सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बरक़रार रखते हुए कहा है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार संबंधी अपराधों के मामले में राज्य पुलिस अधिकारी बिना सीबीआई से पूर्व अनुमति लिए केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के ख़िलाफ़ जांच कर सकते हैं और आरोप पत्र दाखिल कर सकते हैं.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (पीसी एक्ट) के तहत रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के अपराधों के मामले में राज्य पुलिस अधिकारी केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के ख़िलाफ़ जांच कर सकते हैं और आरोप पत्र दाखिल कर सकते हैं.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि राज्य पुलिस द्वारा केंद्र सरकार के किसी कर्मचारी के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करने से पहले सीबीआई से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है.
उल्लेखनीय है कि जस्टिस जेबी परदीवाला और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ अक्टूबर 2015 के राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई कर रही थी.
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें राज्य भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (एसीबी) द्वारा केंद्र सरकार के एक कर्मचारी के ख़िलाफ़ दर्ज भ्रष्टाचार के मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था.
अदालत ने फैसला सुनाया कि किसी राज्य पुलिस एजेंसी को केंद्रीय सरकारी कर्मचारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने या आरोपपत्र दाखिल करने के लिए सीबीआई की पूर्व अनुमति या सहमति की आवश्यकता नहीं है.
अदालत ने यह भी कहा कि सीबीआई की संलिप्तता के आधार पर राज्य की भ्रष्टाचार-विरोधी एजेंसी द्वारा शुरू की गई कार्यवाही को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता.
याचिका को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने बताया कि उच्च न्यायालय ने यह मानने में सही दृष्टिकोण अपनाया है कि ऐसे मामलों में केवल सीबीआई ही अभियोजन चला सकती है, यह कहना गलत है.
अख़बार के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम 1946, जिसके तहत सीबीआई का गठन किया गया था, केंद्रीय एजेंसी को केंद्र सरकार के कर्मचारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अन्य सक्षम कानूनों के तहत संज्ञेय अपराधों की जांच करने के राज्य पुलिस के अधिकार को खत्म नहीं करता है.
अदालत ने आगे कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156 के तहत किसी भी पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना संज्ञेय अपराध की जांच कर सकता है और जांच का अधिकार न होने के आधार पर ऐसी कार्रवाई पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है.