उतारने के पक्ष में नहीं थे, पर आखिरकार सबको केंद्रीय नेतृत्व की बात माननी पड़ी.

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