भोपाल गैस त्रासदी: संगठनों का आरोप- गैस पीड़ितों के स्वीकृत 272.75 करोड़ रुपये ख़र्च नहीं किए

भोपाल में यूनियन कार्बाइड गैस हादसे से प्रभावित समुदायों के बीच काम करने वाले संगठनों ने आरोप लगाया कि त्रासदी के पीड़ित लोगों के लिए 272.75 करोड़ रुपये स्वीकृत किए थे. यह धनराशि 75:25 के अनुपात में मध्य प्रदेश सरकार को सौंपी गई, इसमें से 139 करोड़ रुपये से अधिक धनराशि ख़र्च ही नहीं की गई है.

: भोपाल में यूनियन कार्बाइड गैस हादसे से प्रभावित समुदायों के बीच काम करने वाले चार संगठनों ने आरोप लगाया कि त्रासदी के पीड़ित लोगों के लिए स्वीकृत 272 करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च नहीं की गई.

बता दें कि 2-3 दिसंबर 1984 की दरमियानी रात हुई भोपाल गैस त्रासदी में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के कीटनाशक संयंत्र से अत्यधिक जहरीली गैस का रिसाव हुआ था, जिससे हजारों लोग मारे गए थे और लाखों लोग आज भी दीर्घकालिक प्रभावों से जूझ रहे हैं.

संगठनों ने कहा कि सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2010 में भारत सरकार के मंत्रियों के समूह (GoM) ने भोपाल के लिए चिकित्सा, सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पुनर्वास हेतु 272.75 करोड़ रुपये स्वीकृत किए थे. यह धनराशि 75:25 के अनुपात में मध्य प्रदेश सरकार को सौंपी गई. इसमें से 139 करोड़ रुपये से अधिक धनराशि खर्च ही नहीं की गई है.

उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि जो राशि खर्च दिखाई गई है, उसका भी अधिकांश हिस्सा गैस पीड़ितों को किसी वास्तविक लाभ में परिवर्तित नहीं हुआ है. हालांकि गैस प्रभावितों और उनके बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हेतु 33 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे, लेकिन अधिकांश सुविधाएं आज भी निष्क्रिय पड़ी हैं.

भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की रशीदा बी ने कहा, ‘वर्ष 2021 में तीन गैस राहत अस्पतालों में मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर बनाए गए, लेकिन सर्जन और एनेस्थेटिस्टों की कमी के कारण एक भी बड़ी सर्जरी नहीं हुई. सोनोग्राफी एवं टीएमटी मशीनों सहित कई आवश्यक डायग्नोस्टिक उपकरण खरीदे गए, परंतु उन्हें संचालित करने के लिए प्रशिक्षित तकनीशियन नियुक्त नहीं किए गए. जिन अस्पतालों में आईसीयू तक नहीं हैं, वहां केंद्रीय ऑक्सीजन लाइनें लगाई गईं. रोगियों के लिए निर्मित कैंटीनें स्टाफ की अनुपस्थिति के कारण बंद पड़ी हैं.’

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मॉनिटरिंग समिति की ताजा रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञ डॉक्टरों के 90 प्रतिशत और सामान्य डॉक्टरों के 50 प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हैं, क्योंकि योग्य विशेषज्ञों की नियुक्ति से कमीशन नहीं मिलता, इसलिए ये महत्वपूर्ण पद आज तक खाली हैं.

संगठनों ने आरोप लगाया कि सामाजिक पुनर्वास की निधि का भी भारी दुरुपयोग हुआ है. उन्होंने कहा कि 2012 में गैस प्रभावितों को योग चिकित्सा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 3.63 करोड़ रुपये की लागत से सात योग केंद्र बनाए गए. लेकिन न तो एक भी योग थेरेपिस्ट नियुक्त किया गया और न ही आज तक किसी केंद्र में कोई योग कराया गया जबकि इसके पुख्ता सबूत है की योग से गैस पीड़ितों के फैफड़ों, मानसिक और अन्य तकलीफो में फ़ायदा हुआ है.

भोपाल गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के बालकृष्ण नामदेव ने कहा, ‘इन केंद्रों में से कई अब विवाह स्थलों के रूप में उपयोग हो रहे हैं. इसी प्रकार, 5 करोड़ रुपये शौचालयों और डस्टबिन पर खर्च किए गए, जो पीड़ितों की ज़रूरतों से कोई संबंध नहीं रखते. जबकि आपदा में अपने परिवार खो चुकी 500 से अधिक विधवाओं को पिछले चार वर्षों से पेंशन नहीं मिली. दुर्घटना से तबाह हुए परिवारों की सहायता के लिए मिली राशि को बेकार के निर्माण कार्यों में लुटा दिया गया.’

संगठनों ने कहा कि प्रशासनिक विफलता का सबसे भयावह उदाहरण विधवा कॉलोनी की स्थिति है, जिसे गैस हादसे में विधवा हुई महिलाओं और अनाथ बच्चों के लिए बनाया गया था. वर्ष 2014 में यहां की सीवेज व्यवस्था सुधारने के लिए 5 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे. लेकिन दस वर्ष बाद भी एक भी नाली काम नहीं कर रही है.

भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा की नसरीन बी ने कहा, ‘बरसात के मौसम में सीवेज का पानी विधवाओं के घरों में घुस जाता है. 5 करोड़ रुपये खर्च किए जाने के बाद भी कॉलोनी में एक भी कार्यशील सीवेज लाइन नहीं है—यह लालच की हद है.’