लोहिया जयंती: जब ‘दुश्मन’ बना दिए गए लोहिया और आंबेडकर

कोई तीन दशक पहले अपनी बढ़त के दिनों में सपा और बसपा ने आपसी प्रतिस्पर्धा में डाॅ. लोहिया और बाबासाहेब को भी ‘एक दूजे का कट्टर दुश्मन’ बना डाला था और अब, बदले राजनीतिक प्रवाहों के बीच में भी वे आगे बढ़कर बहुजनों या समाजवादियों की व्यापक एकता का मार्ग प्रशस्त करने की समझदारी नहीं दिखा पा रही हैं.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब न समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी (सपा-बसपा) के तीन दशक पहले के ‘वे’ सुनहरे दिन हैं और न उनके द्वारा अपने राजनीतिक आराध्यों (डॉ. राममनोहर लोहिया और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर) के बीच जानबूझकर पैदा की गई वह दुश्मनी, फिर भी डॉ. लोहिया की जन्मस्थली अकबरपुर (जो अब आंबेडकरनगर जिले का मुख्यालय है) के अनेक निवासियों को लगता है कि जैसे वह दुश्मनी अभी कल की बात हो.

जब भी डॉ. लोहिया की जयंती आती है, ‘दुश्मनी’ के उन दिनों की चर्चाएं जोर पकड़ लेती हैं और लोग कहने लगते हैं कि अब दोनों ही पार्टियां थककर प्रख्यात शायर बशीर बद्र का यह शे’र सार्थक करने लगी हैं : दुश्मनी का सफर एक कदम दो कदम, तुम भी थक जाओगे, हम भी थक जाएंगे!

यह और बात है कि यह थकान जहां बसपा के हिस्से बहुत ज्यादा आई है, वहीं सपा के हिस्से बहुत कम.

जानकार बताते हैं कि कोई तीन दशक पहले अपनी बढ़त के दिनों में इन पार्टियों ने आपसी प्रतिस्पर्धा में, और तो और, डाॅ. लोहिया और बाबासाहब को भी ‘एक दूजे का कट्टर दुश्मन’ बना डाला था और अब, बदले राजनीतिक प्रवाहों के बीच, ‘कभी दोस्ती तो कभी दुश्मनी’ की स्थिति में भी आगे बढ़कर बहुजनों या समाजवादियों की व्यापक एकता का मार्ग प्रशस्त करने की समझदारी नहीं दिखा पा रहीं.

यह तब है, जब अपनी पार्टी में बेकदरी से परेशान इन दोनों के ही असंतुष्ट अथवा बागी नेता चुनावों के वक्त बेहतर भविष्य की तलाश में पाला बदलते हैं तो सपा से बसपा या बसपा से सपा का ही रुख करते हैं. यानी दोनों पार्टियों में आवाजाही बनी रहती है.

जब भी वे नेता ऐसा करते हैं, लोगों को हैरत होती है कि कभी वे और उनकी पार्टियां एक दूजे को फूटी आंखों देखना भी पसंद नहीं करती थीं! 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले मायावती की नाराजगी के शिकार हुए बसपा के दो बड़े दलित व पिछड़े नेताओं रामअचल राजभर व लालजी वर्मा ने सपा की साइकिल पर सवार होने में देर नहीं लगाई, तब भी कुछ ऐसी ही हैरत हुई थी.

इनमें रामअचल राजभर को बसपा का शिल्पकार कहा जाता रहा है और वे प्रदेश में मायावती की प्रायः सारी सरकारों में मंत्री और बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं, जबकि लालजी वर्मा बसपा के राष्ट्रीय महासचिव, मायावती सरकार में मंत्री और बसपा विधानमंडल दल के नेता.

सपा बसपा की तूती

गौरतलब है कि इन पार्टियों ने अपना एक ऐसा सुनहरा दौर भी देखा है, जब प्रदेश की राजनीति के प्रायः सारे प्रवाह दलितों, पिछड़ों व अल्पसंख्यकों को सामाजिक न्याय मुहैया कराने वाले उनके नारों की ओर थे. आज भले ही वे पलटकर भाजपा के हिंदुत्व की ओर हो गए हों, तब सपा-बसपा की ऐसी तूती बोलती थी कि सत्ता की ज्यादातर प्रतिद्वंद्विता उनके बीच ही सिमट जाया करती थी.

लेकिन अब? गत लोकसभा चुनाव को छोड़ दें (जिसमें समाजवादी पार्टी ने 37 सीटों पर कब्जा करके रेकार्ड जीत दर्ज की, जबकि बसपा खाता भी नहीं खोल पाई) तो 2014 व 2019 के लोकसभा और 2017 व 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में करारी शिकस्त से दोनों ही बुरी तरह पस्त होकर रह गईं थीं.
फिर भी दलितों व पिछड़ों की जिस एकता ने बीती शताब्दी के आखिरी दशक में उन्हें सत्ता सुख दिलाया था, वह उन्हें अभीष्ट नहीं लगी. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बिना अपेक्षित तैयारी के आधे-अधूरे मन से गठबंधन किया भी तो उसका कोई लाभ नहीं उठा सकीं क्योंकि वह गठबंधन रहीम के इस दोहे को चरितार्थ करता था : ऐसी प्रीति न कीजिए जस खीरा ने कीन्ह, ऊपर से तो दिल मिला भीतर फांकें तीन.

विडंबना यह कि अब तो न उन्हें बीती शताब्दी की अपनी अभूतपूर्व यारी के सबक याद रह गए हैं, न अभूतपूर्व दुश्मनी के. उन्हें इस सवाल से जूझना भी गवारा नहीं कि 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जयश्रीराम’ के नारे पर सारे राजनीतिक समीकरण पलटते हुए उन्होंने प्रदेश में अपनी गठबंधन सरकार बनाई तो उसकी उम्र लंबी क्यों नहीं कर पाईं? क्यों 1995 आते-आते उनके अंतर्विरोध इतने गहरा गए कि नौबत बिखराव तक आ पहुंची? गठबंधन टूटने के बाद क्रुद्ध सपाइयों ने दो जून, 1995 को लखनऊ में मीराबाई मार्ग स्थित स्थित स्टेट गेस्टहाउस के कमरा नंबर एक में बसपा विधायकों की बैठक कर रही मायावती पर हमलाकर दुश्मनी की जो दीवार उठाई, क्योंकर वह आगे चलकर चीन की अलंघ्य दीवार बन गई?

बाद में भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनी मायावती ने इस दीवार को और ऊंची करते हुए क्यों सपाइयों को चिढ़ाने के लिए 29 सितंबर, 1995 को लोहिया की जन्मस्थली को लोहिया के बजाय आंबेडकरनगर के नाम से जिला बना डाला? क्यों तब मायावती के इस कदम को उनके द्वारा जिले के नामकरण के लिए लोहिया के घर में डकैती बताया गया था और क्यों अब कोई जिले के नाम से आंबेडकरर का नाम हटाने या लोहिया का नाम जोड़ने की बात भी नहीं करता?

इनमें आखिरी सवाल का जवाब इस पेंच से गुजरता है कि सपाई दशकों से अकबरपुर को लोहियानगर नाम से जिला बनाने की हसरत रखते थे और मायावती से पहले सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रीकाल में उनकी हसरत को इस ‘चतुराई’ के तहत अधूरी रहने दिया था कि उसके पूरी होने का सारा श्रेय मायावती की बसपा लूट लेगी, क्योंकि उन दिनों प्रस्तावित नए जिले की विधानसभा सीटों से चुने गए सभी पांच विधायक बसपा के ही टिकट पर चुनकर आए थे.

मतलब साफ है कि मुलायम को बसपा को अपने गठबंधन की जूनियर पार्टनर बनाए रखने के लिए अपने राजनीतिक आराध्य की जन्मभूमि को उनके नाम से जिला बनाने की अपने समर्थकों की मांग की अनसुनी से भी परहेज नहीं था!

ऐसे बढ़ी दुश्मनी

आगे चलकर सपा व बसपा की सरकारें अपनी-अपनी बारी पर इस ‘दुश्मनी’ को जिलों, सरकारी योजनाओं व संस्थानों के नामों से लोहिया या आंबेडकर का नाम जोड़ने के बेमतलब विवादों तक ले गईं. ऐसे, जैसे उक्त दोनों शख्सियतें परस्पर दुश्मन हों और उन्हें एक दूजे का नाम कतई बर्दाश्त न हो.
सपा सत्ता में आती तो इन सबसे जुड़ा आंबेडकर का नाम पोतकर लोहिया का नाम जोड़ देती और बसपा आती तो इसका उलटा करती. इससे कभी आंबेडकर ग्राम योजना लोहिया ग्राम योजना में बदल जाती और कभी लोहिया ग्राम योजना आंबेडकर ग्राम योजना हो जाती! इसी चक्कर में मायावती ने लोहिया की जन्मभूमि को अपनी कर्मभूमि बनाया और वहां से कई चुनाव लड़ीं!

इसकी तह में जाए तो तब वहां सपा-बसपा के निश्चिंत होकर ‘दुश्मनी-दुश्मनी’ खेलने की राह में कोई बाधा नहीं थी. कांग्रेस अपनी पुरानी जमीन खो चुकी थी और भाजपा अपनी सारी बढ़त के बावजूद जिले में आजादी के बाद से ही चला आ रहा अपनी जीत का सूखा खत्म नहीं कर पा रही थी. चुनावों में लड़ाई सपा-बसपा के बीच ही सिमट आती थी और उन्हीं दोनों में से कोई जीतती और कोई हारती थी.

यह स्थिति 2014 में बदली, जब नरेंद्र मोदी की आंधी में भाजपा के अनाम से प्रत्याशी हरिओम पांडे ने बसपा की कलाई मरोड़कर आंबेडकरनगर (जिसका नाम पहले अकबरपुर था) लोकसभा सीट उससे छीन ली. लोहिया की जन्मभूमि में यह सपा-बसपा दोनों के हाशिये पर जाने की शुरुआत थी, जो 2017 के विधानसभा चुनाव में भी जारी रही. इस चुनाव में भाजपा ने न सिर्फ जिले की टांडा और आलापुर विधानसभा सीटें जीतीं बल्कि अकबरपुर, जलालपुर व कटेहरी विधानसभा सीटों पर भी कड़ी चुनौती पेश की.

2019 के लोकसभा चुनाव में ‘मरता क्या न करता’ की तर्ज पर सपा व बसपा गठबंधन करके चुनाव मैदान में उतरीं तो बसपा ने भाजपा के आंबेडकररनगर को अपना स्थायी गुलिस्तान बनाने के प्रयासों को धूल चटाते हुए आंबेडकरनगर लोकसभा सीट फिर अपने नाम कर ली, लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में जलालपुर से चुने गए उसके विधायक रितेश पांडे सांसद बन गए और उनके द्वारा रिक्त विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ तो वह सपा के हाथों उसे गंवा बैठी.

2022 के विधानसभा चुनाव में सपा व बसपा के अलग-अलग चुनाव लड़ने के बावजूद जिले में भाजपा का खाता नहीं खुला लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने सपा के टिकट पर लड़ रहे विधायक लाल जी वर्मा को कड़ी टक्कर दी और बसपा को पछाड़ कर दूसरे नंबर पर आ गई. इतना ही नहीं, लाल जी वर्मा द्वारा रिक्त की गई कटेहरी विधानसभा सीट का उपचुनाव 34000 वोटों के बड़े अंतर से जीत लिया.

चौधरी चरण सिंह का गढ़

यहां यह जानना भी दिलचस्प है कि लोहिया की जन्मभूमि बीती शताब्दी के सातवें दशक में गैर-कांग्रेसवाद के उभार के बाद से ही चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल के गढ़ में बदलने लगी थी. आगे चलकर वह गैर-कांग्रेसवाद दलों के जनता पार्टी व जनता दल नामक प्रयोगों के साथ भी जुड़ी. फिर मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी और कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी बनाई तो यह राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में उनकी यारी व दुश्मनी दोनों की साक्षी बन गई.

यहां तक कि लोहिया व आंबेडकर, जो अपने आखिरी दिनों में दलितों व पिछड़ों की एकता के लिए मिलकर काम करने की सोच रहे थे, जानी दुश्मन-से बना दिए गए.

आज की तारीख में उस दुश्मनी की बर्फ तो खैर काफी हद तक पिघल गई लगती है, लेकिन उसे 1993 की उनकी ऐतिहासिक यारी और उसकी बिना पर उनक सुनहरे दौर की वापसी तक ले जाने के लिए जिस राजनीतिक विवेक की जरूरत है, सपा व बसपा के नेतृत्वों में वह दिखायी नहीं दे रहा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)