जिसे वनमंत्री सिंघार ने माना दोषी उसे कमलनाथ ने दी क्लीनचिट

भोपाल (मंगल भारत)। कमलनाथ सरकार के अंदर

जारी खींचतान समाप्त होने की जगह बढ़ती ही जा रही है। इसका फायदा प्रदेश की नौकरशाही को मिल रहा है। इसके चलते प्रदेश के मंत्री अपने आप को भी असहाय पाने लगे हैं। हालात यह हैं कि जिन अफसरों के खिलाफ मंत्री कार्रवाही करने की अनुशंसा करते हैं उन पर या तो कार्रवाही होती नहीं है, अगर करनी भी पड़ जाए तो आला अफसर उसे मुख्यमंत्री स्तर से क्लीनचिट दिला देते हैं। इसकर वड़ा उदाहरण वन महकमा है। विभाग के मंत्री उमंग सिंघार विभाग में कसावट और काम की गुणवत्ता सुधारने के लिए अफसरों-कर्मचारियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की अनुशंसा कर रहे हैं, लेकिन सचिवालय स्तर पर उनके आदेशों को खारिज कर दिया जाता है। ऐसा ही ताजा मामला हाल ही में सामने आया है, जिसमें उन्हें मुंह की खानी पड़ी है। इस बार मंत्री ने एक बाघिन को शिफ्ट करने के आदेश में लापरवाही सामने आने पर विभाग प्रमुख (हॉफ) डॉ. यू. प्रकाशम् के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए विभाग के अपर मुख्य सचिव (एसीएस) एपी श्रीवास्तव को लिख दिया। नोटशीट जब एसीएस के पास पहुंची, तो उन्होंने इसे लिपिकीय त्रुटि बताते हुए फाइल बंद करने की अनुशंसा कर दी। मुख्यमंत्री भी एसीएस के इस तर्क से सहमत हुए और उन्होंने ये फाइल बंद कर दी।
पौधारोपण घोटाले की जांच ईओडब्ल्यू को सौंपने संबंधी निर्देशों का पालन करने में देरी से मंत्री सिंघार और एसीएस श्रीवास्तव के बीच शुरू हुआ विवाद अब चरम पर है। मंत्री मैदानी अधिकारियों से लेकर वन बल प्रमुख तक पर कार्रवाई के लिए लिख चुके हैं, लेकिन किसी पर आंच नहीं आई। ताजा मामला हॉफ को लेकर ही है। करीब ढाई साल पहले मादा बाघ शावक को रेस्क्यू कर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व भेजा गया था। उसे बहेरहा स्थित बाड़े में रखा था। युवा होने पर उसे नौरादेही अभ्यारण्य में छोडऩे का फैसला लिया। डॉ. प्रकाशम् ने चीफ वाइल्ड लाइफ वॉर्डन रहते हुए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 11(1)(ए) का हवाला देते हुए 13 सितंबर 2019 को बाघिन की शिफ्टिंग के आदेश जारी कर दिए। जब यह आदेश वनमंत्री तक पहुंचा, तो उन्होंने आपत्ति उठाई। उनका कहना था कि अधिनियम की इस धारा में शिफ्टिंग का प्रावधान ही नहीं है। धारा 12 (बीबी)(आई) में शिफ्टिंग की जा सकती है। इस आपत्ति के बाद हॉफ ने 20 सितंबर को संशोधन आदेश जारी कर दिया। मामले को गंभीरता से लेते हुए मंत्री सिंघार ने एसीएस को नोटशीट भेजी। जिसमें इस गलती को गंभीर बताते हुए डॉ. प्रकाशम् के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने को लिखा। मंत्री ने यह भी लिखा कि डॉ. प्रकाशम् को नियमों और धाराओं का ज्ञान ही नहीं है। मामले में एसीएस ने मंत्री सिंघार के तर्कों को खारिज कर दिया। उन्होंने आदेश में हुए गलत धारा के उल्लेख को लिपिकीय त्रुटि बताया। साथ ही यह भी लिखा कि चीफ वाइल्ड लाइफ वॉर्डन के हस्ताक्षर से पहले आदेश का परीक्षण एपीसीसीएफ और अन्य अफसर करते हैं इसलिए इस त्रुटि के लिए सीधे तौर पर प्रकाशम् को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। एसीएस ने यह भी लिखा कि भारतीय सेवा के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान अखिल भारतीय सेवा अधिनियम में है। इसे लेकर राज्य शासन अलग से नियम नहीं बना सकता। इन तर्कों से सहमत होते हुए मुख्यमंत्री ने मामले की फाइल ही बंद कर दी है।
एसीएस के पास मिली फाइल
चीफ वाइल्ड लाइफ वॉर्डन सहित पीसीसीएफ स्तर के दो अन्य अफसरों की पदस्थी की फाइल एसीएस कार्यालय में मिली। यह फाइल करीब एक माह पहले चली है और बताया जा रहा था कि तभी से मंत्री कार्यालय में अटकी हुई है। जब मामला सामने आया, तो मंत्री कार्यालय से खोजबीन शुरू की। एसीएस कार्यालय में भी फाइल तलाशी गई। आखिर फाइलों के ढेर में वह फाइल भी मिल गई।

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