पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की सेंसर की गई किताब में एक फोन कॉल के ज़िक्र को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. किताब के अनुसार, इस कॉल में भारत-चीन सीमा पर अत्यधिक तनाव के दौर में सेना को दिए गए राजनीतिक निर्देश महज़ ‘जो उचित समझो, वो करो’ थे. हालांकि इसके अलावा भी किताब ऐसे कई सवाल उठाती है, जिनके जवाब दिए जाना ज़रूरी है.
नई दिल्ली: पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे द्वारा अपनी किताब में जिक्र किए गए एक फोन कॉल के इर्द-गिर्द संसद के मौजूदा बजट सत्र में विवाद गहराता जा रहा है. किताब के अनुसार, इस कॉल में भारत-चीन सीमा पर अत्यधिक तनाव के दौर में सेना को दिए गए राजनीतिक निर्देश महज़ ‘जो उचित समझो, वो करो’ तक सीमित थे.
इसे लेकर विपक्ष मोदी सरकार पर अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटने (abdication) के आरोप लगा रही है और कई सवाल खड़े कर रही है.
द कारवां में प्रकाशित पूर्व थलसेना प्रमुख की अब तक सेंसर की गई आत्मकथा फोर स्टार ऑफ डेस्टिनी के विवरण में इससे भी गंभीर सवाल सामने आते हैं.
मई के दूसरे हफ्ते में गलवान में हुई ब्रिगेड कमांडरों की बैठक के बाद चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने वहां टेंट लगा दिए थे. इसी गलवान में 2020 में भारत के 20 सैनिक मारे गए थे. भारतीय सेना के नॉर्दर्न कमांड और 14 कॉर्प्स ने इसे कोई बड़ा मुद्दा नहीं माना, लेकिन 15 जून 2020 को उन्हें वहां जाकर अपने टेंट लगाने का आदेश दिया गया. जनरल नरवणे अपनी सेंसर की गई आत्मकथा में घटनाक्रम से असंतुष्ट दिखते हैं और लिखते हैं कि वे इससे ‘पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे.’ सवाल यह है कि दिल्ली से ये आदेश किसने दिए?
जनरल नरवणे यह भी लिखते हैं कि अगस्त 2020 में, गलवान में 20 सैनिकों की मौत के महज़ 11 हफ्ते बाद, राजनीतिक नेतृत्व ने ‘प्रोटोकॉल’ का हवाला देते हुए सेना को पीएलए पर गोली चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था. सेना के ज़ोर देने पर गोली चलाने की इजाज़त दी गई, लेकिन कड़ी पाबंदियों के साथ. जबकि मोदी सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि उसने सीमा पर कार्रवाई के लिए सशस्त्र बलों को ‘फ्री हैंड’ दिया हुआ है. ऐसे में सच क्या है?
जब भारत और चीन के बीच कॉर्प्स कमांडरों की बैठकों का सिलसिला शुरू हुआ, तब विदेश मंत्रालय ने सेना के उस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया, जिसमें बैठकों की कार्यवाही (मिनट्स) दर्ज करने की बात कही गई थी. ऐसा होने से भारत, चीन को उसकी बातों पर जवाबदेह ठहरा सकता था और इसके गंभीर नतीजे हो सकते थे. जनरल नरवणे के इस विवरण में सवाल उठता है कि उस वक्त राजनीतिक नेतृत्व कहां था?
सबसे अहम सवाल डिसएंगेजमेंट (पीछे हटने) के संदर्भ बिंदु को लेकर है. भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को लेकर कोई सहमति नहीं है. नरवणे लिखते हैं कि उन्होंने और सैन्य संचालन महानिदेशक (डीजीएमओ) ने एक समाधान निकाला. दोनों पक्ष अपने-अपने संदर्भ बिंदु तय करें और वहां से समान दूरी तक पीछे हटें. इससे किसी एक विवादित रेखा को तय करने से बचा जा सका. लेकिन बफर ज़ोन बनाते समय भारतीय पक्ष ने चीनी दावों को प्राथमिकता दी, क्योंकि भारत ने उन बिंदुओं से भी समान दूरी तक पीछे हटने पर सहमति दी, जहां तक पीएलए मई 2020 में घुसपैठ कर चुकी थी. नतीजतन, ज़्यादातर बफर ज़ोन भारतीय पक्ष में ही बने. यह भविष्य की वार्ताओं के लिए एक मानक बन गया है.
भारत-चीन सीमा पर टकराव के दौरान 15 जून 2020 को 20 भारतीय सैनिक मारे जाने के बाद एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई थी. उस बैठक में प्रधानमंत्री ने विवादित बयान देते हुए कहा था, ‘ना कोई घुसा था, ना कोई घुसा है.’ इसके बाद वर्षों में भारत द्वारा झेले गए अन्य संघर्षों के उलट, न तो किसी तरह की प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई और न ही विस्तृत ब्रीफिंग दी गई.
संसद में पूछे गए सवालों और बहसों को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर दबा दिया गया. जबकि 1962 के भारत–चीन युद्ध के दौरान संसद में हुई बहसों में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू स्वयं सवालों के जवाब देते दिखाई देते हैं.
इस समय चल रहे संसद के बजट सत्र में लोकसभा कार्यवाही चलने नहीं दी गई है. सत्तारूढ़ पक्ष (जिसमें तीन मंत्री और लोकसभा स्पीकर भी शामिल हैं) ने भारत-चीन सीमा विवाद के दौरान राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका और सीमा से जुड़े समझौतों पर चर्चा की अनुमति नहीं दी. इसके अलावा, आठ विपक्षी सांसदों को सदन से निलंबित कर दिया गया. लोकसभा के नियम 349 का हवाला देते हुए दो दिनों तक सदन की कार्यवाही बाधित रखी गई.
इसी दौरान, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 3 फरवरी को स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर कहा कि ‘अभूतपूर्व स्थिति’ में उन्हें राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोका गया, जो ‘संसद के इतिहास में पहली बार’ हुआ है. उन्होंने इसे ‘लोकतंत्र पर धब्बा’ बताया.
गांधी ने अपने पत्र में लिखा कि सरकार के दबाव में स्पीकर को उन्हें बोलने से रोकना पड़ा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उन्हें बोलने से रोकने के लिए ‘जानबूझकर प्रयास’ किया जा रहा है.