मध्य प्रदेश: ‘भूमि अधिग्रहण से पहले अडानी को कोयला खनन की मंज़ूरी क्यों?’ विधानसभा में हंगामा

सिंगरौली के धिरौली कोयला ब्लॉक को अडानी समूह को आवंटित किए जाने पर मध्य प्रदेश विधानसभा में गुरुवार (26 फरवरी) को तीखी बहस हुई. कांग्रेस ने भूमि अधिग्रहण और मुआवज़े में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए संयुक्त समिति से जांच की मांग की, जबकि राज्य सरकार ने सभी आरोप ख़ारिज किए. हंगामे के बीच विपक्ष ने विधानसभा से वॉकआउट कर दिया.

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में गुरुवार (26 फरवरी, 2026) को सिंगरौली जिले में अडानी समूह को आवंटित धिरौली कोयला ब्लॉक को लेकर जमकर हंगामा हुआ. कांग्रेस विधायकों ने भूमि अधिग्रहण और मुआवज़े की प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए मामले की जांच के लिए सदन की संयुक्त समिति गठित करने की मांग की.

द हिंदू के मुताबिक, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रश्नकाल के दौरान यह मुद्दा उठाया. उनके आरोपों के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस छिड़ गई, जो नोकझोंक और हंगामे में बदल गई. अंततः कांग्रेस विधायक विरोध दर्ज कराते हुए सदन से वॉकआउट कर गए.

क्या है मामला?

अडानी समूह को सिंगरौली जिले में स्थित धिरौली कोयला ब्लॉक में खनन की अनुमति दी गई है. पिछले साल सितंबर में समूह ने घोषणा की थी कि उसे केंद्रीय कोयला मंत्रालय से खनन शुरू करने की मंजूरी मिल गई है. यह खदान अडानी पावर की सहायक कंपनी महान एनर्जेन लिमिटेड संचालित कर रही है.

लगभग 27 वर्ग किलोमीटर में फैला यह कोयला ब्लॉक प्रदेश के सबसे बड़े ब्लॉकों में से एक है. इस क्षेत्र में करीब 5.70 लाख पेड़ों की कटाई जारी है.

सरकार के अनुसार, इस परियोजना के लिए कुल 2,672 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है, जिसमें आठ गांवों की 554 हेक्टेयर से अधिक निजी भूमि और 1,335 हेक्टेयर संरक्षित वन क्षेत्र शामिल है.

विपक्ष के आरोप

उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि आठ गांवों के 12,998 परिवार इस अधिग्रहण से प्रभावित हो रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी परिवारों की है. उनका कहना था कि मुआवज़े के वितरण में भारी गड़बड़ियां हुई हैं.

उन्होंने दावा किया कि कई बाहरी लोगों, यहां तक कि क्षेत्र में तैनात पुलिस अधिकारियों के परिजनों, को भी 15 लाख रुपये तक का मुआवज़ा दिया गया है, जबकि स्थानीय आदिवासियों को उनका हक नहीं मिला. सिंघार ने कहा कि यह जानकारी उन्होंने जिला कलेक्टर कार्यालय से जुटाई है.

सदन में उन्होंने कहा, ‘बाहरी लोग आए, घर बनाए और मुआवज़ा ले गए. स्थानीय आदिवासियों को पैसा नहीं मिला. गरीब परिवारों को अपने घर खुद तोड़ने के लिए कहा जा रहा है, तभी मुआवज़ा मिलेगा. यही सरकार की नीति है.’

उनका आरोप था कि अधिकांश स्थानीय परिवारों को केवल 2 से 2.5 लाख रुपये तक ही दिए जा रहे हैं.

सरकार का पक्ष

राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़ा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम (RFCTLARR), 2013 के तहत की जा रही है.

उन्होंने बताया कि आठ में से पांच गांवों में अधिग्रहण की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है. उनके अनुसार, विस्थापित परिवारों के लिए 368 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की गई है और अब तक 144 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया जा चुका है.

वर्मा ने दावा किया कि एक आदिवासी परिवार को कम से कम 50 लाख रुपये तक का मुआवज़ा मिल सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि विस्थापितों के पुनर्वास की व्यवस्था की जा रही है और उन्हें वैकल्पिक भूमि भी दी जाएगी. कंपनी की ओर से अतिरिक्त 3 करोड़ रुपये देने की बात भी कही गई.
आंकड़ों पर टकराव

सिंघार ने सरकार के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि 368 करोड़ रुपये की राशि को लगभग 12,000 परिवारों में बांटा जाए तो प्रति परिवार औसतन करीब 2 लाख रुपये ही बनते हैं. उन्होंने पूछा कि ऐसे में 50 लाख रुपये प्रति परिवार का दावा कैसे किया जा रहा है?

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है, तो खनन संचालन की अनुमति कैसे दे दी गई. उनकी मांग थी कि जब तक सभी प्रभावित परिवारों को समुचित मुआवज़ा और पुनर्वास नहीं मिल जाता, तब तक खनन कार्य रोका जाए.

सदन में हंगामा और वॉकआउट

कांग्रेस विधायकों ने संयुक्त जांच समिति के गठन की मांग दोहराई. ग्रामीण विकास एवं पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल ने कहा कि समिति बनाना सदन के अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन सरकार आरोपों की जांच के लिए तैयार है और मुआवज़ा प्राप्त करने वालों की सूची भी पेश करेगी.

जब विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने अगले विषय पर बढ़ने का निर्देश दिया तो कांग्रेस विधायक नारेबाजी करते हुए वेल में पहुंच गए. हंगामे के कारण कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी.

विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार जांच से बच रही है, जबकि सरकार ने कहा कि वह जांच के लिए पूरी तरह तैयार है. अंततः लगातार हंगामे के बीच कांग्रेस विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया.