आजीवन सहयोग निधि जुटाने में भाजपा नेताओं की रूचि नहीं

भाजपा ने अपने नियमित खर्चों को पूरा करने के लिए 11 फरवरी से आजीवन सहयोग निधि अभियान शुरू किया है। 28 फरवरी को समाप्त होने वाले इस अभियान को पार्टी ने 15 मार्च तक आगे बढ़ाया है। इसमें कार्यकर्ता व आमजन से स्वैच्छिक तौर पर 50 करोड़ रुपये तक जुटाने की तैयारी है। लेकिन पार्टी नेताओं और पदाधिकारियों की अरुचि के कारण एक महीने में मात्र 10 करोड़ रूपए ही एकत्र हो पाए। गौरतलब है कि पार्टी ने इस वर्ष दो बड़े परिवर्तन किए हैं। एक तो यह कि सहयोग निधि सिर्फ डिजिटल माध्यम से ही ली जाएगी, जिससे पारदर्शिता बनी रहे और कोई प्रश्न नहीं उठा पाए। दूसरा यह कि 20 हजार रुपये से अधिक सहयोग निधि देने वालों का पैन नंबर भी लिया जाएगा। वहीं इस बार भाजपा के अंदर अब कद के हिसाब से चंदा लेने का प्रावधान किया गया है। यानी पार्टी में जिसका जितना बड़ा कद है उससे चंदे की उम्मीद भी उतनी अधिक है। इसके बावजूद आजीवन सहयोग निधि जुटाने में भाजपा फिसड्डी हो गई।
जानकारी के अनुसार, मप्र में दो दशक से सत्तारूढ़ भाजपा के नेता संगठन को आर्थिक सहयोग करने में अरुचि दिखा रहे हैं। इस वजह से भाजपा का आजीवन सहयोग निधि यानी समर्पण निधि अभियान इस वर्ष लडखड़़ा गया है। इसका एक बड़ा कारण पूरी तरह डिजिटल या आनलाइन भुगतान अनिवार्य करना भी बताया जा रहा है। जनसंघ के समय से चले आ रहे इस अभियान की शुरुआत प्रदेश में पार्टी के पितृ पुरुष स्व. कुशाभाऊ ठाकरे ने की थी। इसे प्रतिवर्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि (11 फरवरी) के अवसर पर शुरू किया जाता है। एक महीने के बाद भी इस अभियान में मात्र 10 करोड़ की राशि एकत्र हो पाई है। पार्टी ने कोई लक्ष्य तो निर्धारित नहीं किया था लेकिन संगठन को इस वर्ष 50 करोड़ रुपये से अधिक एकत्र होने की आशा थी। बता दें, पहले विधायक और सांसद स्वेच्छा से एक माह का वेतन समर्पण निधि में दिया करते थे। वर्ष 2025 में इसमें 25 करोड़ रुपये एकत्र हुए थे।
अभियान में कई जिले बहुत पीछे
आजीवन सहयोग निधि अभियान में इस बार पिछले सालों की तरह नेताओं में उत्साह नजर नहीं आ रहा है। इस कारण कई जिले लक्ष्य से बहुत पीछे हैं। इंदौर जैसे बड़े शहरों में उद्योगपतियों और प्रबुद्धजन का बड़ा सहयोग मिल रहा है। पार्टी का लक्ष्य इस निधि के माध्यम से संगठन को आगामी चुनावों और भविष्य की गतिविधियों के लिए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। एकत्रित राशि का बंटवारा संगठन के विभिन्न स्तरों पर इसके संचालन और मजबूती के लिए किया जाता है। कुल एकत्रित राशि का एक निश्चित हिस्सा राष्ट्रीय संगठन को भी भेजा जाता है, जिसका उपयोग देशव्यापी कार्यक्रमों और प्रचार के लिए होता है। एक बड़ा हिस्सा राज्य इकाई के पास रहता है। इसका उपयोग राज्य स्तरीय कार्यालयों के संचालन चुनाव प्रबंधन और प्रदेश स्तर के कार्यक्रमों के लिए किया जाता है। शेष राशि जिलों और स्थानीय मंडलों के पास रहती है ताकि वे अपने स्तर पर संगठन की गतिविधियों और कार्यालय के दैनिक खर्चों को पूरा कर सकें। संगठन इस राशि का उपयोग मुख्य रूप से जिला और प्रदेश कार्यालयों का किराया, बिजली बिल और अन्य प्रशासनिक खर्च में करती है। पार्टी नेताओं के अनुसार एकत्रित और वितरित की गई राशि का आडिट करवाया जाता है। इसकी जानकारी आयकर विभाग को दी जाती है। समर्पण निधि अभियान के प्रदेश प्रभारी गोपीकृष्ण नेमा का कहना है कि देश के कई राज्यों में समर्पण निधि अभियान समाप्त कर दिया गया है लेकिन मध्य प्रदेश में जारी है। ऑडिट के कारण केवल ऑनलाइन धनराशि स्वीकार की जा रही है। विधायक-सांसदों पर भी कोई दबाव नहीं है। जो स्वेच्छा से देंगे, वही हमें स्वीकार है।
15 मार्च तक बढ़ाया गया अभियान
सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय संगठन की ओर से प्रदेश भाजपा को कहा गया कि पूरे देश में चंदा कलेक्शन बंद कर दिया गया। इस पर मप्र की ओर से तर्क रखा गया कि यहां कुशाभाऊ ठाकरे के समय से चली आ रही बरसों की परंपरा है। इसी के बाद सशर्त सहयोग निधि जुटाने की अनुमति दी गई है। पहले तय था कि आजीवन सहयोग निधि कलेक्शन का काम 28 फरवरी तक चलेगा। फिर इस बढ़ाकर 15 मार्च तक किया गया है। प्रदेश संगठन की ओर से जिलों को कहा गया है कि वे जिलों के खर्च की तुलना में 2 गुना कलेक्शन करें। उदाहरण के लिए यदि जिले का खर्च प्रतिमाह एक लाख रुपए के हिसाब से सालाना 12 लाख रुपए है, तो उसे कम से कम 25 लाख रुपए कलेक्शन करना होगा। पार्टी में हिसाब चलता है कि 50 प्रतिशत प्रदेश संगठन के पास रहता है और बाकी जिलों को भेजा जाता है।