उत्तराखंड सरकार ने लालढांग चिल्लारखाल सड़क परियोजना पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 11 जनवरी, 2023 को लगाए गए प्रतिबंध को हटाने के लिए याचिका दायर की थी. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए सड़क बनाने की मंज़ूरी दे दी है, हालांकि कोर्ट ने इस रास्ते पर भारी मालवाहक ट्रकों और डंपरों को चलने की अनुमति नहीं दी है.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (12 फरवरी) को राजाजी राष्ट्रीय अभयारण्य (नेशनल पार्क) से होकर गुजरने वाली सड़क के निर्माण को मंजूरी दे दी है.
अदालत ने इसके साथ ही शर्त रखी है कि कोटद्वार और हरिद्वार को जोड़ने वाले इस 4.7 किलोमीटर लंबे खंड पर कोई भी वाणिज्यिक वाहन नहीं चलेगा.
हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, उत्तराखंड सरकार ने लालढांग चिल्लारखाल सड़क परियोजना पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 11 जनवरी, 2023 को लगाए गए प्रतिबंध को हटाने के लिए याचिका दायर की थी.
उल्लेखनीय है कि करीब 11 किलोमीटर लंबी यह सड़क प्रतिबंध के कारण उपयोग में नहीं आ रही थी. इसके अलावा इस सड़क का 4.7 किलोमीटर का हिस्सा संरक्षित वन क्षेत्र से होकर गुजरता है, जो राजाजी और कॉर्बेट के बीच बाघों और हाथियों के लिए एक महत्वपूर्ण गलियारे का काम करता है.
बताया गया था कि इस सड़क को पक्का नहीं किया जा सका था, इसलिए यह मोटरगाड़ियों के लिए अनुपयुक्त थी.
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए कहा, ‘हम अपने पूर्व आदेश में संशोधन करते हैं और राज्य को सड़क को पक्का करने की अनुमति देते हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य बेहतर पहुंच और सुविधाएं प्रदान करना है, विशेष रूप से आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को सुख-सुविधाएं प्रदान करना है.’
पीठ ने आगे कहा, ‘हम इस सड़क को किसी भी व्यावसायिक उद्देश्य के लिए अनुमति नहीं देंगे, क्योंकि रात में भी शोर मचाते ट्रक और डंपर जंगल से गुजरेंगे.’
पीठ ने रेखांकित किया कि ग्रामीणों को बेहतर आवागमन प्रदान करने के लिए पक्की सड़क आवश्यक है. उसने सड़क पर बसों के चलने की अनुमति देने पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन कहा कि यदि इससे एक अपवाद बनता है, तो अन्य लोग भी इसकी मांग करेंगे.
वकील अभिषेक अत्रे द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए राज्य ने पीठ को सूचित किया कि सड़क परियोजना को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल), राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए), पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) से मंजूरी मिल चुकी है.
अत्रे ने बताया कि सीईसी ने अपनी रिपोर्ट में कुछ शर्तों के साथ सड़क निर्माण की अनुमति दी थी, जिनमें से एक शर्त यह थी कि एक दिन में केवल 150 वाहनों को ही चलने की अनुमति होगी.
उन्होंने क्षेत्र का नक्शा दिखाते हुए बताया कि सड़क के निर्माण से यात्रा का समय काफी कम हो जाएगा. उनके अनुसार, यदि वाणिज्यिक वाहनों को अनुमति नहीं दी जाती है, तो वैकल्पिक मार्ग से उन्हें 65 किलोमीटर अतिरिक्त यात्रा करनी पड़ेगी.
पीठ ने कहा, ‘पर्यावरण की रक्षा के लिए उन्हें वैकल्पिक मार्ग अपनाना चाहिए, चाहे मार्ग की लंबाई या समय कितना भी लगे, वाणिज्यिक वाहनों को वैकल्पिक मार्ग से चलने की ही अनुमति होगी.’
सीईसी को फटकार
अदालत ने संरक्षित वन क्षेत्र से 150 वाहनों को गुजरने की अनुमति देने के लिए सीईसी की आलोचना भी की. अदालत ने कहा, ‘सीईसी ने सड़क के वाणिज्यिक उपयोग की अनुमति क्यों दी? अनुमति देने से पहले थोड़ी नैतिकता तो बरती जाए. आप बड़ी खूबसूरती से कहते हैं कि राज्य को केवल 150 वाहनों की अनुमति सुनिश्चित करनी चाहिए.’
मामले में हस्तक्षेप याचिका दाखिल करने वाले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद अनिल बलूनी ने अधिवक्ता बांसुरी स्वराज के माध्यम से बताया कि वर्तमान में यह कच्ची सड़क और इसका सुदृढ़ीकरण क्षेत्र के 18 दूरस्थ गांवों में रहने वाले 40,000 से अधिक ग्रामीणों के लिए आवश्यक है.
स्वराज ने बलूनी की ओर से कहा, ‘मानसून के मौसम में सड़क बह जाने के कारण इन क्षेत्रों के लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है. सरकार ने वन्यजीवों को एक तरफ से दूसरी तरफ आने-जाने की सुविधा देने के लिए 400 मीटर का ऊपरगामी गलियारा बनाने की योजना बनाई है.’
पीठ ने इस बात से सहमति जताई कि ग्रामीणों को सड़क का अधिकार है, लेकिन ये भी कहा कि कुछ गांवों तक पहुंच प्रदान करने के नाम पर यदि सरकार व्यावसायिक सड़क बनाना चाहती है, तो कोर्ट इसकी अनुमति नहीं देगी.
इस मामले में एमिक्स क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने बताया कि पहुंच के दृष्टिकोण से देखा जाए तो राज्य परिवहन की बसें, जो ग्रामीणों के लिए आवागमन का एकमात्र सार्वजनिक साधन हैं, उन्हें अनुमति दी जानी चाहिए.
अदालत ने राज्य को व्यावसायिक वाहनों के उपयोग को रोकने के लिए उठाए जाने वाले उपायों की सूची देने का निर्देश दिया. अदालत ने सीईसी और एमिक्स क्यूरी को अगली सुनवाई की तारीख पर इसकी जांच करने को कहा.
गौरतलब है कि यह सड़क राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के बफर जोन से होकर गुजरती है, जो बाघों, हाथियों, चीतों और भालुओं का निवास स्थान है. 4.7 किलोमीटर का यह खंड चमारिया और सिगगाडी सोट के बीच स्थित है.
एनटीसीए, एनबीडब्ल्यूएल और एमओएफसीसी ने परियोजना के लिए कुछ वैकल्पिक उपाय सुझाए थे, जिन पर राज्य सरकार ने आपत्ति जताई थी. बेंच ने इन आपत्तियों को अस्वीकार करते हुए सड़क निर्माण की अनुमति दे दी.