माननीयों का ही चरित्र तार-तार

कैसे रूकेंगे महिलाओं पर होने वाले अत्याचार…
महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग हर स्तर पर और हर मंच पर उठ रही है। संसद-विधानसभाओं में इस पर विशेष बहस हो रही है। लेकिन जो लोग बहस कर रहे हैं या कानून पर पक्ष-विपक्ष में दलीलें दे रहे हैं, वह कितने पाक साफ हैं? एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं पर अत्याचार के आरोपी सांसदों और विधायकों की संख्या सदन में लगातार बढ़ती जा रही है.


भोपाल (मंगल भारत)। मध्य प्रदेश सहित देशभर में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के खिलाफ लगतार प्रदर्शन हो रहे हैं। संसद से लेकर राज्यों की विधानसभाओं में देश में बढ़ते बलात्कार के मामलों पर चिंता जताई जा रही है। मंत्री, सांसद, विधायक और अन्य राजनेता एक स्वर में बोल रहे हैं कि महिलाओं पर अत्याचार करने वालों को सख्त से सख्त सजा दी जाए। लेकिन चिंताजनक बात यह है कि हमारे देश के माननीयों का ही चरित्र तार-तार है तो महिलाओं पर होने वाले अत्याचार कैसे रूकेंगे?
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार 2017 में देश में 28,947 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना दर्ज की गई। इसमें मध्यप्रदेश में 4,882 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटना दर्ज हुई, जबकि इस मामले में उत्तर प्रदेश 4,816 और महाराष्ट्र 4,189 की संख्या के साथ देश में दूसरे और तीसरे राज्य के तौर पर दर्ज किए गए हैं। ये आंकड़े चिंताजनक हैं। लेकिन इससे भी चिंताजनक बात यह है कि हमारे माननीय (सांसद और विधायक) भी महिलाओं से अपराध करने में पीछे नहीं हैं। महिलाओं से अपराध के आरोपी सांसदों की संख्या पांच साल में करीब साढ़े नौ गुना बढ़ गई है। संसद में 19 सांसद और विधानसभाओं में 126 विधायक महिला अपराधों में आरोपी हैं। दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध के आरोप तीन सांसदों और छह विधायकों पर हैं।
माननीयों ने इस प्रकार के अपराध किए
एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार माननीयों पर महिलाओं के खिलाफ कई धाराओं के तहत मामले दर्ज हैं। इन सांसदों, विधायकों पर महिलाओं पर दुष्कर्म (आईपीसी 376), जबरदस्ती विवाह के लिए अपहरण या बंधक बनाने (आईपीसी 366), दुष्कर्म के प्रयास में बल प्रयोग (आईपीसी 354), पति या उसके संबंधियों द्वारा हिंसा (आईपीसी 498ए), वेश्यावृत्ति के लिए नाबालिग की खरीद (आईपीसी 373) और भद्दे इशारों, शब्दों या किसी गतिविधि से महिलाओं के अपमान (आईपीसी 509) जैसे आरोप हैं।
ऐसे बढ़े आरोपी जनप्रतिनिधि
पिछले कई दशक से राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जाने के बात हो रही है। लेकिन न तो कोई सरकार इसके प्रति गंभीर दिखती है और न ही राजनीतिक दल। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के कड़े दिशा-निर्देशों के बावजूद राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं को टिकट देने में कोताही नहीं बरतते। उन्हें हर हालत में जीत चाहिए होती है। इसी का परिणाम है कि राजनीति में अपराधीकरण बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2009 में जहां महिलाओं से अपराध के आरोपी माननीयों की संख्या 40 (2 सांसद, 38 विधायक) थी, वहीं वर्ष 2014 में यह संख्या 64 (2 सांसद, 42 विधायक) हो गई। वर्तमान समय में यह संख्या 145 (19 सांसद और 126 विधायक) हो गई है। कुलदीप सेंगर का ही उदाहरण ले लीजिए। वह उत्तर प्रदेश की मौजूदा विधानसभा में भाजपा के सदस्य हैं। हालांकि, पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया है। 2007 और 2012 में वह समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक बने थे। इससे पहले 2002 में बसपा के टिकट पर वह चुनाव जीते थे। जब देश में महिला सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है और केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक इसके प्रति अपनी चिंता व्यक्त कर रही हैं, ऐसे में राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी बनती है कि वे टिकट देते वक्त कम से कम इस बात का ध्यान रखें कि महिला विरोधी अपराधों में लिप्त नेताओं को विधानसभा और लोकसभा का टिकट न दें। ऐसा कदम उठाकर ही महिला विरोधी अपराधों में शामिल नेताओं को संसद और विधानसभा में पहुंचने से रोका जा सकता है।
572 आरोपियों को मिला था टिकट
महिला अपराध के आरोपी 19 सांसद और 126 विधायक सदन में पहुंचे तो इसकी बड़ी वजह रही कि पांच वर्ष में विभिन्न राजनीतिक दलों ने जान-बूझकर 572 आरोपियों को लोकसभा व विधानसभा चुनाव के टिकट दिए। इनमें 89 आम चुनाव और 321 विधानसभा चुनाव के लिए थे। वहीं 410 प्रत्याशी मान्यता प्राप्त दलों से थे और 162 निर्दलीय। लोकसभा का टिकट पाने वाले आरोपियों की संख्या में 2009 से 2019 में 231 प्रतिशत वृद्धि हुई।
5 साल में किस पार्टी ने कितने ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया?
पार्टी सांसद-विधायक
भाजपा 47
बसपा 35
कांग्रेस 24
शिवसेना 22
सपा 17
टीएमसी 12
सीपीएम 12
सीपीआई 10
आप 2
निर्दलीय 118
अन्य 148
कुल 447
9 सांसद, विधायक पर रेप का केस
एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक 9 सांसद, विधायक ऐसे हैं जिन्होंने खुद पर रेप का केस दर्ज बताया। इनमें 3 सांसद और 6 विधायक हैं। बीते 5 साल में मान्यता प्राप्त पार्टियों ने 41 ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिए जिन्होंने खुद पर रेप के केस दर्ज बताए थे। इसके अलावा बीते 5 साल में 14 निर्दलीय उम्मीदवार भी ऐसे रहे जिन्होंने खुद पर रेप का केस दर्ज बताया। इन 14 निर्दलीय उम्मीदवारों ने लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा चुनाव लड़ा। बीते 5 साल में लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा चुनाव लडऩे वाले 572 ऐसे उम्मीदवार ऐसे रहे जिन्होंने खुद पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के केस दर्ज होना बताया। इन 572 में से एक पर भी दोष सिद्ध नहीं हुआ। मान्यता प्राप्त पार्टियों ने महिलाओं के खिलाफ अपराध के केस वाले 410 उम्मीदवारों को प्रत्याशी बनाया। इन 410 में से 89 को लोकसभा, राज्यसभा और 321 को विधानसभा चुनाव के लिए टिकट दिया गया।
महिला नेतृत्व पार्टियों ने भी दिए टिकट
राजनीतिक दल किसी व्यक्ति को अपनी पार्टी का चुनाव टिकट देते समय इस बात की परवाह नहीं करते कि उस व्यक्ति पर महिला अपराध के आरोप हैं। बीते पांच वर्ष में सबसे ज्यादा 66 आरोपियों को टिकट भाजपा ने दिए। कांग्रेस ने 46, बसपा ने 40, तृणमूल ने सात ऐसे प्रत्याशी चुने। खास बात है कि इन तीनों पार्टी की मुखिया महिला हैं। माकपा 15, शिवसेना 13, सपा 13, भाकपा व वाईएसआरसीपी 9, आप 8, बीजद 7 और टीआरएस 6 आरोपियों को टिकट दे चुकी है।
पश्चिम बंगाल में सर्वाधिक
पश्चिम बंगाल में महिला अपराध के सर्वाधिक 16 आरोपी सांसद-विधायक चुने गए। इसके बाद ओडिशा व महाराष्ट्र 12, आंध्रप्रदेश 8, तेलंगाना 5 रहे। एमपी, यूपी, उत्तराखंड व केरल से तीन-तीन और बिहार, गुजरात, झारखंड व तमिलनाडु से दो-दो आरोपी चुने गए।
चुनावी हलफनामे में महिलाओं के खिलाफ अपराध के केस अपने पर दर्ज होना बताने वाले सांसदों की संख्या में बीते 10 साल में 850 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। वहीं 2009 से 2019 के बीच ऐसे ही अपराध के केस अपने पर बताने वाले लोकसभा उम्मीदवारों की संख्या 230 प्रतिशत बढ़ी। रिपोर्ट में कुल 756 सांसदों और 4063 विधायकों के हलफनामों का विश्लेषण किया गया। इनमें से 76 सांसद, विधायकों ने हलफनामों में खुद पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के केस दर्ज होना बताया। इन 76 में से 58 विधायक और 18 सांसद हैं। वहीं इन 76 में सर्वाधिक भाजपा के 21 सांसद, विधायक हैं। दूसरे नंबर पर कांग्रेस (16) और तीसरे नंबर पर आंध्र प्रदेश के सीएम जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसीपी (7) है। बीते 5 साल में महिलाओं के खिलाफ अपराध के केस दर्ज वाले अहम सियासी पार्टियों के उम्मीदवारों की बात की जाए तो सर्वाधिक 66 को भाजपा ने टिकट दिया। दूसरे नंबर पर कांग्रेस ने 46 ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिए। तीसरे नंबर पर बीएसपी (40) रही। ये सारे उम्मीदवार ऐसे थे जिन्होंने बीते 5 साल में लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा चुनाव लड़ा।
पार्टियां अपराध पर गंभीर नहीं
इसी तरह बीते 5 साल में चुनाव लडऩे वाले 162 निर्दलीय उम्मीदवारों का विश्लेषण किया गया जिन्होंने खुद पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के केस दर्ज होना बताया। इन 162 निर्दलीय उम्मीदवारों में से 35 ने लोकसभा, राज्यसभा और 127 ने विधानसभा चुनाव लड़ा। एडीआर के मुताबिक विश्लेषण से साफ है कि राजनीतिक दल महिलाओं के खिलाफ अपराध के मुद्दे को लेकर अधिक गंभीर नहीं है। हैरानी की बात ये है कि जिन राजनीतिक दलों का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं उन्होंने भी महिलाओं के खिलाफ अपराध के केस वाले उम्मीदवारों को टिकट दिए। इनमें कांग्रेस, बीएसपी और टीएमसी शामिल हैं।
भाजपा से चुने गए सबसे ज्यादा आरोपी
सबसे ज्यादा 21 आरोपी सांसद व विधायक भाजपा के टिकट पर जीते। कांग्रेस से 16, वाईएसआरसीपी से 7, बीजद से 6, तृणमूल कांग्रेस 5, टीआरएस 4, निर्दलीय 3, द्रमुक 2, एनसीपी 2, राजद 2 और शिवसेना 2 आरोपी सदन पहुंचे। माकपा, झामुमो, पीजेपी, आरएसपी, सपा और टीडीपी ने 1-1 आरोपियों को सदन पहुंचाया।
महिलाओं के ऊपर अत्याचार से संबंधित मामलों वाले सांसद, विधायक राज्यवार
राज्य मामले
पं. बंगाल 16
ओडिशा 12
महाराष्ट 12
आंध्रप्रदेश 8
तेलंगाना 5
मप्र 3
यूपी 3
उत्तराखंड 3
केरल 3
बिहार 2
गुजरात 2
झारखंड 2
तमिलनाडु 2
अरुणाचल प्रदेश 1
गोवा 1
कर्नाटक 1

ऐसों को टिकट क्यों?
सवाल यह है कि संसद में महिला सम्मान के लिए बड़ी-बड़ी बातें करने वाले तमाम राजनीतिक दल ऐसे बलात्कार या यौन शोषण के आरोपियों को टिकट देते ही क्यों हैं? ऐसे लोग राजनीतिक पार्टी से जुड़ कर विधायक या सांसद बनने के बाद अपने खि़लाफ़ चल रहे मुकदमों में पुलिस पर दबाव डाल कर केस कमजोर कर देते हैं। ज़्यादातर मामलों में पीडि़ता पर दबाव डालकर शिकायत वापस करा देते हैं। गायत्री प्रसाद प्रजापति का मामले में ऐसा ही हुआ है। मनोज पारस ने भी पीडि़ता पर शिकायत वापस लेने का खूब दबाव डाला था, लेकिन पीडि़ता झुकी नहीं।
राज्यवार उम्मीदवार
राज्य उम्मीदवार
महाराष्ट्र 84
बिहार 75
पं. बंगाल 69
यूपी 61
ओडिशा 52
आंध्रप्रदेश 33
कनार्टक 26
मप्र 23
राज्य उम्मीदवार
तेलंगाना 23
झारखंड 22
केरल 17
राजस्थान 17
दिल्ली 11
तमिलनाडु 11
गुजरात 9
हरियाणा 7
राज्य उम्मीदवार
पंजाब 7
गोवा 5
उत्तराखंड 5
असम 3
छत्तीसगढ़ 3
जम्मू-कश्मीर 3
मेघालय 2
अरुणाचल प्रदेश 1

17 सालों में हर घंटे औसतन 3 महिलाओं के साथ रेप
एनसीआरबी के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि महिलाओं के लिए बलात्कार का खतरा पिछले 17 सालों की तुलना में लगभग दोगुना हो गया है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2001-2017 के बीच पूरे भारत में कुल 4,15,786 बलात्कार के मामले दर्ज हुए। पिछले 17 सालों के दौरान पूरे देश में प्रतिदिन औसतन 67 महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, यानी 17 सालों में हर घंटे औसतन तीन महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है। 2001 में जहां देश भर में बलात्कार के कुल 16,075 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2017 में यह संख्या बढक़र 32,559 हो गई, यानी 17 सालों में बलात्कार के मामलों में 103 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। अगर प्रतिशत में देखा जाए तो बलात्कार से जुड़े मामलों में सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी गोवा में दर्ज की गई है। गोवा में 2001 में 12 मामले दर्ज हुए थे, जबकि 2017 में 76 मामले दर्ज हुए। इस तरह गोवा में 17 सालों में बलात्कार के मामलों में 533 फीसदी बढ़ोत्तरी हुई। इसके बाद दूसरा नंबर उत्तराखंड का है जहां पर बलात्कार के मामलों में 405 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दर्ज हुई है। हालांकि, अगर प्रतिशत के बजाय बलात्कार केस की वास्तविक संख्या की बात करें तो मध्य प्रदेश सबसे ऊपर है। मध्य प्रदेश में 2001 में जहां बलात्कार के 2851 केस दर्ज हुए थे, वहीं 2017 में 5562 केस दर्ज हुए। वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है जहां पर सबसे ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज हुए। उत्तर प्रदेश में 2017 में कुल 4246 मामले दर्ज हुए। इसके बाद राजस्थान में 3305 और केरल में 2003 मामले दर्ज किए गए।
17 साल में किन राज्यों में बढ़े सबसे ज्यादा रेप के मामले
राज्य मामले
मप्र 2711
यूपी 2280
राजस्थान 2256
केरल 1441
ओडिसा 1280
असम 955
छत्तीसगढ़ 949
राज्य मामले
दिल्ली 848
हरियाणा 701
पं. बंगाल 375
झारखंड 347
उतराखंड 300
कर्नाटक 253
पंजाब 232
फंड है, मंशा नहीं!
अगर सरकारें ठान लें तो महिला अपराधों में कमी आ सकती है। यह साबित कर दिखाया है मप्र सरकार ने। मप्र में विगत 11 महीने की अवधि में दुष्कर्म की घटनाओं में आंकड़ों के हिसाब से बेहतर स्थिति दिखाई दे रही है। एक जनवरी से 20 नवंबर की अवधि के दौरान दुष्कर्म की घटनाएं पिछले साल से करीब सवा 400 कम घटित हुईं। दूसरी तरफ दस साल में सोशल मीडिया पर महिलाओं और बच्चियों को ब्लैकमेल करने की 133 शिकायतें सामने आईं। प्रदेश की यह आपराधिक स्थिति विधानसभा में लिखित प्रश्नों से सामने आई है। जानकारों का कहना है कि ये आंकड़ें और सुधर सकते हैं। अगर सरकार निर्भया फंड का पूरी तरह उपयोग करे। गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा महिला सुरक्षा के मद्देनजर हर राज्य को निर्भया फंड दिया जाता है। लेकिन राज्य सरकारों की रूचि फंड के इस्तेमाल में नहीं दिख रही है।
राज्य फंड सेंक्शन (लाखों में) उपयोग (लाखों में)
आंध्रप्रदेश 2085.00 814.01
अरुणाचल प्रदेश 768.86 224.03
पं. बंगाल 7570.80 392.73
असम 2072.63 305.06
तमिलनाडु 19068.36 600.00
बिहार 2258.60 702.00
उत्तराखंड 953.27 679.41
छत्तीसगढ़ 1687.41 745.31
गोवा 776.59 221.00
गुजरात 7004.31 118.50
हरियाणा 1671.87 606.00
यूपी 11939.85 393.00
हिमाचल प्रदेश 1147.37 291.54
राजस्थान 3373.02 1011.00
जम्मू-कश्मीर 1256.02 324.53
झारखंड 1569.81 405.33
कर्नाटक 19122.09 1362.00
केरल 1971.77 472.00
मप्र 4316.96 639.50
दिल्ली 39090.12 1941.57
महाराष्ट्र 14940.06 0
ओडिसा 2270.53 58
पंजाब 2047.08 300

x

Check Also

बड़ी खबर. रात के अंधेरे में उड़ाई जा रही धारा 144 की धज्जियां. सीधी.

मंगल भारत सीधी. जहां पूरे विश्व में लॉक डाउन की स्थित बनी हुई है. उसी के साथ पूरा भारत वर्ष ...