राष्ट्रवाद पर भारी पड़े जाट-मुस्लिम

नई दिल्ली। हरियाणा में इस बार 75 पार का नारा देने

वाली भाजपा अपना पुराना प्रदर्शन भी नहीं दोहरा पाई, जबकि करीब पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने विपक्ष का सूपड़ा साफ करते हुए राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से 79 पर बढ़त हासिल की थी। दरअसल, इस विधानसभा चुनाव में भाजपा के राष्ट्रवाद के मुद्दे पर जाट-मुस्लिम-दलितों की एकजुटता भारी पड़ गई। बाकी रही सही कसर अति आत्मविश्वास, गुटबाजी, गलत टिकट वितरण और कार्यकर्ताओं से दूरी ने पूरी कर दी। पार्टी के रणनीतिकारों का कहना है कि राज्य में पार्टी के बुरे प्रदर्शन के पीछे महज पांच महीने पहले लोकसभा में मिली प्रचंड जीत है। इस जीत के कारण न सिर्फ राज्य सरकार और राज्य इकाई पीएम नरेंद्र मोदी के करिश्मे के भरोसे ढीली पड़ गई, बल्कि टिकट वितरण में भी लापरवाही बरती गई।
कई बड़े नेताओं ने अपने समर्थकों को टिकट न मिलने पर उन्हें निर्दलीय के रूप में चुनाव मैदान में न सिर्फ उतारा बल्कि अंदरखाने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ जमकर समर्थन भी दिया। इसका परिणाम यह रहा कि लोकसभा चुनाव में 55 फीसदी वोट हासिल करने वाली पार्टी को इस चुनाव में करीब 20 फीसदी वोटों का नुकसान हुआ।
टिकट वितरण में खामी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बतौर बागी मैदान में उतरे भाजपा नेताओं ने पृथला, पुंडरी, महम और दादरी में बाजी मारी और इसके अलावा आधा दर्जन सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों की जीत की संभावनाओं पर पानी फेर दिया।
बीते चुनाव में भाजपा ने खुलकर जाट बनाम गैर जाट की राजनीति नहीं की थी लेकिन इस बार इसका उल्टा था। इस कारण जाट और मुसलमान बिरादरी ने भाजपा के खिलाफ रणनीतिक तौर से वोटिंग की, जबकि कई सीटों पर दलित बिरादरी जाट और मुसलमान के साथ खड़ी हो गई। यही कारण है कि पार्टी के ज्यादातर जाट विधायक, मंत्री और उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा।

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