वैज्ञानिक प्रतिनियुक्ति पर…खाली पड़े कृषि विज्ञान केंद्र

भोपाल/मंगल भारत। मप्र में सरकार किसानों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है। इसके लिए सरकार का सबसे अधिक फोकस खेती-किसानी पर है। लेकिन विडंबना यह है कि सरकारी भर्राशाही के कारण कृषि वैज्ञानिक दूसरे विभागों में प्रतिनियुक्ति पर काम कर रहे हैं। इस कारण कृषि विज्ञान केंद्र सुने पड़े हैं। इसका प्रभाव यह देखने को मिल रहा है कि किसानों को वैज्ञानिक सलाह नहीं मिल पा रही है। किस समय खेती में क्या करना चाहिए इसकी जानकारी के अभाव में किसान अपने मन से खेती कर रहे हैं। दरअसल, जिन-जिन विभागों ने किसान विज्ञान केंद के विज्ञानियों को प्रतिनियुक्ति पर ले रखा है, वह नियम विरुद्ध है। इसकी वजह यह है कि सरकार इन कर्मचारियों को नियमित कर्मचारी नहीं मानती है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने कई अहम प्रभार ऐसे अशासकीय कर्मचारियों को सौंप रखे हैं। इतना ही नहीं, इन्हें जो वेतनमान दिया जा रहा है, वह भी उच्च पद का है।
दरअसल, कृषि विज्ञान केंद्र के विज्ञानियों पर इन दिनों दोहरी मार पड़ रही है। पहले तो इन विज्ञानियों का वेतन घटा दिया गया और छह माह से इन विज्ञानियों को वेतन ही नहीं मिल पा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अधीन काम करने वाले विज्ञानियों को सरकार नियमित कर्मचारी भी नहीं मानती है। दूसरी तरफ इन्हीं विज्ञानियों में कई ऐसे रसूखदार भी हैं, जो राज्य सरकार के अपर संचालक जैसे कार्यपालिक पद सहित कृषि विश्वविद्यालयों में प्रतिनियुक्ति में पदस्थ होकर उच्च वेतन पा रहे हैं। राज्य सरकार के उद्यानिकी विभाग में पदस्थ एक अपर संचालक केएस किराड़ का रुतबा तो ऐसा है कि प्रतिनियुक्ति अवधि समाप्त होने के बाद भी वह कृषि विज्ञान केंद्र धार में नहीं लौट रहे हैं। इनकी वापसी के लिए राजमाता विजया राजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय (आरवीएसकेवीवी) ग्वालियर के कुल सचिव ने पत्र लिखकर सेवाएं वापस मांगी थीं, लेकिन उद्यानिकी विभाग ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। विश्वविद्यालय ने एक आदेश जारी कर कहा था कि कृषि विज्ञान केंद्र के विज्ञानी सिर्फ केंद्र में ही पदस्थ रहेंगे, किसी अन्य संस्थान में नहीं। बावजूद इसके नियमों को ताक पर रखकर किराड़ पिछले चार साल से उद्यानिकी विभाग में बतौर अपर संचालक और विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी पदस्थ हैं। इधर, कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर ने कृषि विज्ञान केंद्र के कुछ विज्ञानियों को नियम विरुद्ध शैक्षणिक पदों पर नियमित कर दिया। इसके अलावा डॉ. योग रंजन उद्यानिकी विभाग के पूर्व मंत्री के ओएसडी बने हुए है। बता दें कि मप्र केवीके एम्प्लाइज वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर छह माह से नहीं मिल रहे वेतन का लंबित भुगतान करने की मांग की थी, लेकिन अब तक कोई निर्णय नहीं लिया गया।
किराड़ को लेकर विश्वविद्यालय सख्त
राजमाता विजया राजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुल सचिव ने नौ अप्रैल 2025 को पत्र जारी कर कृषि विज्ञानिक केएस किराड़ को मूल पद स्थापना कृषि विज्ञान केंद्र धार में उपस्थिति देने के लिए आदेश किया था। लेकिन किराड़ वापस जाने के बजाय उद्यानिकी विभाग में ओएसडी बन गए। सूत्रों का कहना है कि इसके लिए विश्वविद्यालय द्वारा कोई एनओसी भी नहीं दी गई। किराड़ ऐसे चहेते अधिकारी हैं कि उनके पास दोहरा प्रभार है। मंत्रालय में वह ही विभाग के ओएसडी का प्रभार भी संभाल रहे हैं। राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुलपति डॉ. अरविंद कुमार शुक्ला का कहना है कि विश्वविद्यालय द्वारा राज्य सरकार से कहा गया था कि इनकी (केएस किरार) सेवाएं वापस की जाएं। वैसे भी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के साथ जो एमओयू विश्वविद्यालय का हुआ है, उसमें स्पष्ट कहा गया है कि कृषि विज्ञानियों का डायवर्जन नहीं होगा। प्रतिनियुक्ति या स्थानांतरण भी नहीं होगा। वे अपनी मूल सेवा में वापस नहीं आएंगे तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। मप्र उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के सचिव जान किंग्सली का कहना है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के नियम की जानकारी मेरे संज्ञान में है। विभाग में वैकल्पिक व्यवस्था होते ही प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ अधिकारी (केएस किरार) को अपनी मूल पदस्थापना पर वापस भेज दिया जाएगा। वैसे भी अनुभवी स्टाफ नहीं है।