लोकप्रियता की अग्नि परीक्षा

शिवराज, सिंधिया और कमलनाथ के लिए अहम हैं उपचुनाव

मध्य प्रदेश की 28 विधानसभा सीटों पर हो रहा उपचुनाव किसी मिनी विधानसभा चुनाव की तरह लग रहा है। भाजपा, कांग्रेस के 28-28 प्रत्याशियों के साथ ही कुल 355 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। यह उपचुनाव सरकार का भविष्य तो तय करेगा ही साथ ही मप्र के कुछ दिग्गज नेताओं की राजनीतिक किस्मत भी लिखेगा। जिनमें खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और सबसे अहम, जो पूरी लड़ाई के केंद्र बिंदु हैं कांग्रेस को तगड़ा झटका देकर भाजपा में शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया। तो ऐसे में इन उपचुनावों के नतीजे क्या हो सकते हैं? क्या कमलनाथ इतनी सीटें हासिल कर पाएंगे कि वो वापसी कर पाएं? या फिर शिवराज-सिंधिया का नया गठजोड़ खुद का लोहा मनवाने में कामयाब रहेगा? यह चर्चा का विषय बना हुआ है। इस चुनाव में शिवराज, सिंधिया और कमलनाथ की लोकप्रियता की अग्निपरीक्षा भी होनी है।

मनीष द्विवेदी/मंगल भारत


भोपाल (डीएनएन)। 
देश में पहली बार किसी एक राज्य की 28 सीटों पर एक साथ चुनाव हो रहे हैं और इन उपचुनावों की जीत-हार दोनों पार्टियों का भविष्य वैसे ही तय करेगी जैसे आम चुनाव करते हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है, जब भाजपा में शामिल हुए कांग्रेसी नेता मोदी-मोदी कर रहे हैं और भाजपा उन्हें गले लगा रही है। 2018 के विधानसभा चुनाव शिवराज और सिंधिया के बीच हुए थे और अब दोनों 2020 में मिलकर उपचुनाव लड़़ रहे हैं और वह भी कांग्रेस के खिलाफ। इसलिए कहा जाता है कि युद्ध, प्यार और राजनीति में सब जायज है। लेकिन इस चुनाव में तीन नेताओं शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ की लोकप्रियता दांव पर है। मप्र में कौन कितना लोकप्रिय है, इसका फैसला 10 नवंबर को हो जाएगा। लेकिन इससे पहले इन तीनों नेताओं को अपनी लोकप्रियता की अग्निपरीक्षा देनी पड़ रही है। उपचुनाव में भाजपा की कमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास है और कांग्रेस की कमान कमलनाथ के पास। प्रचार अभियान में भाजपा ने सिंधिया को केवल ग्वालियर संभाग का दायित्व सौंपा है, जबकि कमलनाथ ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को प्रचार से दूर रखा है। संभवत: कांग्रेस प्रत्याशी भी नहीं चाहते हैं कि उनके प्रचार अभियान में दिग्विजय सिंह आएं, जबकि भाजपा के चुनाव चिह्न पर लड़़ रहे प्रत्याशी चाहते हैं कि उनके प्रचार में सिंधिया जरूर रहें। इनका सोचना है कि सिंधिया जीत की गारंटी है। यह गारंटी किसी समय दिग्विजय सिंह के साथ जुड़़ी थी। यह समय-समय की बात है।

सरकार का भविष्य दांव पर
आमतौर पर किसी भी उपचुनाव के नतीजे से किसी सरकार की सेहत पर कोई खास असर नहीं होता, सिर्फ सत्तारूढ़ दल या विपक्ष के संख्याबल में कमी या इजाफाा होता है, लेकिन मप्र में 28 विधानसभा सीटों के उपचुनाव से न सिर्फ सत्तापक्ष और विपक्ष का संख्या बल प्रभावित होगा, बल्कि राज्य की मौजूदा सरकार का भविष्य भी तय होगा कि वह रहेगी अथवा जाएगी इसलिए भी इन उपचुनावों को अभूतपूर्व कहा जा रहा है। इन उपचुनावों के परिणाम पर सरकार का भविष्य तय होगा। वैसे तो नवंबर की 3 और 7 तारीख को 11 राज्यों की 56 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव हो रहे हैं, लेकिन उनमें मप्र विधानसभा की 28 सीटों के चुनाव काफी अहम हैं। वैसे तो संसद या विधानसभा के किसी भी सदन की किसी भी खाली सीट के लिए उपचुनाव होना एक सामान्य प्रक्रिया है लेकिन मप्र की 28 सीटों पर हो रहे उपचुनाव देश के संसदीय लोकतंत्र की एक अभूतपूर्व घटना है। राज्य की 230 सदस्यीय विधानसभा में 28 सीटों के लिए यानी 12 फीसदी सीटों के लिए उपचुनाव इसलिए भी ऐतिहासिक हैं कि इससे पहले किसी राज्य में विधानसभा की इतनी सीटों के लिए एक साथ उपचुनाव कभी नहीं हुए।प्रदेश में पहली बार यह भी देखने को मिल रहा है कि उपचुनाव की इस जंग में कांग्रेस, भाजपा, बसपा के साथ ही कई अन्य पार्टियां और निर्दलीय मैदान में हैं। प्रदेश के 19 जिलों के 28 विधानसभा क्षेत्रों में 355 प्रत्याशी चुनावी मैदान में हैं। इनमें से मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच है। वहीं करीब एक दर्जन सीटों पर बसपा के कारण त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति निर्मित हो रही है। इस तरह इस उपचुनाव में 68 (भाजपा-28, कांग्रेस-28, बसपा-12) प्रत्याशी चुनावी मैदान में जीत के लिए दम लगा रहे हैं, जबकि 287 प्रत्याशी ऐसे हैं, जो वोट काटकर इनकी हार-जीत के गणित को प्रभावित करेंगे। इस कारण न तो भाजपा और न ही कांग्रेस इस बात को लेकर संतुष्ट है कि वह सरकार बनाने के अंक गणित में सफल हो जाएंगे।

दिग्गजों के लिए उपचुनाव के मायने
28 सीटों पर हो रहे उपचुनाव सरकार के साथ ही भाजपा-कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की राजनीतिक किस्मत भी तय करेंगे। कांग्रेस सरकार में मंत्री और विधायक रहे जो 25 पूर्व विधायक चुनाव लड़ रहे हैं उनके लिए तो यह उपचुनाव जीवन-मरण के समान है। लेकिन इनसे भी अहम उनके लिए है जिनकी सरपरस्ती में ये चुनाव लड़ रहे हैं और जो इनको हराने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर रहे हैं। यानी भाजपा और कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के लिए यह उपचुनाव उनकी लोकप्रियता का लिटमस पेपर भी है। इनमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा शामिल हैं। शिवराज सिंह चौहान के लिए व्यक्तिगत रूप से सत्ता में वापसी आसान नहीं रही है। उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके साथी कांग्रेसी बागियों के साथ डील करनी पड़ी है। चौहान के इन बागियों को मंत्री पद तो देने ही पड़े साथ में सारे के सारे बागियों को टिकट भी देने पड़े। अब उपचुनाव में इनको जिताने की जिम्मेदारी भी इनके ऊपर है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बारे में कहा जाता है कि वे हमेशा से शिवराज के लिए भाग्यशाली साबित हुए हैं। इनका ग्वालियर-चंबल अंचल में दबदबा भी है। इसलिए इनके ऊपर भी भाजपा प्रत्याशियों को जिताने की बड़ी जिम्मेदारी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए ये उपचुनाव सम्मान की लड़ाई हैं। जहां भाजपा ने सिंधिया के साथ कांग्रेस से बगावत करने वालों को टिकट दे दिए हैं, अब सिंधिया का भाजपा में क्या कद होगा ये इसी आधार पर तय होगा कि वो कितने उम्मीदवारों को जिता पाते हैं। अगर आधे से ज्यादा उम्मीदवार हारते हैं, तो सिंधिया को भाजपा में किनारे किया जा सकता है और दूसरी तरफ उनको कांग्रेस के हमले का भी सामना करना पड़ेगा। उपचुनाव में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा की लोकप्रियता का आंकलन भी होगा। शर्मा भी ग्वालियर-चंबल अंचल के नेता हैं।

कमलनाथ के लिए यह आखिरी मौका…
15 साल बाद सत्ता में वापस आने के बाद भी कांग्रेस अपनी सरकार 15 माह ही चला पाई। माना जाता है कि कमलनाथ के कारण ही सिंधिया समर्थक मंत्री और विधायक पार्टी से बाहर हुए और सरकार गिर गई। इसलिए कमलनाथ के ऊपर सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे उपचुनाव में अधिक से अधिक सीटें जीतकर कांग्रेस को सत्ता में वापस लाएं। कमलनाथ के लिए ये शायद आखिरी मौका है कि वो मप्र का सीएम बन पाएं।
कमलनाथ अब 74 साल के हो गए हैं और जब तक मप्र में अगले विधानसभा चुनाव होंगे नाथ की उम्र 77 साल हो चुकी होगी। कांग्रेस में भी राहुल गांधी फिर से कमान संभाल सकते हैं और शायद वो 2023 चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए नया चेहरा चुन सकते हैं। इसलिए कमलनाथ के लिए ये करो या मरो वाली स्थिति है। इस चुनाव में एक और अहम किरदार हैं कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह। तोमर और सिंधिया की तरह ही दिग्विजय सिंह भी ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से आते हैं और ये चुनाव दिग्विजय सिंह के लिए सम्मान की लड़ाई बन गई है। कहा जाता है कि कांग्रेस में रहते हुए और कांग्रेस छोड़ते वक्त भी सिंधिया और दिग्विजय सिंह में तलवारें खिंची हुई थीं। उपचुनाव में दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह भी चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इस बार दिग्विजय सिंह ने खुद को लो-प्रोफाइल रखा है और बेटे को ही आगे किया है। जयवर्धन सिंह भी सीधे कमलनाथ के साथ संपर्क में रहते हुए चुनाव की तैयारियों में लगे हैं।

बरकरार रहेगा उपचुनाव का ट्रैक रिकॉर्ड?
उपचुनाव के बारे में ऐसा देखा गया है कि राज्य स्तर की सत्ताधारी पार्टी उपचुनाव में हमेशा आगे रही है। अलग-अलग राज्यों में ये ट्रेंड बदलता भी दिखता है। मप्र में 2009-2019 के बीच, सत्ताधारी पार्टी ने ही दो-तिहाई उपचुनावों में जीत दर्ज की है। सत्ताधारी पार्टी के इस तरह के प्रदर्शन का रिकॉर्ड तेलंगाना, पंजाब और उत्तराखंड में 90 प्रतिशत से अधिक है। जबकि, उत्तर प्रदेश में 60 प्रतिशत से कम और राजस्थान में 40 प्रतिशत से कम है। इस ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए मप्र में कांग्रेस के लिए 28 में से 20 सीटें जीतना आसान नहीं होगा। लेकिन कांग्रेस पूरे विश्वास के साथ दावा कर रही है कि वह 20 से अधिक सीटें तो जरूर जीतेगी। उधर, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उपचुनाव जीतने में महारथ हासिल है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या उपचुनाव का ट्रैक रिकॉर्ड बरकरार रहेगा? मप्र में विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 116 है। फिलहाल 230 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में 202 सदस्य हैं, जिनमें भाजपा के 107, कांग्रेस के 88, बसपा के दो, सपा का एक तथा चार निर्दलीय विधायक हैं। इस संख्या बल के लिहाज से भाजपा को 230 के सदन में बहुमत के लिए महज 9 सीटें और चाहिए जबकि कांग्रेस को फिर से सत्ता हासिल करने के लिए उपचुनाव वाली सभी 28 सीटें जीतनी होगी। जिन 28 सीटों पर उपचुनाव हो रहा है, उनमें से 25 सीटें तो कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे से खाली हुई हैं, विधायकों के निधन से खाली हुई तीन सीटों में भी दो सीटें पहले कांग्रेस के पास और एक सीट भाजपा के पास थी। कांग्रेस को उम्मीद है कि वह उपचुनाव में अपनी सीटों को वापस पा लेगी।

शिवराज या कमलनाथ
प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक वीथिका में 28 सीटों पर हो रहे उपचुनाव को कमलनाथ, सिंधिया और शिवराज के भविष्य का चुनाव भी कहा जा रहा है। इसलिए चुनावी मोर्चे पर ये तीनों नेता सबसे अधिक सक्रिय दिख रहे हैं। लेकिन मुख्यत: ये उपचुनाव शिवराज और कमलनाथ के बीच में है। शिवराज के ऊपर अपनी सत्ता बरकरार रखने की चुनौती है, वहीं कमलनाथ सत्ता में वापसी की कोशिश में हैं। उपचुनाव में शिवराज एक बार फिर भाजपा की जरूरत बन गए हैं। इसकी वजह यह है कि शिवराज प्रदेश के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनका समन्वय बनाने में कोई सानी नहीं है। अपनी पार्टी ही नहीं विपक्ष से भी समन्वय बनाकर वे काम करते हैं। इसलिए पिछले चुनावों की तरह इस उपचुनाव में भी भाजपा को जिताने की पूरी जिम्मेदारी उनके ऊपर है। यही कारण है कि जो लोग कल तक नाराज थे, वे सभी पार्टी की इज्जत बचाने के लिए सक्रिय हो गए हैं। उदाहरण के लिए कैलाश विजयवर्गीय मालवा-निमाड़़ की 4 सीटों को जिताने के लिए पसीना बहा रहे हैं। उधर ग्वालियर संभाग में केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्रसिंह तोमर, जयभानसिंह पवैया सिंधिया के साथ मिलकर ग्वालियर, चंबल संभाग की 16 सीटों को हर हाल में जिताने में लगे हैं। इसी प्रकार बुंदेलखंड की 4 व अनूपपुर की एक सीट पर दोनों दलों की साख दांव पर है। इस चुनाव में यदि सिंधिया 22 में से 15 सीटें भी जिताते हैं तो वे न केवल अपनी साख बचा ले जाएंगे, अपितु भाजपा में एक बड़़े नेता के रूप में स्थापित हो जाएंगे। जहां शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में पूरी भाजपा उपचुनाव जीतने के अभियान में जुटी हुई है, वहीं कांग्रेस केवल कमलनाथ पर निर्भर है। पार्टी के पास स्टार प्रचारकों की कमी है। आमसभाओं के बजाय नुक्कड़़ सभाएं ही ज्यादातर प्रत्याशी कर रहे हैं, वहीं भाजपा के पास स्टार प्रचारक भी हैं और भीड़़ भी है। इसके साथ ही मोदी फैक्टर भी भाजपा के साथ इस चुनाव में काम कर रहा है। किसानों को बड़़े नेताओं ने आश्वस्त कर दिया है। 28 सीटों पर किसान और जातिगत कार्ड काम करेगा। जिसके साथ किसान होंगे जीत उसी की होगी। प्रदेश में किसान बिल का कोई विरोध नहीं है। प्रधानमंत्री योजना का सीधा लाभ बैंक खातों में बराबर मिल रहा है। इससे काफी हद तक मोदी के प्रति विश्वास बढ़़ा है। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में किसानों के 2लाख के पूरे ऋण माफ नहीं किए थे। कारण था फंड की कमी। इसके कारण सड़क़ें भी नहीं बन पा रही थीं और विकास के कामभी ठप पड़़े थे। इसका भी प्रभाव उपचुनाव में दिखेगा।

दलबदलू नेता बने चुनौती
उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस के सामने एक जैसी चुनौती है। वह चुनौती हंै दलबदलू नेता। दरअसल, उपचुनाव में जहां भाजपा ने 25 सीटों पर उन नेताओं को प्रत्याशी बनाया है, जो कांग्रेस छोडक़र भाजपा में शामिल हुए हैं। वहीं कांग्रेस ने भी 9 दलबदलू नेताओं को टिकट दिया है। कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए सिंधिया समर्थकों के साथ दूसरे नेता भी भाजपा के टिकट से दल बदल के बाद चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में दलबदलू नेताओं के साथ आए उनके कार्यकर्ता भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ कितना घुल मिल गए हैं। यह एक बड़ा सवाल है। इसी तरह भाजपा के कई दलबदलू नेता भी कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में उन नेताओं के समर्थक भाजपा छोडक़र कांग्रेस में आ गए हैं। कांग्रेस में भी भाजपा की तरह ही स्थिति है। ऐसे में दोनों पार्टियों का जोर कार्यकर्ताओं पर फोकस है। दोनों ही पार्टियां भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही है। बूथ लेवल पर भाजपा हो या फिर कांग्रेस अपनी पकड़ को मजबूत कर रही है। भाजपा प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी का कहना है कि उनकी पार्टी संगठन पर आधारित है। संगठन के कहने पर कार्यकर्ता कार्य करता है इसलिए कार्यकर्ता एकजुट है। उम्मीदवारों को जीत दिलाने के लिए पूरा जोर लगा रहा है। उपचुनाव में दलबदल की स्थिति का आंकलन इससे भी लगाया जा सकता है कि 28 विधानसभा में से 9 विधानसभा सीटों-मुरैना जिले की सुमावली और अंबाह, ग्वालियर जिले की ग्वालियर पूर्व और डबरा, दतिया जिले की भांडेर, शिवपुरी की करैरा, गुना जिले की बमोरी, सागर की सुरखी और इंदौर की सांवेर सीट पर जिस प्रत्याशी की जीत होगी, वो दलबदल करने वाला नेता ही होगा। इन सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने दल बदल कर पार्टी में शामिल हुए लोगों को टिकट दिए हैं। यही नहीं, भाजपा ने जहां कांग्रेस से आए 25 नेताओं को टिकट दिया है, तो कांग्रेस ने भाजपा से आए 6, बसपा से आए 2 और बहुजन संघर्ष दल से आए 1 नेता को टिकट दिया है। कांग्रेस मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष भूपेंद्र गुप्ता का दावा है कि उनकी बूथ स्तर पर पकड़ बहुत मजबूत है। यूथ कांग्रेस से लेकर हर एक कार्यकर्ता बूथ लेवल पर तैनात है। 20 लोगों की टीम बूथ लेवल पर लगातार काम कर रही है।

मंत्रियों की किस्मत होगी तय
इस उपचुनाव में प्रदेश सरकार के 14 मंत्रियों (तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत अब मंत्री नहीं हैं) की किस्मत का भी फैसला होने वाला है। कांग्रेस से भाजपा में आए ये 14 मंत्री उपचुनावों में अपनी किस्मत आजमा रहे है। ये हैं सुरखी से गोविंद सिंह राजपूत (जिन्हें हाल ही में मंत्री पद छोडऩा पड़ा), बदनावर से राजवर्धन सिंह, सुवासरा से हरदीप सिंह डंग, दिमनी से गिरराज सिंह दंडोतिया, ग्वालियर से प्रद्युम्न सिंह तोमर, डबरा से इमरती देवी, बमोरी से महेंद्र सिंह सिसोदिया, अनूपपुर से बिसाहूलाल सिंह, सांची से प्रभुराम चौधरी, सांवेर से तुलसीराम सिलावट (जिन्हें हाल ही में मंत्री पद छोडऩा पड़ा), सुमावली से एदल सिंह कंसाना, मेहगांव से ओपीएस भदौरिया, मुंगावली से बृजेंद्र सिंह यादव, पोहरी से सुरेश धाकड़। भाजपा इन मंत्रियों के साथ ही अन्य 14 प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करने के लिए पूरा दम-खम लगा रही है। वहीं कांग्रेस ने अपना पूरा फोकस इन सभी हराने पर लगाया हुआ है। कांग्रेस को उम्मीद है कि वर्ष 2018 की तरह उपचुनाव में भी मंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ेगा। गौरतलब है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने 25 मंत्रियों पर भरोसा जताते हुए उन्हें चुनावी मैदान में उतारा था। मगर इनमें से 13 को हार का सामना करना पड़ा था। केवल 12 मंत्री ही चुनाव जीत सके थे। हारने वालों में भाजपा सरकार में वित्त मंत्री रहे जयंत मलैया, ओम प्रकाश धुर्वे, रुस्तम सिंह, अर्चना चिटनिस, उमाशंकर गुप्ता, अंतर सिंह आर्य, जयभान सिंह पवैया, नारायण सिंह कुशवाहा, दीपक जोशी, लाल सिंह आर्य, शरद जैन, ललिता यादव, बालकृष्ण पाटीदार के नाम शामिल हैं। वहीं वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा सरकार के 10 मंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ा था। इनमें अजय विश्नोई, लक्ष्मीकांत शर्मा, रामकृष्ण कुसमरिया, करण सिंह वर्मा, अनूप मिश्रा, जगन्नाथ सिंह, कन्हैयालाल अग्रवाल, हरिशंकर खटीक, बृजेंद्र प्रताप सिंह और दशरथ लोधी हार के चलते विधानसभा की दहलीज नहीं पहुंच सके थे।

क्या उम्मीदों पर खरा उतर पाएंगे सिंधिया?
देशभर में इस समय चर्चा का विषय यह बना हुआ है कि क्या मप्र में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार बनेगी या कांग्रेस छोडक़र भाजपा का दामन थामने वाले नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कुछ जोरदार कमाल करेंगे। देश की जनता को इसका इंतजार है और उनका यह इंतजार 10 नवंबर को खत्म होगा। इसी बीच मप्र भाजपा के अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा का कहना है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने से भाजपा की ताकत बढ़ी है। यह भाजपा के कार्यकर्ताओं ने भी महसूस किया है और वह सभी की सभी 28 सीटों पर पार्टी की जीत सुनिश्चित करने में लग गए हैं। गौरतलब है कि कांग्रेस विधायकों के एक वर्ग में विद्रोह होने से 15 माह पुरानी कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार मार्च माह में गिर गयी थी। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की सरकार प्रदेश में बनी। अब जब उपचुनाव हो रहा है तो भाजपा को उम्मीद है कि सिंधिया अपने समर्थकों के साथ ही अन्य भाजपा प्रत्याशियों को विजयश्री दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। लेकिन विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह सिंधिया का विरोध देखने को मिला उससे सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या सिंधिया भाजपा की उम्मीदों पर खरा उतर पाएंगे। यह सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि भाजपा के चुनाव अभियान की पूरी कमान शिवराज सिंह चौहान ने संभाल रखी है। यानी भाजपा का चुनावी चेहरा शिवराज ही बने हुए हैं। जबकि पूर्व में कहा जा रहा था कि भाजपा उपचुनाव सिंधिया के चेहरे पर लड़ेगी। यही नहीं भाजपा ने जब स्टार प्रचारकों की सूची जारी की तो उसमें भी सिंधिया 10वें नंबर पर थे। इसको लेकर कांगे्रस ने सिंधिया पर जमकर कटाक्ष भी किया था। कांग्रेस और भाजपा के कई नेता इस उपचुनाव को ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए अहम मान रहे हैं। सिंधिया के लिए उपचुनाव करो या मरो जैसा है। सिंधिया के भाषण, उनके मैराथन प्रयास से भी इसी तरह के संकेत मिल रहे हैं। हालांकि भाजपा के नेताओं का कहना है कि अब वह हमारे नेता हैं। उनका मान-सम्मान और अपमान सब हमारा है। इसलिए पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ रही है। लेकिन राजनीति में नतीजा काफी मायने रखते हैं। उपचुनाव में अपने क्षेत्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए यह नतीजा काफी असर डालेगा। अभी वह केवल राज्यसभा सांसद हैं। अगर नतीजा ठीक नहीं आया तो आगे उनके राजनीतिक कैरियर और भाजपा में मान-सम्मान में इसका फ्लेवर दिखाई दे सकता है।

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