सुप्रीम कोर्ट मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें हत्या के प्रयास के मामले में तीन साल की सज़ा को दो महीने में बदल दिया गया था, क्योंकि दोषी ठहराए गए व्यक्तियों ने पीड़ित को 50-50 हज़ार रुपये देने पर सहमति जताई थी. सुप्रीम कोर्ट इसे निर्णय को रद्द करते हुए कहा कि इस तरह के तरीके से यह ग़लत संदेश जाएगा कि आरोपी मुआवज़े के पैसे देकर सज़ा से बच सकता है.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कुछ उच्च न्यायालयों द्वारा जघन्य अपराधों में पीड़ित को दिए जाने वाले मुआवज़े की रकम बढ़ाकर कारावास की सज़ा कम करने की प्रवृत्ति की निंदा की है.
लाइव लॉ के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि इस तरह के तरीके से यह गलत संदेश जाएगा कि आरोपी पैसे का मुआवज़ा देकर सज़ा से बच सकता है.
कोर्ट ने कहा, ‘पीड़ित को दिया जाने वाला मुआवज़ा सिर्फ मुआवज़े के तौर देखा जाना चाहिए. इसे सज़ा के बराबर या उसका विकल्प नहीं माना जा सकता.’
इस संबंध में जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें हत्या के प्रयास के मामले में तीन साल की जेल की सज़ा को दो महीने की सज़ा में बदल दिया गया था, क्योंकि दोषी ठहराए गए दोनों व्यक्तियों ने पीड़ित को 50-50 हजार रुपये देने पर सहमति जताई थी.
अपने फैसले में पीठ ने कहा, ‘हमने अलग-अलग हाईकोर्ट में एक ट्रेंड देखा, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को दी गई सज़ा को बिना किसी कानूनी सोच के मनमाने ढंग से और मशीनी तरीके से कम कर दिया जाता है. इससे ‘समाज में यह गलत मैसेज जा सकता है कि अपराधी/आरोपी सिर्फ़ पैसे देकर अपनी ज़िम्मेदारी से बच सकते हैं.’
इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ मूलभूत कारकों को रेखांकित भी किया, जिन्हें सज़ा सुनाते समय न्यायालयों को ध्यान में रखना चाहिए.
क. आनुपातिकता: ‘उचित दंड’ के सिद्धांत का पालन करना न्यायालयों का प्राथमिक कर्तव्य होना चाहिए. अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, किए गए अपराध और दी गई सज़ा के बीच आनुपातिकता होनी चाहिए.
ख. तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार: मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर उचित विचार किया जाना चाहिए, जिसमें आरोप, साक्ष्य और निचली अदालत के निष्कर्ष शामिल हैं.
ग. समाज पर प्रभाव: सज़ा सुनाते समय, न्यायालयों को यह ध्यान रखना चाहिए कि अपराध मूल रूप से समाज के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाते हैं (जिसका पीड़ित एक अनिवार्य हिस्सा हैं) और जनता के विश्वास को कम करते हैं. सज़ा इतनी पर्याप्त होनी चाहिए कि कानून और प्रशासन में जनता का विश्वास बना रहे. हालांकि, सावधानी भी बरती जानी चाहिए और न्यायालय को जनता के आक्रोश या भावनाओं से प्रभावित नहीं होना चाहिए और इस प्रश्न का निर्णय स्वतंत्र रूप से करना चाहिए.
घ. अपराध को बढ़ाने और कम करने वाले कारक: न्यायालय, सज़ा तय करते समय या सज़ा में संशोधन करते समय, अपराध किए जाने की परिस्थितियों का आकलन करेगा, और ऐसा करते समय न्यायालय को अपराध को बढ़ाने और कम करने वाले कारकों के बीच उचित संतुलन बनाए रखना होगा.
मामला क्या था?
गौरतलब है कि अदालत जिस मामले पर सुनवाई कर रही थी, वह दो आरोपियों से संबंधित है, जिन्होंने पीड़ित पर चाकू से हमला किया और उनकी छाती और पेट पर कई जानलेवा घाव किए. इस संबंध में 2013 में आईपीसी की धारा 307, 326 और 324 के तहत दोषी पाए जाने पर निचली अदालत ने आरोपियों को तीन साल के कठोर कारावास और प्रत्येक पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया था, जिसे सत्र न्यायालय ने भी बरकरार रखा था.
हालांकि, मद्रास उच्च न्यायालय ने सज़ा में संशोधन किया. दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उच्च न्यायालय ने कारावास की अवधि को घटाकर पहले से ही भुगते गए दो महीने कर दिया और कुल जुर्माने को बढ़ाकर 1,00,000 रुपये कर दिया.
उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ अपीलकर्ता, पीड़ित की पत्नी ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की थी. उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए जस्टिस बिश्नोई के लिखित फैसले में कहा गया कि पीड़ित को दी जाने वाली आर्थिक सहायता दंडात्मक कार्रवाई का विकल्प नहीं हो सकती.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सजा देते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सजा न तो बहुत कठोर हो और न ही इतनी हल्की हो कि उसका डर ही कम हो जाए. सजा का उद्देश्य बदला लेना नहीं है; बल्कि समाज को जो नुकसान हुआ है उसको सही करना और व्यवस्था को सही रास्ते पर लाना है.