अगर बसपा चुनाव नहीं लड़ती तो कांग्रेस को चार सीटें और मिलती

ग्वालियर चम्बल की चुनावी जंग में बहनजी की बसपा ने किया कमाल

भोपाल/मनीष द्विवेदी/मंगल भारत। मध्यप्रदेश में हाल ही हुए उपचुनावों में ग्वालियर चम्बल संभाग की 16 विधानसभा सीटों में बहुजन समाज पार्टी गेम चैंजर साबित हुई है। अगर बसपा चुनाव नहीं लड़ती तो कांग्रेस को चार सीटें और मिलती। हालांकि 28 सीटों पर हुए चुनावों में भाजपा ने 19 सीटें जीतकर अपनी सरकार कायम रखी। लेकिन कांग्रेस को बसपा ने ग्वालियर चम्बल संभाग में जोर का झटका धीरे से दिया वहीं भाजपा का भी बसपा ने नुकसान किया। कांग्रेस को इस अंचल की 16 सीटों में से 7 सीटें मिली वंही भाजपा ने 9 सीटों पर जीत हासिल की। उपचुनावों के परिणाम के बाद जारी वोटों के आंकड़ों के अनुसार करीब 6 ऐसी सीटें हैं, जहां बसपा के प्रदर्शन का प्रभाव कांग्रेस और भाजपा की हार जीत पर पड़ा। हालांकि ग्वालियर चम्बल संभाग में बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई लेकिन उसने कई सीटों पर बीजेपी और कांग्रेस के उम्मीदवारों का खेल बिगाड़ दिया।
अबकी बार बसपा का वार
इस बार के बड़े उपचुनाव में बसपा ने ग्वालियर चम्बल की 16 सीटों में से 5 सीटों पर पांच अंकों में वोट हासिल किए। इनमें से 2 सीटों जौरा सीट पर बसपा उम्मीदवार सोनेराम कुशवाहा को 47 हजार 881 वोट मिले, जबकि मुरैना सीट से बसपा प्रत्याशी राम प्रकाश राजौरिया को 42 हजार 388 वोट मिले। इसके अलावा 2 सीटों मेहगांव में बसपा उम्मीदवार योगेश नरवरिया को 21 हजार 960 व मलहरा सीट से अखंड प्रताप सिंह को 20 हजार 424 वोट मिले। दिमनी से बसपा प्रत्याशी को 10 हजार 235 वोट मिले। यह ग्वालियर चम्बल अंचल की वही सीटें है जिनपर भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव था और है। इस इलाके की पांच सीटों पर चुनाव परिणाम प्रभावित करने में बसपा उम्मीदवारों की भूमिका अहम रही।
भाजपा ने सबको पछाड़ा
इस बार उपचुनावों में भाजपा को मिली शानदार सफलता ने सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों के अरमानों पर पानी फेर दिया है। भाजपा और कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में सपा, बसपा और निर्दलीय विधायक ब्लैकमेलिंग की राजनीति करनी वाले थे े लेकिन कुल 28 में से 19 सीटें जीतकर भाजपा अब खुद ‘किंगमेकर’ की भूमिका में है। चुनाव के बाद से भाजपा और कांग्रेस सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों के संपर्क में थी, ताकि जरूरत पड़ने पर सरकार बनाने के लिए उनका समर्थन लिया जा सके। दो निर्दलीय विधायकों ने उपचुनाव के बाद भाजपा का समर्थन करने की बात कही थी। लेकिन इसकी जरुरत नहीं पड़ी पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं, जो बहुमत के आंकड़े से 2 कम थीं। तब कांग्रेस ने एक सपा, दो बसपा और चार निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई थी। निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल को कमलनाथ सरकार में मंत्री बनाया गया था। बाकी के छह विधायक भी उन्हें मंत्री बनाए जाने को लेकर तत्कालीन सीएम कमलनाथ पर दबाव बनाते रहते थे। निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा, प्रदीप जायसवाल, केदार डावर, सुरेंद्र सिंह शेरा और विक्रम सिंह राणा निर्दलीय विधायक हैं। राजेश शुक्ला सपा से, संजीव सिंह कुशवाह, रामबाई सिंह बसपा से विधायक हैं लेकिन अब सब ठीक रहेंगे क्योकि भाजपा ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत से कही अधिक सीटें हासिल कर ली है। उपचुनावों में जीत के बाद बीजेपी की सीटें 107 से बढ़कर 126 हो गई हैं। जबकि बहुमत के लिए 115 सीटें होनी चाहिए। अब बीजेपी के पास बहुमत से 11 सीटें ज्यादा हैं।
सिंधिया की साख और बसपा फैक्टर
प्रदेश में 28 सीटों पर उपचुनाव के नतीजों से सिंधिया राजघराने का ग्वालियर चम्बल संभाग में दबदबे का फैसला भी हो गया है। सिंधिया शाही परिवार का गढ़ मानी जाने वाली ग्वालियर-चंबल की 16 सीटों पर उनकी साख दांव पर लगी हुई थी , 9 सीटों की जीत ने काफी हद तक इस साख को बरकरार रखा लेकिन , बसपा ने भी काफी हद तक अपनी स्थिति मजबूत की। ग्वालियर चंबल क्षेत्र की हर सीट पर सिंधिया ने काफी पसीना बहाया था , यह पूरा इलाका सिंधिया घराने के प्रभाव का माना जाता है तभी तो पिछले चुनावों में यहां कि सारी सीटों पर कांग्रेस के विधायक जीत कर आए थे। यह सभी बागी विधायक सिंधिया के भरोसे चुनाव मैदान में थे। लेकिन इस बार बसपा ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को अपनी मौजूदगी का एहसास करवाया और भाजपा को यहां से दो सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और कांग्रेस चार सीटों पर हारी।

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