अगर मध्य प्रदेश में एनपीआर और एनआरसी लागू हुआ तो… 60 लाख आबादी खो सकती हैं अपनी नागरिकता

एनआरसी के साथ-साथ एनपीआर और सीएए को

लेकर पूरे देश में हल्ला मचा हुआ है। लेकिन यदि यह हो गया तो मध्य प्रदेश में ही घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और विमुक्त जनजातियों के करीब 60 लाख लोगों को यह साबित करना मुश्किल हो जाएगा कि वे भारत के नागरिक हैं। हालात यह है कि पिछले सत्तर साल में उनके विकास और उत्थान के लिए कई प्रयास हुए, लेकिन वह कागजों से बाहर आकर जमीन पर साकार होने से कोसों दूर ही रहे…

भोपाल (मंगल भारत)। इन दिनों देशभर में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर उथल-पुथल मची हुई है। अगर मप्र में एनपीआर और एनआरसी को लागू किया जाता है तो 51 जनजातियों की करीब 60 लाख आबादी की नागरिकता खतरे में पड़ सकती है क्योंकि इन जनजातियों के पास अपने जन्म को साबित करने के लिए शायद ही कोई दस्तावेज हो। विमुक्त घुमक्कड़ एवं अर्धघुमक्कड़ जनजाति कल्याण विभाग के अनुसार मध्यप्रदेश में विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू 51 जनजातियां हैं, जिन्हें 2012 में आदिवासी विभाग से अलग कर दिया गया था। इसके अलग होने के सात साल बाद भी, विभाग के पास कोई आधिकारिक डेटा नहीं है कि इन समुदायों की कुल जनसंख्या कितनी है।
नागरिकता खोने के भय
एनपीआर और एनआरसी को लागू करने के फैसले से मप्र की विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां, जो राज्य की आबादी का लगभग 7 से 8 प्रतिशत हैं, अपनी नागरिकता खोने के भय में जी रही हैं। केंद्र सरकार ने एनपीआर को अद्यतन करने के लिए 3,941.35 करोड़ रुपए खर्च करने की मंज़ूरी दे दी है, जो कि गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, एनआरसी की ओर पहला कदम है। एनपीआर तैयार करने की प्रक्रिया अप्रैल 2020 से शुरू होगी और असम को छोडक़र इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा (जहां एनआरसी पहले ही पूरी हो चुकी है)। जब से नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 और एनआरसी के मुद्दे ने देश में उथल-पुथल मचाई है, इन समुदायों को अपने लिए दस्तावेज इक_ा करने में मानसिक पीड़ा और कठिनाई के दौर से गुजरना पड़ रहा है।
इनके पास कोई प्रमाण नहीं
रेनका समिति 2008 की रिपोर्ट, के अनुसार देशभर में ऐसे 11 करोड़ से अधिक लोग हैं, जो विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों से हैं। विमुक्त घुम्मक्कड़ एवं अर्धघुमक्कड़ जनजाति कल्याण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, राज्य में 50 लाख से अधिक विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां हैं, जबकि भाजपा के विमुक्त घुम्मक्कड़ एवं अर्धघुमक्कड़ जनजाति प्रकोष्ठ के अनुसार इनकी आबादी लगभग 60 लाख है। चूंकि, इन समुदायों के सदस्य शायद ही किसी एक विशेष स्थान पर रहते हैं, उनके पास निवास, जन्म, शिक्षा, जाति और भूमि का कोई भी आधिकारिक प्रमाण नहीं है। विभाग के अनुसार कुछ को छोडक़र, उनमें से अधिकांश के पास जन्म का प्रमाण या जमीन के कोई दस्तावेज नहीं हैं। न ही वे इन्हें हासिल कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें यह भी याद नहीं कि वे पैदा कहां हुए हैं। वे अशिक्षा के कारण भी जन्म प्रमाण पत्र कभी नहीं बनवा पाते हैं।
केवल 10-15 प्रतिशत के पास प्रमाण पत्र
शिवराज सिंह चौहान सरकार ने 2014 में, इन जनजातियों के जाति प्रमाण पत्र बनाने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया था, लेकिन कुछ अधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, आधिकारिक दस्तावेजों की कमी के कारण शायद ही 10-15 प्रतिशत लोग प्रमाण पत्र बनवाने में सफल रहे। विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, ज्यादातर लोग तय नियमों के अनुसार किसी भी आधिकारिक दस्तावेज को पेश करने में विफल रहे, जिसके आधार पर उनका जाति प्रमाण पत्र जारी किया जाना था। जिन लोगों ने दस्तावेज प्रस्तुत किए, उन्हें प्रमाणपत्र मिल गया। विमुक्त घुम्मक्कड़ एवं अर्धघुमक्कड़ जनजाति विकास विभाग की उप निदेशक दीप्ति एस कोटशाने के अनुसार इन समुदायों के लगभग 30 से 40 प्रतिशत लोगों के पास ही दस्तावेज हैं। यदि एनआरसी लागू होती है, तो बाकी को इससे बाहर किया जा सकता है, इसलिए हम इसके बारे में चिंतित हैं और एक योजना तैयार कर रहे हैं। आज भी इस देश में इन जातियों के लोग बेघर, बेठिकाना, अशिक्षित, विपन्न, निर्धन होकर शासन के आंकड़ों में दर्ज नहीं हैं और अनजान होकर अभिशप्त जीवन जी रहे हैं।
राह में कई बाधाएं
एक अधिकारी ने बताया, मप्र में 51 समुदाय हैं इनमें से कुछ को ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) में जोड़ा गया है और कुछ को अनुसूचित जाति के रूप में जोड़ा गया है। इसलिए, यह पहचानना मुश्किल है कि कौन, कौन है, और नए जाति प्रमाण पत्र कैसे जारी करें। यह केवल एक सर्वेक्षण के आधार पर ही किया जा सकता है जो अभी भी पाइपलाइन में है। कांग्रेस सरकार ने भी कुछ मानदंडों को छोड़ते हुए जाति प्रमाण-पत्र अभियान शुरू किया है। अधिकारियों ने दावा किया है कि आधार और जन-धन योजना के अस्तित्व में आने के बाद से, कुछ लोगों के पास आधार, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और बैंक खाते हैं, लेकिन केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के एक ट्वीट के अनुसार भारत की नागरिकता सिद्ध करने के लिए जन्म की तारीख या जन्म स्थान से संबंधित दस्तावेज को ही आधार माना जाएगा।
देशभक्ति की चुका रहे कीमत
खानाबदोश जनजाति के कार्यकर्ता ललित दौलत सिंह की मानें तो विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां अपनी देशभक्ति के कारण इस स्थिति में हैं। वह कहते हैं कि देश की जिप्सी और घुमंतू जनजातियों ने 1857 में स्वतंत्रता आंदोलन की पहली लड़ाई के बाद अंग्रेजों पर कई हमले किए थे। हमलों से नाराज होकर, ब्रिटिश हुकूमत ने आपराधिक जनजाति अधिनियम 1871 को लागू कर दिया, जिसके तहत उन्होंने देश की बड़ी संख्या में जातियों और समुदायों को अपराधी करार दे दिया था। इसने जनजातियों और समुदायों का काफ उत्पीडऩ किया और बेइंतहा कष्ट दिया है, इसने उनकी जीवन शैली और जीविका पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाला। और इसलिए ख़ुद को बचाने के लिए वे एक जगह से दूसरी जगह भागने लगे।
हालांकि यह समूह काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय भी था, जिसमें अफगानी नस्ल के लोग भी शामिल थे। लड़ाकू आदिवासी कबीलों को मुगलों और राजपुताना सेना में हमेशा नौकरी मिलती रहती थी। मुगलों के कमजोर होने पर इन लोगों ने देशी रियासतों का रुख किया। अंग्रेजों के वर्चस्व के कारण धीरे-धीरे रियासतें कमजोर होने लगीं। लिहाजा कई आदिवासी समूहों को जीविकोपार्जन के दूसरे रास्ते देखने पड़े जिसमें खेती, व्यापार, लूटमार से लेकर ठगी तक शामिल रहा। पराजित और रोटी-रोजी में फंसे रहने के कारण इस तबके के समूहों को कभी पीछे मुडक़र देखने का अवसर ही प्राप्त नहीं हुआ। बिगड़ते हालात ने इनके घर की औरतों को देह व्यापार करने तक को मजबूर किया। कंजर, बेडऩी और सहरिया कुछ ऐसी ही जातियां हैं। इन पर जो कुछ लिखा गया दूसरों के द्वारा लिखा गया। इतिहास का रुख बदलने वाले खुद अपना इतिहास नहीं जानते। अतीत के भारत के लगभग सभी रियासतों के लिए लडऩे वालों के पास आज इंच-भर जमीन नहीं है। अंग्रेजों को इनसे दिक्कत थी। उन्होंने इनकी पहचान ‘क्रिमिनल ट्राइब’ के रूप में की थी। अंग्रेज देशभक्तों को भी फसादी कहा करते थे, परंतु आजादी के बाद देशभक्तों को इनाम-वकराम से नवाजा गया। सरकारी नौकरी में आरक्षण मिला। आदिवासी यहां भी ठगे गए। उनकी पहचान तक न की गई। बात अंग्रेजों की करते हैं, जहां से चले थे, फिर वहीं चलते हैं। ठगों की ओर लौटते हैं। तीन सौ करोड़ी फिल्म की बात करते हुए उस कृति की बात करते हैं, जिस पर यह फिल्म आधारित है।
सबने माना था जांबाजी का लोहा
ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है कि अंग्रेजों की मुखालफत करने वाले आदिवासी, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के दांत खट्टे कर दिए थे, को कभी ठग कहा गया, कभी पिंडारी। ये दोनों नाम अंग्रेजों द्वारा दिए गए थे। इस आदिवासी समूह को कानून बनाकर अपराधी घोषित कर दिया गया। एक बात यहां स्पष्ट कर दिया जाए कि अपनी सुविधानुसार विमुक्त जनजातियां कहीं हिंदू, कहीं मुसलमान तो कहीं सिख हो गईं। पर सामुदायिक बोध इतना सघन था कि कभी भी सांप्रदायिकता इन पर हावी नहीं हो पाया। इसीलिए पिंडारियों के रूप में ये एक मजबूत इकाई की तरह लंबे समय तक अस्तित्व में रह पाए। एकता और जांबाजी ने विदेशी व्यापारियों का जीना दुश्वार कर दिया था। पिंडारी और ठगों को किंवदंती के रूप में देखा जाने लगा। हजारों खौफनाक कथाएं इनके नाम पर रची गईं। दरअसल, भारत के असली गब्बर सिंह यही लोग माने गए। इनका नाम सुनते ही विदेशी और लुटेरे किस्म के व्यापारियों का खून जम जाया करता था।
अंग्रेजों के नाक में कर रखा था दम
पिंडारियों से गोरी सरकार इतना परेशान हो चुकी थी कि इनके खात्मे के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गई। गोरी गवर्नमेंट ठोस कार्रवाई करना चाहती थी। पिंडारी और ठगों का समूह गोरों की अजेय छवि के सामने चुनौती पेश कर रहा था। बिना उन्हें मिटाए, गोरी श्रेष्ठता स्थापित नहीं हो पा रही थी। लेकिन यह सब इतना आसान नही था। पिंडारियों का देशी रियासतों के साथ राजनीतिक कनेक्शन भी हो चुका था। इन लोगों ने जरूरतमंद राजाओं-महाराजाओं को वीरता की आउटसोर्सिंग करना शुरू कर दिया था। दक्षिण से लेकर मध्य भारत के अलग रियासतों में ये समूह सैन्य सेवायें देने लगे थे। पिंडारी मराठा अजेयता के भी रीढ़ थे। वे मराठा सेना में अवैतनिक सैनिकों के रूप में अपनी सेवा दिया करते थे, जहां विजय प्राप्त होने पर विजय सामग्री से कुछ हिस्सा इनके लिए भी निश्चित कर दिया गया था। अंग्रेजों के अनुसार मराठा सेना के साथ ये लूटमार करने वाले दलों के रूप में हमला करते थे। इनकी वीरता अप्रतिम थी। इसी योग्यता से प्रभावित होकर बाजीराव-प्रथम के समय से इनकी सेवाएं मराठा सेना में बाकायदा शुरू हुई। पिंडारियों की सेवा से मराठा सेना अजेय रही। पिंडारियों के दमन और मराठा शक्ति को नष्ट करने के लिए लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1817 में मराठा संघ को नष्ट करने के पूर्व कुटनीति द्वारा पिण्डारी सरदारों में फूट डाल दी तथा संधियों (सहायक संधियों) द्वारा देशी राज्यों से उनके विरुद्ध सहायता ली। गोरी सरकार के सामने घूटना टेकने वाली रियासतें अपने सेना के अभिन्न हिस्से अर्थात पिंडारियों के खिलाफ जासूसी कराने लगीं। हेस्टिंग्स हिसलप के नेतृत्व में बड़ी आसानी से 120,000 सैनिकों तथा 300 तोपों सहित पिंडारियों के इलाकों को घेरकर नष्ट कर दिया। हजारों पिण्डारी मारे गए, बंदी बने या जंगलों में चले गए। चीतू जैसे वीर और संगठन निर्माता बहादुर पिंडारी को असोरगढ़ के जंगल में चीता ने शिकार बना डाला।
गुमनामी का अंधेरा कब छंटेगा?
देश में 11 करोड़ विमुक्ति-जनजाति समुदाय के लोग सवाल कर रहे हैं कि हमारी उम्मीदों के बादल कब बरसेंगे? इस धरती पर पहचान कब मिलेगी? कई पीढिय़ां तबाह हो गईं। स्वाधीनता से लेकर आज तक न जाने कितनों को उस सजा के रूप में मौत नसीब हुई, जिसे उन्होनें कभी किया ही नहीं, परंतु खास समुदाय के होने के नाते उन्हें अपराधी मान लिया गया (जाता है)।
मप्र की 51 जनजातियां विमुक्त, घुमक्कड़ एवं अद्र्ध घुमक्कड़
मध्यप्रदेश में 51 जनजातियां विमुक्त, घुमक्कड़ एवं अद्र्ध घुमक्कड़ जातियों के रूप में चिह्नित कर मान्य की गई हैं। इन 51 जातियों में से 21 जातियों को विमुक्त जनजाति के रूप में मान्यता दी गई है, ये जातियां हैं – कंजर, सांसी, बंजारा, बनछड़ा, मोघिया, कालबेलिया, भानमत, बगरी, नट, पारधी, बेदिया, हाबुड़ा, भाटु, कुचबंदिया, बिजोरिया, कबूतरी, सन्धिया, पासी, चंद्र्वेदिया, बैरागी, सनोरिया। बची हुई 30 जातियों को घुमक्कड़ घोषित किया गया है, ये हैं – बलदिया, बाछोवालिया, भाट, भंतु, देसर, दुर्गी मुरागी, घिसाड़ी, गोंधली, ईरानी, जोगी या जोगी कनफटा, काशीकापड़ी, कलंदर नागफड़ा, कामद, करोला, कसाई गडरिये, लोहार पिटटा, नायकढ़ा, शिकलिगर, सिरंगिवाला, सद्गुदु सिद्धन, राजगोंड, गद्दीज, रेभारी, गोलर, गोसाईं, भराड़ी हरदास, भराड़ी हरबोला, हेजरा धनगर, जोशी बालसंतोशी ( जोशी बहुलीकर,जोशी बजरिया, जोशी बुदुबुद्की, जोशी चित्राबठी, जोशी हरदा, जोशी नदिया, जोशी हरबोला, जोशी नामदीवाला,जोशी पिंगला)। अद्र्ध घुमक्कड़ जनजाति के रूप में मान्य किया गया है।

विडंबनाएं कई हैं
2006 में बना बालकृष्ण रेणके आयोग
सूरजपाल नांगिया सांसी जाति के होने पर अफसोस जताते कहते हैं, ‘हमारा देश 1947 में आजाद हुआ था और 31 अगस्त 1952 में यानि पांच साल सोलह दिन तक हम अपने ही देश में रहकर गुलामी की जिंदगी जीते रहे और आज हमें आजाद हुए 70 साल हो गए हैं, तब भी हम गुलाम हैं। इसी विडंबना पर बोलते हुए वे आगे कहते हैं, अगर ऐसा ही चलता रहा तो शायद यह गुलामी आगे भी हमें हमेशा झेलनी पड़ेगी। हालांकि, केंद्र की सरकार ने 2006 में इनके कल्याण के लिए बालकृष्ण रेणके आयोग का गठन किया था, जिसे राष्ट्रीय विमुक्त, घूमंतू, अर्धघूमंतू जनजाति आयोग कहा गया था। आयोग ने 2008 में केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। छह वर्ष तक उस पर कोई कार्रर्वाई नहीं की गयी। बालकृष्ण आयोग ने विमुक्त, घूमंतू, अद्र्धघूमंतू जनजातियों के लिए 72 अनुशंसाएं की थी, जिनमें से प्रमुख थीं- शिक्षा और नौकरी में अलग से 10 प्रतिशत आरक्षण, अलग बजट प्रावधान, विमुक्त घुमंतू जातियों का पृथक मंत्रालय, विमुक्त घुमंतू जातियों का स्थायी आयोग बनाया जाए, विमुक्त जातियों के लिए आवासीय (बोर्डिंग) स्कूल खोले जाएं, रहने के लिए जमीन तथा मकान बना कर दिए जाएं। आज तक इस आयोग की अनुसंशाएं धूल फांक रही हैं। केंद्र सरकार ने 2015 में इस समुदाय को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए केन्द्र सरकार ने विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों के लिए आयोग का गठन किया है। इसकी प्रमुख बातें इस प्रकार हैं – यह आयोग तीन वर्ष की अवधि के लिए होगा। इस आयोग की संदर्भ शर्तों में विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों से संबद्ध जातियों की राज्यवार सूची तैयार करना तथा विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों के लिए केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार द्वारा किए जाने वाले उचित उपाय सुझाना शामिल है। इस आयोग में एक अध्यक्ष, एक सदस्य और एक सदस्य सचिव होगा। सरकार ने विमुक्त और खानाबदोश जनजातियों के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष के रूप में भीखू रामजी इदाते और सदस्य सचिव के रूप में श्रवण सिंह राठौर की नियुक्ति की है।
राज्य सरकार ने सरल किए नियम
राज्य शासन ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विमुक्त, घुमक्कड़ और अर्ध-घुमक्कड़ जनजाति के व्यक्तियों को जाति प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया का सरलीकरण किया है। सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशानुसार अजा-अजजा के आवेदकों को वर्ष 1950 तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के आवेदकों को वर्ष 1984 में मध्यप्रदेश में रहने संबंधी लिखित रिकॉर्ड पेश करना अनिवार्य था। आवेदक के पास यदि रिकार्ड नहीं होता था तो वह प्रमाण पत्र नहीं बनवा पाता था। अब ऐसा नहीं होगा। आवेदक को लिखित रिकार्ड प्रस्तुत करने के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा। राजस्व अधिकारी स्वयं मौके पर जाकर अथवा शिविर में जांच कर आवेदन-पत्र की जानकारी की पुष्टि करेंगे। इसके लिए आवेदक, संबंधित सरपंच, पार्षद, ग्राम-मोहल्ले के व्यक्तियों से पूछताछ कर उनके बयान दर्ज करेंगे। स्वयं की संतुष्टि के बाद स्थाई जाति प्रमाण-पत्र जारी करने की अधिकारी अनुशंसा करेंगे। राज्य शासन द्वारा 11 अगस्त 2016 और 13 अगस्त 2018 में एक परिपत्र जारी किया गया था। इसके अनुसार जनजातियों के ऐसे व्यक्ति जिसके परिवार के किसी सदस्य पिता, भाई, बहन को पूर्व में राजस्व अनुविभागीय अधिकारी द्वारा जाति प्रमाण-पत्र जारी किया गया है, उन मामलों में बिना छान-बीन प्रमाण-पत्र जारी करने के निर्देश दिए गए हैं। क्योंकि आवेदक और उसके परिवार के संबंध में एक बार छान-बीन कर जाति एवं निवास की पुष्टि की जा चुकी है।
पड़ोसियों के बयान से बनेगा प्रमाण पत्र
अनुसूचित जाति, जनजाति सहित विभिन्न जनजातियों के लोगों को अब जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए 50 साल पुराना रिकार्ड नहीं देना होगा। आवेदक द्वारा आवेदन किए जाने के बाद राजस्व अधिकारी इसकी जांच करेंगे। मोहल्ला पड़ोसियों के बयान का आधार पर ही अब जाति प्रमाण पत्र बन जाएगा। वहीं अगर परिवार में किसी के पहले से जाति प्रमाण पत्र है तो उसी आधार पर जाति प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा। बता दें कि अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, विमुक्त घुमक्कड़, अर्ध घुमक्कड़ आदि जाति के लोगों को जाति प्रमाण पत्र के लिए अभी सन् 1950 की स्थिति में प्रदेश में निवासरत होने का लिखित प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना पड़ता था। तभी इस वर्ग के लोगों को प्रशासन द्वारा जाति प्रमाण पत्र जारी किया जाता था। लिखित रिकार्ड न होने की स्थिति में आवेदनों को निरस्त कर दिया जाता था। ऐसे में इस वर्ग के लोगों को शासन की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता था। प्रदेश के सामान्य प्रशासन विभाग के अवर सचिव केके कातिया ने 8 जुलाई को जारी आदेश में इस वर्ग के जाति प्रमाण पत्र बनाने की प्रक्रिया को सरल कर दिया है। अब इस वर्ग के लोग जैसे ही जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करेंगे। राजस्व अधिकारी मौके पर जाकर आवेदन की पुष्टि करेंगे। आसपास रहने वाले लोगों को बयान दर्ज कर क्षेत्रीय पार्षद,सरपंच, पंच व क्षेत्र के संभ्रांत नागरिकों के बयान से संतुष्ट होने के बाद जाति प्रमाण पत्र जारी करने के अनुशंसा करेंगे। अगर परिवार के किसी सदस्य के नाम पूर्व से जाति प्रमाण पत्र अनुविभागीय अधिकारी द्वारा जारी किया गया है तो परिवार के इसी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर अन्य सदस्यों के जाति प्रमाण पत्र बगैर किसी पूछताछ या जांच व पुष्टि के जारी किए जाएंगे। इसके लिए पूर्व में इस वर्ग के लोगों के लिए जाति प्रमाण पत्र बनाने के लिए जारी आदेशों को शिथिल कर दिया गया हैं।
घुमंतू जनजातियां विकास से कोसों दूर क्यों?
केंद्र की मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू कर दिया गया। जबकि 20 करोड़ विमुक्त और घुमंतू जनजातियों की कोई फिक्र किसी भी राजनीतिक दल और सरकार को नहीं है। जातिवार जनगणना 2011 के अनुसार, भारत में विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों की आबादी 11 करोड़ है (जबकि वर्तमान समय में इनकी वास्तविक आबादी 15 करोड़ से अधिक है)। यह विशाल समुदाय भारत की आजादी के बाद भी आज तक सामाजिक न्याय से पूरी तरह वंचित एवं विकास की धारा से कोसों दूर है। विमुक्त जनजातियों के साथ जो उपेक्षा सरकारों यहां तक कि सामाजिक न्याय के ध्वजवाहकों ने की है, वह वास्तव में चिंता और चिंतन का विषय है।
सरकारों की अनदेखी
इन समुदायों के लिए भी एक स्थाई आयोग का गठन करने की आयोग की रिपोर्ट को तो अभी तक माना नहीं गया। पहले नीति आयोग ने इदाते आयोग की स्थाई आयोग गठन संबंधी सिफारिश पर अपनी सहमति भी दे दी थी लेकिन अंतरिम बजट सत्र में घोषणा यह की गई कि घुमंतू समुदाय जो एससी, एसटी और ओबीसी में नहीं है केवल उनके लिए डेवलपमेंट बोर्ड का गठन किया जाएगा। विदित रहे कि पहले भी ऐसे विमुक्त और घुमंतू समुदायों के लिए प्री-मैट्रिक और पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति और हॉस्टल योजना लागू की गई थी जो किसी भी आरक्षित वर्ग में नहीं थे, ये दोनों योजनाएं बुरी तरह फ्लॉप हो गईं क्योंकि ये दोनों भी केवल उनके लिए थीं जो किसी रिज़र्व कैटेगरी में नहीं थे। इसलिए वांछित संख्या में अभ्यर्थी/आवेदक ही नहीं मिले। यह तथ्य विमुक्त जनजाति के विशेषज्ञों और न्यायालयों द्वारा बार-बार रेखांकित किया जा चुका है कि डीएनटी यानी विमुक्त जनजातियां अत्यंत पिछड़ा समुदाय है इसलिए उन्हें किसी अन्य कैटेगरी एससी, एसटी या ओबीसी में सम्मिलित करने से कभी भी हक़ नहीं मिल सकता फिर भी सरकारें इस वास्तविकता की अनदेखी कर रही हैं। रेनके आयोग ने 2008 में ही सिफ़ारिश की थी कि विमुक्त और घुमंतू जनजातियों को शिक्षा एवं नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए तब से आज तक उन्हें तो आरक्षण नहीं दिया गया जबकि आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों को 10 प्रतिशत लागू भी कर दिया गया।

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