छत्तीसगढ़: ‘जबरन धर्मांतरण’ के ख़िलाफ़ विधानसभा ने पारित किया विधेयक, आजीवन कारावास का प्रावधान शामिल

छत्तीसगढ़ सरकार ने गुरुवार को विधानसभा में ‘बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या ग़लतबयानी के ज़रिये’ कराए जाने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए विधेयक पारित किया है. इस विधेयक में ‘सामूहिक धर्मांतरण’ के मामलों में आजीवन कारावास तक के कड़े प्रावधान शामिल हैं.

नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ सरकार ने गुरुवार (19 मार्च) को ‘बल, प्रलोभन, धोखाधड़ी या गलत बयानी के जरिए’ कराए जाने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए विधानसभा में एक विधेयक पारित किया. इस विधेयक में ‘सामूहिक धर्मांतरण’ के मामलों में आजीवन कारावास तक के कड़े प्रावधान शामिल हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 को उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा ने पेश किया. प्रस्तावित कानून का उद्देश्य 1968 के छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम को बदलना है.

विपक्षी कांग्रेस विधायकों ने विधेयक को पेश करने से पहले चयन समिति को भेजने की मांग खारिज होने पर सदन से वॉकआउट किया.

नए विधेयक के तहत, जो व्यक्ति अपना धर्म बदलना चाहता है, उसे संबंधित प्राधिकारी- जिला मजिस्ट्रेट या उनके द्वारा अधिकृत अधिकारी (जो अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट से नीचे के पद का न हो) को घोषणा पत्र देना होगा.

विधेयक के अनुसार, ‘सूचना प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर संबंधित प्राधिकारी प्रस्तावित धर्मांतरण का विवरण अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित करेगा और तहसीलदार, ग्राम पंचायत तथा स्थानीय थाने में नोटिस प्रदर्शित करेगा. नोटिस में आवेदक का नाम, उसका वर्तमान धर्म और प्रस्तावित धर्म का उल्लेख होगा.’

विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ‘पैतृक धर्म’ में वापसी को धर्मांतरण नहीं माना जाएगा.

प्रस्तावित कानून बल, दबाव, अनुचित प्रभाव, लालच, गलत प्रस्तुति, धोखाधड़ी या विवाह के माध्यम से, या डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाता है. साथ ही, किसी भी व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे धर्मांतरण में सहयोग करने से भी प्रतिबंधित करता है.

विधेयक के मुताबिक, केवल विवाह को स्वतः धर्मांतरण नहीं माना जाएगा. हालांकि, यदि कोई व्यक्ति केवल विवाह के उद्देश्य से या विधेयक के प्रावधानों के विपरीत धर्म बदलता है, तो इसे अवैध धर्मांतरण माना जाएगा.

विधेयक में कहा गया है, ‘प्रस्तावित विवाह की तारीख से 60 दिन पहले निर्धारित प्रारूप में घोषणा पत्र संबंधित प्राधिकारी को देना होगा. प्राधिकारी इसे अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करेगा और यह जांच करेगा कि क्या यह विवाह अवैध धर्मांतरण के दायरे में आता है.’

विधेयक में ‘लालच’ की परिभाषा व्यापक रखी गई है, जिसमें धन, उपहार, रोजगार, मुफ्त शिक्षा या चिकित्सा सुविधाएं, बेहतर जीवनशैली या विवाह के वादे शामिल हैं. वहीं ‘दबाव’ में मानसिक दबाव, धमकी और सामाजिक बहिष्कार को शामिल किया गया है. सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे.

विधेयक में कड़ी सज़ाओं का प्रावधान है. सामान्य उल्लंघन के मामलों में न्यूनतम 7 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की सजा और कम से कम 5 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है. नाबालिगों, महिलाओं, मानसिक रूप से दिव्यांग व्यक्तियों या अनुसूचित जाति/जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों से जुड़े मामलों में सजा 10 से 20 वर्ष तक हो सकती है, साथ ही न्यूनतम 10 लाख रुपये का जुर्माना लगेगा.

सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और 25 लाख रुपये या उससे अधिक का जुर्माना हो सकता है. दोबारा अपराध करने पर आजीवन कारावास का प्रावधान है. दोषी पाए जाने पर सरकारी कर्मचारियों को 10 से 20 वर्ष की सजा और न्यूनतम 10 लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है.

गौरतलब है कि ‘सामूहिक धर्मांतरण’ की परिभाषा एक ही आयोजन में दो या उससे अधिक लोगों के धर्म परिवर्तन के रूप में की गई है. विधेयक में अवैध धर्मांतरण के पीड़ितों को अधिकतम 10 लाख रुपये तक का मुआवजा देने का भी प्रावधान है.

हालांकि, विपक्षी कांग्रेस ने विधेयक पर आपत्ति जताते हुए इसे समीक्षा के लिए चयन समिति को भेजने की मांग की थी, और मांग खारिज होने पर सदन की कार्यवाही का बहिष्कार किया.

विपक्ष के नेता चरण दास महंत ने कहा कि यह विधेयक ‘जबरन धर्मांतरण को रोकने से कहीं आगे जाता है’ और ‘व्यक्तिगत आस्था और पसंद के आसपास डर और निगरानी का माहौल खड़ा करता है.’ उन्होंने पूर्व घोषणा और सार्वजनिक जानकारी देने की अनिवार्यता को निजता के अधिकार का ‘सीधा उल्लंघन’ बताया.

विपक्ष के कई विधायकों ने पंचायत, तहसील और थाने में धर्मांतरण नोटिस सार्वजनिक रूप से लगाने के प्रावधान की भी आलोचना की. उनका कहना था कि इससे लोगों पर सामाजिक दबाव, धमकी या हिंसा का खतरा बढ़ सकता है.