भारत सरकार के आधार ऐप को फोन में प्री-इंस्टॉल करने के प्रस्ताव पर टेक कंपनियों की आपत्ति

केंद्र सरकार ने जनवरी में एप्पल, सैमसंग और गूगल जैसी कंपनियों से आधार ऐप को मोबाइल में पहले से इंस्टॉल करने का सुझाव दिया, लेकिन उद्योग संगठन एमएआईटी ने इसका विरोध किया. कंपनियों ने लागत, तकनीकी दिक्कतों और निजता से जुड़े जोखिमों को लेकर चिंता जताई है.

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने इस साल जनवरी में स्मार्टफोन कंपनियों, जैसे एप्पल, सैमसंग और गूगल, से अपने आधार ऐप को मोबाइल फोन में पहले से इंस्टॉल (प्री-इंस्टॉल) करने पर विचार करने को कहा था. हालांकि, उद्योग से जुड़े एक प्रमुख संगठन ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है.

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, यह जानकारी उद्योग के आंतरिक पत्राचार के हवाले से सामने आई है.

नरेंद्र मोदी सरकार और टेक कंपनियों के बीच सरकारी ऐप्स को फोन में पहले से डालने को लेकर टकराव पिछले कुछ समय से एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है. उद्योग संगठन एमएआईटी ने सरकार की ऐसी छह पहलों पर आपत्ति जताई है, जिनमें आधार ऐप का मामला भी शामिल है.

ज्ञात हो कि आधार एक 12 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या है, जो व्यक्ति के बायोमेट्रिक डेटा, जैसे उंगलियों के निशान और आईरिस स्कैन, से जुड़ी होती है. देश के लगभग 1.34 अरब लोग इससे जुड़े हैं और इसका इस्तेमाल बैंकिंग, टेलीकॉम सेवाओं और एयरपोर्ट पर तेज़ प्रवेश जैसी सुविधाओं में व्यापक रूप से होता है.

हालांकि, इस प्रणाली को लेकर समय-समय पर डेटा सुरक्षा और निजता से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं.

कंपनियों ने क्यों जताई आपत्ति?

उद्योग से जुड़े दस्तावेज़ों के मुताबिक, 13 जनवरी को भेजे गए एक ईमेल में बताया गया कि आधार प्राधिकरण यूआईडीएआई ने आईटी मंत्रालय से कहा था कि वह गूगल, एप्पल और अन्य स्मार्टफोन निर्माताओं से नए आधार ऐप को प्री-इंस्टॉल करने के विकल्प पर बातचीत करे.

हालांकि यह कोई बाध्यकारी आदेश नहीं था, फिर भी कंपनियों ने इस प्रस्ताव पर चिंता जताई. उनका कहना था कि इससे उत्पादन लागत बढ़ सकती है और उपयोगकर्ताओं के लिए तकनीकी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं. रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से लिखा कि एप्पल और सैमसंग ने खास तौर पर सुरक्षा और गोपनीयता को लेकर सवाल उठाए.

सरकार का मानना था कि अगर आधार ऐप पहले से फोन में मौजूद होगा तो लोग बिना डाउनलोड किए ही इसकी सेवाओं का आसानी से उपयोग कर सकेंगे और इसकी पहुंच बढ़ेगी.

लेकिन एमएआईटी से जुड़े कंपनियों का तर्क था कि इससे ‘सार्वजनिक हित में कोई खास बढ़ोतरी नहीं होगी’ और कंपनियों को भारत और अन्य देशों के लिए अलग-अलग उत्पादन व्यवस्था करनी पड़ेगी.

संगठन ने यह भी कहा कि रूस को छोड़कर किसी अन्य देश में इस तरह सरकारी ऐप्स को फोन में अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने की नीति नहीं है.

निजता और नियंत्रण को लेकर भी चिंता

दिल्ली स्थित डिजिटल अधिकार संगठन इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक अपार गुप्ता ने इस प्रस्ताव को सरकार द्वारा स्मार्टफोन उपयोग पर शुरुआती स्तर से नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश बताया और इसे ‘समस्याग्रस्त’ कहा.

जनवरी में लॉन्च किए गए नए आधार ऐप में यूज़र्स को अपनी प्रोफाइल अपडेट करने, परिवार के सदस्यों की जानकारी प्रबंधित करने और बायोमेट्रिक डेटा को लॉक करने जैसी सुविधाएं दी गई हैं.

पहले भी हो चुका है विवाद
सरकारी ऐप्स को प्री-इंस्टॉल करने को लेकर विवाद नया नहीं है. दिसंबर में सरकार ने एक टेलीकॉम सुरक्षा ऐप को अनिवार्य रूप से फोन में शामिल करने का निर्देश दिया था, जिसे विपक्ष और नागरिक समाज के विरोध के बाद कुछ ही दिनों में वापस लेना पड़ा.

ताज़ा दस्तावेज़ों से यह भी संकेत मिलता है कि टेक कंपनियों के बीच इस तरह के प्रस्तावों को लेकर असहजता बढ़ रही है. एमएआईटी ने 10 मार्च को आईटी मंत्रालय के एक अधिकारी को लिखे पत्र में ‘सचेत’ नामक एक अन्य सरकारी ऐप को प्री-इंस्टॉल करने के प्रस्ताव का भी विरोध किया है.

पत्र में संगठन ने स्पष्ट कहा है कि आधार समेत सभी ऐसे मामलों में उद्योग का रुख लगातार प्री-इंस्टॉलेशन के खिलाफ रहा है.

हालांकि, यह साफ नहीं है कि सरकार फिलहाल इस प्रस्ताव पर आगे बढ़ रही है या इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है. यूआईडीएआई, आईटी मंत्रालय और गूगल की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है.