डिजिटल क्लासरूम बनाने में पिछड़ा मप्र

डिजिटल क्लासरूम केंद्र से मिले फंड का पांच साल में 85 प्रतिशत उपयोग नहीं.
भोपाल/मंगल भारत। शिक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग व्यक्तिगत शिक्षण, बुद्धिमान ट्यूटरिंग सिस्टम, और प्रशासनिक कार्यों के स्वचालन के माध्यम से सीखने की प्रक्रिया को बेहतर बना रहा है। यह तकनीक छात्रों की जरूरतों के अनुसार सामग्री को अनुकूलित करती है और वास्तविक समय में फीडबैक प्रदान करती है, जिससे शिक्षकों का बोझ कम होता है। इसको देखते हुए केंद्र सरकार ने पिछले पांच साल में प्रदेश को 318.52 करोड़ रुपए दिए, ताकि स्कूलों को डिजिटल बनाया जा सके। लेकिन राज्य इस फंड का 85 प्रतिशत उपयोग नहीं कर पाया है। इसका परिणाम यह देखने को मिल रहा है कि प्रदेश के 62 प्रतिशत सरकारी स्कूल लैब्स और स्मार्ट क्लासरूम नहीं होने के कारण एआई शिक्षा से दूर हैं।
मप्र में सरकार का दावा है कि वह सरकारी स्कूलों में निजी स्कूलों की तरह डिजिटल क्लासरूम बनाकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बच्चों को शिक्षित करने की कोशिश में लगी हुई है। लेकिन सरकार के दावों की हकीकत यह है कि प्रदेश में 62 प्रतिशत सरकारी स्कूल एआई शिक्षा से बेहद दूर हैं। बिना इंटरनेट और आईसीटी लैब या डिजिटल क्लासरूम के एआई शिक्षा संभव नहीं है और प्रदेश का हाल ये है कि यहां लैब्स और स्मार्ट क्लासरूम बनाने के लिए मिला फंड पांच साल में भी 85 फीसदी खर्च नहीं हो सका है। प्रदेश के जिन सरकारी स्कूलों में इंटरनेट है, वहां भी तस्वीर पूरी नहीं है। इन 12,933 स्कूलों में से केवल 2,610 स्कूल ऐसे हैं, जहां कंप्यूटर लैब या स्मार्ट क्लास सही तरीके से चल रही है। परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024 यह भी संकेत देता है कि जहां इंटरनेट पहुंच भी है, वहां डिजिटल पढ़ाई की बुनियादी तैयारी पूरी नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक सर्वे में सिर्फ 34 प्रतिशत छात्रों के पास घर पर लैपटॉप या टैबलेट है।
मात्र 15 फीसदी फंड का उपयोग
केंद्र सरकार ने पिछले पांच साल में प्रदेश को 318.52 करोड़ रुपए दिए, ताकि स्कूलों को डिजिटल बनाया जा सके। लेकिन राज्य इस फंड का सिर्फ 49.15 करोड़ रुपए यानी 15 प्रतिशत ही खर्च कर पाया। प्रदेश में 8,489 कंप्यूटर लैब और 12,573 स्मार्ट क्लास बनाने की मंजूरी तो मिली, लेकिन ज्यादातर आज भी फाइलों तक सीमित हैं। कक्षा 6वीं और उससे ऊपर वाले 34,152 सरकारी स्कूलों में से सिर्फ 12,933 स्कूलों तक ही इंटरनेट पहुंच पाया है। यानी हर तीन में से करीब दो स्कूल आज भी डिजिटल दुनिया से कटे हुए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक डिजिटल उपकरण और नियमित उपयोग के बिना एआई जैसी शिक्षा सिर्फ नीति दस्तावेजों तक सिमट कर रह जाती है। केंद्र सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में कक्षा 6वीं से 12वीं तक अलग-अलग स्तर पर एआई से जुड़े अध्याय शामिल किए हैं। कक्षा 6-8 में डिजिटल साक्षरता और एआई की बुनियादी समझ, कक्षा 9-10 में डेटा, लॉजिक और एआई एप्लिकेशन, जबकि कक्षा 11-12 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को वैकल्पिक विषय के रूप में पढ़ाया जा रहा है।
एआई किताबों तक सीमित
प्रदेश के अधिकांश स्कूलों में इंटरनेट, कंप्यूटर और लैब की कमी के कारण एआई किताबों तक सीमित रह गया है, पढ़ाई व्यवहार में नहीं उतर पा रही। उधर, राज्यसभा में सरकार ने बताया है कि इंजीनियरिंग और तकनीकी पढ़ाई में एआई से जुड़े कौशल औपचारिक रूप से जोड़े जा रहे हैं। इसके तहत राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढांचा में एआई आधारित कंटेंट क्रिएशन, प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग, एआई डेवलपमेंट, प्रोग्रामिंग और स्ट्रीमिंग जैसे कौशलों को मान्यता दी गई है। सरकार का कहना है कि यह ढांचा इंजीनियरिंग छात्रों को उद्योग-उपयोगी एआई स्किल्स देने के लिए बनाया गया है, ताकि पढ़ाई और रोजगार के बीच की दूरी कम हो सके। मंत्रालय के मुताबिक एआई से जुड़े इन कौशलों को शामिल किया गया है।