कैबिनेट में आएगा प्रस्ताव
भोपाल/मंगल भारत

मध्यप्रदेश में लगभग 25 वर्ष बाद सरकारी नौकरी के लिए लागू दो बच्चों की अनिवार्य शर्त समाप्त होने जा रही है। सामान्य प्रशासन विभाग ने इस संबंध में प्रस्ताव तैयार कर लिया है और इसे शीघ्र ही राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। कैबिनेट की मंजूरी के बाद मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1961 में संशोधन कर दो बच्चों की बाध्यता से जुड़ा प्रावधान समाप्त कर दिया जाएगा।
2001 में लागू हुआ था नियम, कई कर्मचारियों की जा चुकी नौकरी-
मध्य प्रदेश में 26 जनवरी 2001 से यह नियम लागू किया गया था, जिसके तहत किसी भी शासकीय सेवक के दो से अधिक जीवित बच्चे होने की स्थिति में उसके विरुद्ध कार्रवाई का प्रावधान था। इस नियम के कारण बीते वर्षों में कई कर्मचारियों की नौकरी भी जा चुकी है। हालांकि हाल के वर्षों में इस प्रावधान के तहत कार्रवाई लगभग बंद हो चुकी है। मध्य प्रदेश के पड़ोसी राज्यों में यह पाबंदी पहले ही समाप्त की जा चुकी है। राजस्थान ने 11 मई 2016 को और छत्तीसगढ़ ने 14 जुलाई 2017 को दो बच्चों की अनिवार्यता का नियम समाप्त कर दिया था। इसके बाद वहां तीन बच्चों वाले कर्मचारी भी शासकीय सेवाओं में कार्यरत हैं।
परिवार की समरसता-सामाजिक यथार्थ को भी मिलेगा बल
सरकार के प्रस्तावित निर्णय को परिवार और समाज की बदलती वास्तविकताओं के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार में एक, दो या उससे अधिक बच्चे होना अपने आप में सामाजिक या प्रशासनिक कसौटी नहीं होना चाहिए। कई बार संयुक्त परिवारों में बच्चों का पालन-पोषण सामूहिक रूप से होता है और परिवार की संरचना केवल संतान संख्या से निर्धारित नहीं होती। ऐसे में यह निर्णय इस विचार को भी बल देगा कि परिवार का वास्तविक आधार पारस्परिक सहयोग, सामंजस्य और जिम्मेदारी है। यदि परिवार के सदस्य मिलजुल कर रहते हैं और बच्चों का पालन-पोषण उचित वातावरण में होता है, तो संतान संख्या को नौकरी से जोड़ना व्यवहारिक नहीं माना जाता। माना जा रहा है कि यह कदम सामाजिक यथार्थ को स्वीकार करने और पारिवारिक समरसता को महत्व देने की दिशा में एक सकारात्मक पहल साबित हो सकता है।
कैबिनेट की मंजूरी के बाद होगा लागू
सामान्य प्रशासन विभाग के अपर सचिव अजय कटेसरिया के अनुसार इस विषय पर विभागीय स्तर पर विस्तृत अध्ययन और तैयारी की जा चुकी है तथा मामला फिलहाल वरिष्ठ स्तर पर प्रक्रिया में है। कैबिनेट की स्वीकृति मिलने के बाद ही अंतिम निर्णय लागू किया जाएगा।
प्रदेश में प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से अधिक
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2019-20 के अनुसार मध्यप्रदेश की कुल प्रजनन दर 2.9 है, जो राष्ट्रीय औसत 2.1 से अधिक है। राज्य के शहरी क्षेत्रों में यह दर लगभग 2.1 और ग्रामीण क्षेत्रों में 2.8 के आसपास है। जिलों की बात करें तो भोपाल में प्रजनन दर लगभग 2.0 है, जबकि पन्ना (4.1), शिवपुरी (4.0) और बड़वानी (3.9) जैसे जिलों में यह अपेक्षाकृत अधिक है।
तीसरी संतान होने पर अब नहीं होगी कार्रवाई
नई व्यवस्था लागू होने के बाद यदि किसी शासकीय कर्मचारी की तीसरी संतान होती है तो उसे नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकेगा। सामान्य प्रशासन विभाग के अनुसार प्रस्ताव में यह भी व्यवस्था है कि तीसरी संतान के आधार पर विभागीय स्तर या न्यायालयों में लंबित सभी प्रकरण स्वत: समाप्त माने जाएंगे और उन पर आगे कोई कार्रवाई नहीं होगी। हालांकि वर्ष 2001 के बाद जिन कर्मचारियों के विरुद्ध तीसरी संतान के आधार पर कार्रवाई हो चुकी है या में सेवा से पृथक किया जा चुका है, उन्हें पुन: सेवा में लेने का प्रावधान प्रस्ताव शामिल नहीं किया गया है। इस संबंध में अंतिम निर्णय मंत्रिमंडल स्तर पर ही लिया जाएगा।
इन विभागों में सबसे अधिक विवाद
सरकारी सूत्रों के अनुसार राज्य के कई विभागों में इस नियम से जुड़े विवाद सामने आए हैं। विशेष रूप से चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा विभागों में ऐसी शिकायतें अधिक बताई जाती है। अनुमान है कि तीसरी संतान से जुड़े लगभग 8 से 10 हजार प्रकरण विभिन्न स्तरों पर सामने आए हैं। चिकित्सा शिक्षा विभाग से जुड़े कुछ मामले सामान्य प्रशासन विभाग तक भी पहुंचे हैं।