नीतीश की जीत, पांच वजहें: महिलाओं का भरोसा, ‘जंगलराज’ का डर, सिमटा गठबंधन

बिहार चुनाव के शुरुआती रुझान जदयू को बड़ी बढ़त देते दिख रहे हैं, जिससे नीतीश कुमार की मजबूत पकड़, महिला वोटरों का भरोसा, ‘जंगल राज’ नैरेटिव की सफलता और महागठबंधन की सीमित सामाजिक पहुंच उजागर होती है. 2020 की तुलना में जदयू अपने प्रदर्शन को लगभग दोगुना करती नजर आ रही है.

नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव के लिए मतगणना जारी है. शुरुआती रुझानों में नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) अप्रत्याशित प्रदर्शन करती नजर आ रही है. जदयू 78 सीटों पर आगे चल रही है, एनडीए में पहली बार जदयू के बराबर 101 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा इस समय 80 सीट पर आगे चल रही है.

महागठबंधन बुरी तरह पिछड़ रहा है. अगर यह रुझान नतीजों में बदलते हैं तो नीतीश कुमार की बड़ी जीत मानी जाएगी.

इस परिणाम को पांच प्रमुख बिंदुओं के ज़रिये देखा जा सकता है:

पहला, नीतीश की पकड़ अपने वोटर के बीच न सिर्फ़ बनी हुई है, उन्होंने अपना विस्तार भी किया है. इसे इस तरह देखें कि 2020 में जदयू को मात्र 43 सीटों पर जीत मिली थी और अब नीतीश कुमार की पार्टी अपनी सीट को लगभग दोगुना करती नज़र आ रही है.

20 साल से लगातार शासन में रहने के बाद जदयू का प्रदर्शन बताता है कि अपने मतदाताओं पर नीतीश कुमार की पकड़ अब भी मजबूत है. उनके गिरते स्वास्थ्य की तमाम खबरों के बावजूद जनता को उन पर भरोसा है.

दूसरा, महिला मतदाताओं के बीच नीतीश की छवि. चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार की महिलाओं के खाते में दस-दस हजार रुपये भेजे थे. पहले भी नीतीश सरकार की नीतियों के केंद्र में महिलाएं रही हैं, चाहे वह पंचायत चुनाव में महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण हो या बिहार पुलिस में 35 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए रिजर्व रखने की बात हो.

इसके अलावा नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी का फैसला भी महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा के मद्देनजर लिया था. नीतीश सरकार द्वारा स्कूली बच्चियों को साइकिल की योजना भी जनता द्वारा काफी सराही गई है.

तीन, नैरेटिव बिल्डिंग यानी मिथक का निर्माण. इसे इस उदाहरण से देख सकते हैं. बीस साल से नीतीश मुख्यमंत्री बने हुए हैं लेकिन एनडीए मतदाता के भीतर उस जंगल राज का डर बिठाने कामयाब रहा जिसके लिए लालू यादव का बिहार बहुत पहले जाना जाता था. खुद लालू अरसे से सक्रिय राजनीति से दूर हैं, लेकिन उनकी पार्टी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं ने खौफ की तरह प्रस्तुत किया.

चार, तेजस्वी अपना सामाजिक विस्तार न कर सके. राष्ट्रीय जनता दल अभी भी मुस्लिम यादव की पार्टी मानी जाती है. इसके विपरीत एनडीए और जदयू का गठबंधन कहीं बड़े सामाजिक भूगोल को समेटता है.

पांच, महागठबंधन के अन्य दल भी अपना पिछला प्रदर्शन नहीं दोहरा पा रहे हैं. 2020 के चुनाव में 75 सीट जीतने वाली राजद 30-35 सीटों पर आगे चल रही है, 19 जीतने वाली कांग्रेस मात्र पांच सीटों पर आगे चल रही हैं, 12 सीट जीतने वाली सीपीआई-माले 7 सीटों पर आगे है.