अब श्रीमंत समर्थकों का पुनर्वास असंभव

भाजपा के कार्यकर्ताओं, नेताओं की अनदेखी नहीं कर सकते

भोपल।मनीष द्विवेदी/मंगल भारत। उपचुनाव में पार्टी की जीत के बाद अब यह तय माना जा रहा है कि श्रीमंत समर्थक जो नेता उपचुनाव में हार गए हैं उनका पुनर्वास नहीं होगा। फिलहाल इसी कदम के चलते कुछ समय के लिए मंत्रिमंडल विस्तार को टाला गया है। हालांकि चुनाव परिणाम आने से पहले माना जा रहा था कि मतगणना के तत्काल बाद प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार हो सकता है। उपुचनाव में श्रीमंत के तीन समर्थक मंत्री खेत रहे हैं। इसके चलते अब प्रदेश मंत्रिमंडल में छह पद रिक्त हैं। इन पदों पर किसे मौका मिलेगा और किसे नहीं इसको लेकर कयासों का दौर जारी है। दरअसल श्रीमंत खेमा चाहता है कि उनके खेमे के लोगों के हारने की वजह से यह तीन पद रिक्त हुए हैं, लिहाजा इन पदों पर उनके ही समर्थक विधायकों को मौका मिलना चाहिए। खास बात यह है कि सूत्रों की मानें तो इन तीन मंत्री पदों के लिए उपचुनाव जीते अपने समर्थक विधायकों के चयन को लेकर कसरत तक शुरू की जा चुकी है। यह बात अलग है कि भाजपा नेतृत्व इसके लिए तैयार नहीं है। कहा जा रहा है कि अब मंत्रिमंडल में रिक्त सभी पदों पर भाजपा उन विधायकों से भरने के पक्ष में हैं, जो पात्र होने के बाद भी श्रीमंत समर्थकों की वजह से मंत्री नहीं बन सके थे। कहा तो यह भी जा रहा है कि अब किसी भी श्रीमंत समर्थक को मंत्री पद नहीं दिया जाएगा। हां इतना जरूर कहा जा रहा है कि कुछ श्रीमंत समर्थकों को जरुर निगम मंडलों में नियुक्ति कर उन्हें मंत्री पद का दर्जा दिया जा सकता है।
विस्तार में होगी देरी
विस्तार में जगह पाने को लेकर श्रीमंत की जिद के चलते ही मंत्रिमंडल विस्तार को टाला जा रहा है। दरअसल श्रीमंत चाहते हैं कि उनके समर्थक विधायकों को मौका मिले जबकि भाजपा पूरी तरह से इसके पक्ष में नहीं है। इसके चलते विस्तार को और कुछ दिनों के लिए टाला जाना तय है। दरअसल भाजपा अपने वरिष्ठ विधायकों को शपथ दिलाने के पक्ष में है।
हार से नाराज हैं इमरती
श्रीमंत समर्थक इमरती देवी उपुचनाव में मिली अपनी हार से बेहद नाराज हैं। चुनाव परिणाम आने के बाद वे अपनी नाराजगी का इजहार सार्वजनिक रुप से भी कर चुकी हैं। उनका कहना था कि वे पहले ही बता चुकीं थीं कि उनकी डबरा विधानसभा सीट का मिजाज कांग्रेसी है, जिसकी वजह से उनका भाजपा के टिकट पर जीतना मुश्किल है। यही नहीं वे हार के बाद मंत्री पद से इस्तीफा देने का भी तैयार नही हैं। दरअसल वे चाहती हैं कि हार के बाद भी उनका मंत्री पद बरकरार रखा जाए। उनकी नाराजगी दूर करने के लिए श्रीमंत उनका हर हाल में सरकार में पुनर्वास चाहते हैं। उधर , श्रीमंत के एक और समर्थक मंत्री गिर्राज दंडौतिया भी चुनाव हार गए हैं। इसके बाद भी उनके द्वारा अब तक मंत्री पद से इस्तीफा नही दिया गया है। इसे श्रीमंत समर्थकों द्वारा सरकार पर दबाव बनाने के रुप में देखा जा रहा है। हालांकि अभी उनके बगैर विधायक रहते छह माह तक मंत्री रहने की अवधि पूरी नही हुई है , लेकिन हार के बाद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की पंरपरा है।
सिलावट और राजपूत को ही मिलेगा मौका
मंत्रिमंडल विस्तार में इस बार श्रीमंत खेमें से सिर्फ गोविंद सिंह राजपूत एवं तुलसी सिलावट को ही मौका मिलेगा। इन दोनों ही नेताओं ने उपचुनाव के दौरान तकनीकि कारणों से मंत्रि पद से इस्तीफा दे दिया था। इसकी वजह से छह में से दो पद श्रीमंत के खाते में और चार पद भाजपा के खाते में जाना तय है। भाजपा चार पदों पर अपने ही वरिष्ठ विधायकों को शपथ दिलाने का मन बना चुकी है।

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