लोकसभा में बोलने से रोके जाने पर राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखा- यह लोकतंत्र पर धब्बा

नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर कहा कि ‘अभूतपूर्व’ स्थिति में उन्हें राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोका गया. उन्होंने कहा कि यह ‘संसद के इतिहास में पहली बार’ हुआ है और यह ‘लोकतंत्र पर एक धब्बा’ है. गांधी ने पत्र में आरोप लगाया कि सरकार के कहने पर अध्यक्ष को उन्हें बोलने से रोका.

नई दिल्ली: राहुल गांधी ने मंगलवार (3 फरवरी) को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर कहा कि एक ‘अभूतपूर्व’ स्थिति में उन्हें राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोका गया. उन्होंने इसे ‘संसद के इतिहास में पहली बार’ बताया और कहा कि यह ‘लोकतंत्र पर एक धब्बा’ है. गांधी ने पत्र में आरोप लगाया कि सरकार के कहने पर अध्यक्ष को उन्हें बोलने से रोकना पड़ा, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उन्हें बोलने से रोकने की ‘जानबूझकर कोशिश’ की जा रही है.

यह पत्र ऐसे समय आया, जब उसी दिन राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान अपना भाषण फिर से शुरू करने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि उन्होंने द कारवां में प्रकाशित पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित संस्मरण पुस्तक से जुड़े लेख को प्रमाणित किया है. इस लेख में किताब के अंश शामिल हैं जिसमे वर्ष 2020 में चीनी सैनिकों की गतिविधियों का उल्लेख है.

सोमवार (2 फरवरी) को जब गांधी ने लेख में कोट किए गए किताब के अंश पढ़ने की कोशिश की, तब सत्तापक्ष की ओर से भारी हंगामा हुआ. इसके बाद ओम बिरला ने नियम 349 का हवाला देते हुए उन्हें ऐसा करने से रोक दिया. मंगलवार को गांधी ने लेख को सीधे कोट किए बिना बोलने की कोशिश की, लेकिन कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के सांसद कृष्णा प्रसाद तेनेत्ती ने आपत्ति जताई और अगले वक्ता को बोलने के लिए कह दिया.

विपक्षी सांसदों के नारेबाज़ी और काग़ज़ फेंकने के बीच सदन की कार्यवाही दोपहर 3 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई. दोबारा कार्यवाही शुरू होने पर आठ विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया गया और पूरे दिन के लिए सदन को स्थगित कर दिया गया.

‘नेता प्रतिपक्ष के रूप में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बोलने से जानबूझकर रोका जा रहा है’

अपने पत्र में राहुल गांधी ने लिखा कि लंबे समय से चली आ रही संसदीय परंपरा और पूर्व लोकसभा अध्यक्षों के बार-बार दिए गए फ़ैसलों के अनुसार, यदि कोई सदस्य सदन में किसी दस्तावेज़ का उल्लेख करना चाहता है तो उसे पहले उस दस्तावेज़ को प्रमाणित करना होता है और उसकी ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी होती है. इसके बाद अध्यक्ष सदस्य को उस दस्तावेज़ का हवाला देने की अनुमति देते हैं.

गांधी ने लिखा, ‘आज लोकसभा में मुझे बोलने से रोकना न केवल इस परंपरा का उल्लंघन है, बल्कि इससे यह गंभीर चिंता भी पैदा होती है कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में मुझे राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बोलने से जानबूझकर रोका जा रहा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘यह दोहराना ज़रूरी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा राष्ट्रपति के अभिभाषण का एक अहम हिस्सा थी, जिस पर संसद में चर्चा होना आवश्यक है.’

गांधी ने कहा कि अध्यक्ष के रूप में हर सदस्य के अधिकारों की रक्षा करना ओम बिरला की ज़िम्मेदारी है, लेकिन ‘सरकार के कहने पर’ एक ऐसी अभूतपूर्व स्थिति पैदा की गई, जिसमें पहली बार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोका गया.

उन्होंने लिखा, ‘माननीय अध्यक्ष, सदन के निष्पक्ष संरक्षक के रूप में यह आपकी संवैधानिक और संसदीय ज़िम्मेदारी है कि आप हर सदस्य, विशेषकर विपक्ष के सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करें. नेता प्रतिपक्ष और हर सदस्य का बोलने का अधिकार हमारे लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है.’

गांधी ने आगे कहा, ‘इन बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों से इनकार ने एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा कर दी है. संसदीय इतिहास में पहली बार सरकार के कहने पर अध्यक्ष को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर नेता प्रतिपक्ष को बोलने से रोकना पड़ा. यह हमारे लोकतंत्र पर एक धब्बा है, जिसके ख़िलाफ़ मैं अपना कड़ा विरोध दर्ज कराता हूं.’