सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों के शवों को जबरन कब्र से निकालने और उन्हें गांव की सीमाओं से बाहर अन्य स्थानों पर दफ़नाने पर रोक लगाने की मांग करते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई थी. अदालत ने नोटिस जारी करते हुए कहा कि इस बीच दफनाए गए शवों के किसी भी प्रकार के उत्खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (18 फरवरी) को एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों के शवों को जबरन कब्र से निकालने और उन्हें गांव की सीमाओं से बाहर अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करने पर रोक लगा दी.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने यह आदेश एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी करते हुए पारित किया, जिसमें राज्य में आदिवासी ईसाइयों के शवों को जबरन कब्र से निकालकर अन्यत्र दफनाने की कार्रवाई को चुनौती दी गई है.
वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस याचिकाकर्ताओं की ओर से राज्य में आदिवासी ईसाइयों की लाशों को ज़बरदस्ती कब्र से निकालने और दूसरी जगह ले जाने का विरोध किया. अंतरिम राहत की मांग करते हुए आरोप लगाया कि राज्य शवों को हटाने का समर्थन कर रहा है.
अदालत ने नोटिस जारी करते आदेश दिया, ‘इस बीच दफनाए गए शवों के किसी भी प्रकार के उत्खनन की अनुमति नहीं दी जाएगी.’
यह जनहित याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई थी. इसमें दावा किया गया है कि छत्तीसगढ़ में कुछ लोगों द्वारा आदिवासी ईसाइयों को अपने गांवों की सीमाओं के भीतर अपने मृतकों को दफनाने से जबरन रोका जा रहा है, जबकि अन्य समुदायों को ऐसा करने की स्वतंत्रता है.
याचिका में आरोप लगाया गया है कि याचिकाकर्ताओं के मृत परिजनों के शवों को उनकी जानकारी के बिना जबरन कब्र से निकाला गया और उन्हें गांव से दूर अन्य स्थानों पर दोबारा दफनाने की कोशिश की गई.
याचिका में यह भी कहा गया है कि रमेश बघेल बनाम छत्तीसगढ़ सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के खंडित फैसले का उपयोग छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा आदिवासी ईसाइयों को उनके अपने गांवों में दफनाने से रोकने के लिए किया जा रहा है, यहां तक कि उन स्थानों पर भी जहां कोई स्थानीय विवाद नहीं है.
ज्ञात है कि पिछले साल जनवरी में रमेश बघेल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के एक ईसाई व्यक्ति की याचिका पर खंडित फैसला दिया था. व्यक्ति ने अपने पिता, जो एक पादरी थे, के शव को उनके पैतृक गांव छिंदवाड़ा के कब्रिस्तान या अपनी निजी कृषि भूमि में दफनाने की अनुमति मांगी थी. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अपीलकर्ता को अपने निजी भूमि पर दफनाने की अनुमति दी, जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि दफन केवल ईसाइयों के लिए निर्धारित क्षेत्र में ही किया जा सकता है, जो कि करकापाल गांव में स्थित है (बताया जाता है कि यह अपीलकर्ता के पैतृक गांव से लगभग 20–25 किलोमीटर दूर है).
इसी पृष्ठभूमि में जनहित याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई है कि धर्म, जाति या एससी/एसटी/ओबीसी – जो भी हो – सभी व्यक्तियों को उस गांव में अपने मृतकों को दफनाने की स्वतंत्रता हो जहां वे रहते हैं. साथ ही राज्य की सभी ग्राम पंचायतों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे प्रत्येक गांव में सभी समुदायों के लिए दफन के लिए निर्धारित स्थान चिह्नित करें और वहां दफन की अनुमति दें.
याचिका में पारंपरिक दफन प्रथाओं में हस्तक्षेप रोकने तथा यथासंभव सभी समुदायों के लिए साझा कब्रिस्तान की व्यवस्था सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है.
संबंधित घटनाक्रम के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने 16 फरवरी को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें ग्राम सभा द्वारा गांव के कुछ प्रवेश स्थलों पर ‘होर्डिंग्स’ लगाए जाने की कार्रवाई को सही ठहराया गया था. इन होर्डिंग्स के माध्यम से ईसाई पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के गांव में प्रवेश पर रोक लगाई गई थी.