लोकसभा सचिवालय ने भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता में 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के गठन की घोषणा की है, जिसमें भाजपा के 15 सांसद, एनडीए सहयोगियों के 11 सांसद और विपक्ष के चार सांसद शामिल हैं. यह समिति गंभीर आपराधिक आरोपों में गिरफ़्तार सीएम और मंत्रियों को हटाने संबंधी तीन विधेयकों की जांच करेगी.

नई दिल्ली: लोकसभा सचिवालय ने बुधवार (12 नवंबर) को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता में 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन की घोषणा की. यह समिति गंभीर आपराधिक आरोपों में गिरफ्तार प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को हटाने संबंधी तीन विधेयकों की 30 दिनों तक जांच करेगी.
जेपीसी में भाजपा के 15 सांसद, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगियों के 11 सांसद और विपक्ष के चार सांसद शामिल हैं.
गौरतलब है कि एनसीपी (सपा) की सुप्रिया सुले जेपीसी में इंडिया ब्लॉक की एकमात्र सांसद हैं. जेपीसी में शामिल अन्य विपक्षी सांसदों में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के असदुद्दीन ओवैसी, शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) की हरसिमरत कौर बादल और युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) के एस. निरंजन रेड्डी शामिल हैं.
द वायर ने पिछले महीने रिपोर्ट किया था कि कांग्रेस सहित इंडिया ब्लॉक के सांसदों ने जेपीसी का बहिष्कार करने का फैसला किया है और इस फैसले से केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू को अवगत करा दिया है.
इससे पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), आम आदमी पार्टी (आप), समाजवादी पार्टी (सपा) और शिवसेना (यूबीटी) ने कहा था कि वे जेपीसी से दूर रहेंगे.
जेपीसी के गठन की घोषणा के बाद कांग्रेस सांसद और लोकसभा में पार्टी के सचेतक मणिकम टैगोर ने इसे ‘मोदी के असंवैधानिक एजेंडे के लिए रबर स्टैंप’ कहा है.
उन्होंने कहा, ‘यह जेपीसी मोदी के असंवैधानिक एजेंडे के लिए एक रबर स्टैंप के अलावा और कुछ नहीं है. इसे संयुक्त संसदीय समिति कहना मज़ाक है – जब बहुसंख्यक भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने वाला संयुक्त विपक्ष अनुपस्थित है.’
उन्होंने कहा, ‘340 सांसदों ने बहिष्कार किया है क्योंकि इस सरकार ने आम सहमति या संसदीय नैतिकता के बिना जेपीसी का गठन किया था. वोट से बाहर होने के बाद भी, वोटचोरी मोदी सरकार संस्थाओं का दुरुपयोग कर रही है, संसद को ध्वस्त कर रही है, और अब — संविधान को ही फिर से लिख रही है. इतिहास इसे उस दिन के रूप में याद रखेगा जब भाजपा ने लोकतंत्र को औपचारिक रूप से मिटाने की कोशिश की थी.’
ज्ञात हो कि इस साल 20 अगस्त को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025; केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार (संशोधन) विधेयक, 2025; और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025 पेश किए थे. शुरुआत से ही विपक्ष ने तीनों विधेयकों का विरोध किया था, जिसके बाद इन्हें जेपीसी को भेजा गया था.
यह विधेयक केंद्र या राज्य के उस मंत्री को हटाने का प्रावधान करता है, जिसे किसी अपराध के आरोप में 30 दिनों तक हिरासत में रखा गया हो. नए नियम के बारे में बिल में कहा गया है कि किसी चुने हुए मुख्यमंत्री को भी पद से हटाया जा सकता है, अगर उन्हें 30 दिन या उससे अधिक समय तक हिरासत में रखा जाता है या गिरफ्तार किया जाता है, भले ही उनका दोष साबित न हुआ हो. यह संशोधन प्रधानमंत्री पर भी लागू होगा. यानी राष्ट्रपति को यह अधिकार होगा कि वे प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर सकें.
विधेयकों के पेश होने के बाद लोकसभा में विपक्षी सदस्यों ने विरोध करते हुए कहा था कि ये विधेयक ‘पुलिस स्टेट’ बनाने का रास्ता प्रशस्त करते हैं, उचित प्रक्रिया का उल्लंघन करते हैं, और राजनीतिक दुरुपयोग में लाए जा सकते हैं.