जो योग समूह में सिखाया जाया है, वह योग किसान द्वारा किये जाने योग्य नहीं होता. तो पेश है योग के ये आठ अंग, ख़ास किसान भाइयों के लिए….

व्यंग्य: आत्महत्या करते किसानों का ‘अष्टांग योग’

“किसान भाइयों से बेहतर योग की व्याख्या पतंजलि भी नहीं कर सकते. योग यानी जोड़ना. जैसे फसल की बुआई के लिये, बेटी की शादी के लिए, साहूकार के ब्याज के लिए पाई पाई जोड़ना. खाद, पानी के लिए पहले गाँव के ठाकुर साब के हाथ जोड़ना, अब बैंकों और सरकार के आगे हाथ जोड़े रहना. इन सारी यौगिक क्रियाओं से जब किसान ऊपर उठ जाता है तो साधक अंत मैं आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का उपक्रम, यानी ‘आत्महत्या‘ करता है. आखिर, यही तो योग का मूल है.”

लोग जो भी कहें और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर बाबा आरामदेव हाजिर हैं किसानों के लिए आष्टांग योग लेकर –

हमारे ऋषि मुनियों ने योग के द्वारा शरीर मन और प्राण की शुद्धि तथा परमात्मा की प्राप्ति के लिए आठ प्रकार के साधन बताएँ हैं, जिसे अष्टांग योग कहा गया है. यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि.

चूंकि, आज योग की सर्वाधिक जरूरत किसानों को ही है. हर दिन किसान मर रहे हैं. जाने किसको किसको उनके शरीर, मन और प्राण की चिंता खाए जा रही है. अगर यह शुद्ध नहीं हुए तो मरने के बाद क्या मुंह दिखाएँगे ईश्वर को? उसका शुद्धिकरण जरूरी है. जो योग समूह में सिखाया जाया है, चूंकि वह योग किसान द्वारा किये जाने योग्य नहीं होता. तो पेश है योग के ये आठ अंग, ख़ास किसान भाइयों के लिए….

यम
यम, अर्थात यमराज. क्योंकि ऐसी मान्यता है कि किसान धरती पर नर्क भोगकर इतना अभ्यस्त हो जाता है कि यमराज सहर्ष उसे नरकलोक लेकर जाते हैं. वैसे यम के पांच भाग होते हैं
अहिंसा
अहिंसा अर्थात शब्दों से, विचारों से और कर्मों से कभी सरकार को हानि न पहुंचाना. महात्मा गाँधी के बताये रास्ते पर चलना. ‘कुविचार हिंसा है, उतावलापन हिंसा है, मिथ्याभाषण हिंसा है, द्वेष हिंसा है, किसी का बुरा चाहना हिंसा है, जिसकी दुनिया को जरूरत है उस पर कब्जा रखना भी हिंसा है, इसके अतिरिक्त किसी को मारना, कटुवचन बोलना, दिल दुःखाना, कष्ट देना तो हिंसा है ही. इन सबसे बचना अहिंसा पालन कहा जायेगा. अहिंसा किसान का धर्म है. उसे गौरक्षक नहीं गौ पालक बनकर रहना चाहिए. नीलगाय भले ही पूरा खेत चर जाए, लेकिन किसान को उसे डंडा मारने का कोई हक़ नहीं. गोली चलती रहे, पर हिंसा की सोचना… यहाँ तक कि अपनी जान बचाना ‘अहिंसा’ की श्रेणी में नहीं आएगा. हम तो कहते हैं कि उसके मच्छर मारने पर भी प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए. मच्छर किसान को मारने में सरकार का सहयोग करता है.

सत्य
जो बात हमारे धर्म ग्रंथों में कही गयी है वो सत्य है या फिर हम जो कहते हैं वो? जैसे गंगा स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होना, व्रत, उपवास रखने से स्वर्ग मिलना, गौ दान से वैतरणी तर जाना, मूर्ति पूजा से मुक्ति प्राप्त होना, यह सब बातें सत्य हैं. देश के नेता असत्य भी देश हित में ही बोलते हैं. जैसे बच्चे के फोड़े पर मरहम पट्टी करते हुए डॉक्टर उसे दिलासा देता है -बच्चे! डरो मत, जरा भी तकलीफ न होगी. बच्चा उसकी बात पर विश्वास कर लेता है, किन्तु डॉक्टर की बात झूठी निकलती है. मरहम पट्टी के वक्त बच्चों को काफी तकलीफ होती है, वह सोचता है कि डॉक्टर झूठा है, उसने मेरे साथ असत्य भाषण किया परन्तु असल में वह झूठ बोलता नहीं है. ठीक इसी तरह जब तुम कर्जे में डूब जाते हो तो हम कहते हैं की परेशान मत हो, हम तुमारा कर्ज माफ़ कर देंगे. इससे तुम्हारे मन में विशवास जाग जाग जाता है. और कुछ दिनों के लिए आत्महत्या के कार्यक्रम को स्थगित कर देते हो. तुमको यह मर्म भी समझना होगा की पवित्र उद्देश्य के साथ निःस्वार्थ भाव से परोपकार के लिए बोला हुआ असत्य भी सत्य है और बुरी नीयत से, स्वार्थ के वशीभूत होकर पर पीड़ा के लिए बोला गया सत्य भी असत्य है. अगर आपने किसी छुट्टा सांड का पता कसाईबाड़े वाले को दिया तो यह सत्य भी पाप की श्रेणी में आता है. किसान को हमेशा परम सत्य में स्थित रहना चाहिए. और परम सत्य तो एक ही है-मृत्यु. अतः …

अस्तेय
चोरी न करना, अस्तेय का यही संक्षिप्त अर्थ है. पराई चीज को बिना उसकी आज्ञा के गुप्त रूप से ले लेने को चोरी कहते हैं. किसान को चोर प्रवृत्ति का नहीं होना चाहिए. उसे भैंस खरीदने के नाम पर लोन लेकर बैंक वालों से नज़रें नहीं चुरानी चाहिए. पशुओं का दूध, भेड़ के बाल, मक्खियों का शहद, आदि चीजें पराई हैं. तुम पहले भेड़ों, गायों से एनओसी लिया करो. जो कुछ तुमको मिल रहा है उसके बारे में विचार कीजिए कि क्या वास्तव में इस वस्तु पर मेरा धर्म पूर्वक हक है? किसी दूसरे का भाग तो नहीं खा रहा हूँ? जितनी मुझे मिलनी चाहिए उससे अधिक कर रहा हूँ? अपने कर्तव्य में कमी तो नहीं ला रहा हूँ? जिनको देना चाहिए उनको दिए बिना तो नहीं ले रहा हूँ? याद रखो किसी का ताला तोड़कर या जेब काटना चोरी भले न हो लेकिन कर्तव्य में त्रुटि रखना और खाने भर से अधिक संचय करना घनघोर चोरी है.

ब्रह्मचर्य
किसान देश के लिए अन्न पैदा करता है. जैसा आप खाते हैं वैसी ही मानसिकता का निर्माण होता है. एक ब्रम्हचारी जब अनाज उपजा कर देगा तो देश में दुराचार बलात्कार अपने आप बंद हो जायेंगे. किसान को इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए. शहर के पिज्जा, हॉट डॉग, बर्गर आदि देखकर जीभ न लपलपाए. इसके लिए उसे अपने क़दमों पर काबू रखना चाहिए. बेहतर तो यह हो कि किसान को शहर जाना ही नहीं चाहिए.

अपरिग्रह
अर्थात आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना. किसान को अपना सारा अनाज जमाखोरों के हवाले कर देना चहिये, क्योंकि संचय करना उसका काम है. किसान तो उत्पादक है. कहा भी गया है- वृक्ष कबहूँ न फल भखे नदी न संचे नीर. परमारथ के कारने कृषक धरेव शरीर.

तो किसान को ‘यम’ के इन पाँचों नियमों का बिना फल की इच्छा किये पालन करते रहना चाहिए. योग का यह पहला अध्याय है.

नियम
यम के बाद आती नियम की बारी आती है. इन नियमों के सम्यक पालन द्वारा ही किसान परम मुक्ति को प्राप्त होता है. यह भी पांच प्रकार के हैं-

शौच
यह लोटा उठाकर गाँव से दो किलोमीटर दूर अंजाम दी जाने वाली अनैच्छिक क्रिया है. सरकार जानती है कि किसान मिट्टीजीवी जीव है. शौच के बाद दैहिक संतुष्टि उसे खेत में ही निवृत्त होकर मिलेगी.सीमेंटेड सरकारी शौचालय तो सिर्फ बजट के उपयोग हेतु बनवाये जाए हैं, किसानों के उपयोग हेतु नहीं. कुछ जागरूक किसान तो शौचालयों को ही गोदाम बना लेते हैं.

संतोष
किसान को मुआवजा मिले न मिले, कर्ज माफ़ हो न हो, खलिहान में आग लग जाए या न लगे, हर हाल में संतोष रखना चाहिए.

तप
किसान को तपस्वी होना चहिये. देह को गर्मी और लू के बीच तपाना चाहिए.जैसा वह हमेशा करता है, करते रहना चाहिए ‘निष्काम’ होकर. इस तप को बरकरार रखते हुए बुखार में दवा ही नहीं खानी चाहिए.

स्वाध्याय
अब चूंकि गाँवों में स्कूल कॉलेज तो हैं नहीं, इसलिए किसान को स्वाध्याय में यकीन रखना चाहिए और उसका एक ही मतलब है कि सरकारी योजनाओं में उसे पूरा विश्वास रखना चाहिए.

ईश्वर -प्रणिधान
यानी ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा. उसमें विलीन होने के तीव्र उत्कंठा.

आसन
आसन और अनशन का धनिष्ठ सम्बन्ध है. दोनों खाली पेट किये जाते हैं. किसान को इन दोनों की साधना आना चाहिए. किसानों के लिए कुछ ख़ास आसन पेश हैं:

प्रताड़ासन
यह किसान का प्रिय आसन है. इसके करने का कोई समय निर्धारित नहीं है. इसमें मुर्गासन की स्थिति में सांस अन्दर खींचकर पीठ पर एक वजनदार नेता को बिठाना पड़ता है. आरम्भ एक मिनट से करें फिर धीरे धीरे समय सीमा बढ़ाते जाएं. पीठ पर पढने वाले वजन से स्नायु तंत्र मजबूत होता है. शरीर की गांठे खुलती हैं. पीठ में इतना प्रचंड दर्द होता है कि आप तमाम छोटे छोटे दर्दों से मुक्ति पा जाते हैं.

घुटनाटेकासन
यह अलसुबह किसी सरकारी दफ्तर के बाहर किया जाने वाला आसन है. इसमें दोनों घुटनों को 45 अंश पर मोड़कर फिर हाथ जोड़कर जय जयकार करनी पड़ती है. यह आसन करने से सरकारी अफसर शीघ्र प्रसन्न होते हैं. लाभ और पुण्य की प्राप्ति होती है. सरकारी तंत्र मजबूत होता है और किसानों का स्वाभिमान-तंत्र कमजोर होता है.

पेटखलासन
इस आसन में भूखे पेट जोर जोर से नारे तब तक लगाने होते हैं जब तक कि पुलिस लात घूंसे न बरसा दे. पेट पर लात पड़ने से उदर विकार दूर होते हैं. पेट साफ होता है, मांसपेशियां मजबूत होती हैं. वायु विकार दूर समाप्त हो जाता है.

हलमृतासन
यह आर्थिक संबल प्रदान करने वाला होता है. इसे करने के लिए आपके पास एक हल का होना अनिवार्य है. हल को उलटा करके जमीन में गाड़ दें. फिर उसके एक छोर पर फांसी का फंदा लगाकर उसमें गले को फंसायें और अपनी सांस छोड़ते हुए तक तक खींचें जब तक की सांस आपको न छोड़ दे. इस आसन को करने से किसान की आने वाली पीढी का भविष्य उज्ज्वल हो जाता है, क्योंकि गुजारा करने लायक रकम मिल जाती है.

अच्छे दिनासन
इस रात्रिपहर में करना वर्जित है. किसी पेड़ पर वृक्षासन की मुद्रा में बैठ कर खेचरी मुद्रा में जीभ आगे निकालकर सांस बाहर निकालते हुए पांच बार यह मंत्र बोलना है –अच्छे दिन आयेंगे. जैसे जैसे सरकार का कार्यकाल आगे बढे, इस मंत्र के जाप की संख्या बढाते जायें. अगर जीभ निकालने में कोई समस्या हो तो पेड़ से सीधे नीचे कूद जाएँ. इस आसन से बेहद लाभ होगा. अवश्य होगा. समय और तारीख नहीं बताऊंगा. अच्छे दिन की डेट और समय बताया गया था क्या ?

अर्धगोलिकासन
यह आसन किसानों के विरोध प्रदर्शन के लिए महत्वपूर्ण है. इसमें शरीर को 360 डिग्री घुमाते हुए लहराना होता है, किसी सांप की तरह से. इसके लिए पहले भुजंगासन का अभ्यास जरूरी है. यह आपकी रीढ़ की हड्डी (अगर बची है तो)को लचीला बना देगा और मांसपेशियों को लिजलिजा. जब तुम पर गोली दागी जायेगी तो तुम अपने शरीर को सिकोड़ लोगे. और बच जाओगे. ऐसा नहीं कि गोली लगेगी नहीं. लगेगी लेकिन आधी. यूँ समझ लो छूकर निकल जायेगी. क्योंकि मरने पर मुआवजा ज्यादा देना पड़ता है.

शवासन
यह मृत्यु शैया पर जाने के पूर्व किया जाने वाला आसन है. किसान आये दिन अनशन करता है. लेकिन जान नहीं निकलती है. निकलती भी है तो शरीर को महान कष्ट देकर. शवासन की मुद्रा में अनशन करने से आत्मा आसानी से शरीर को छोड़ देती है. शरीर को सारी अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं. आत्मा के रास्ते में आने वाली सारे अवरोधों से मुक्ति मिल जाती है.

अष्टांग योग के अंतिम पांच चरण हैं- प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि. यानी समाधि तक जाने के लिए इन रास्तों से गुजरना पड़ता है, लेकिन अगर आप उपरोक्त आसन साध ले गए तो प्राणायाम आदि करने की जरूरत नहीं. सीधे समाधिस्त हो जायेंगे.

ॐ श्री किसान योगाय नमः

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