चुनाव आयोग को राजनीतिक प्रक्रियाओं से प्रभावित हुए बिना, स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए: जस्टिस नागरत्ना

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने एक कार्यक्रम में चुनाव आयोग के अलावा दूसरी केंद्रीय एजेंसियों की स्वतंत्रता के महत्व का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह बहुत ज़रूरी है कि केंद्रीय संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम करें और राजनीतिक प्रक्रियाओं से प्रभावित न हों. उन्होंने संबोधन में यह भी कहा कि केंद्र सरकार को राज्यों को बराबर का दर्जा देना चाहिए, न कि अपने अधीन समझना चाहिए.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की जज, जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार (4 अप्रैल) को कहा कि भारत के चुनाव आयोग को स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए और उसे राजनीतिक प्रक्रियाओं से प्रभावित नहीं होना चाहिए. उन्होंने चुनाव आयोग के अलावा दूसरी केंद्रीय एजेंसियों की स्वतंत्रता के महत्व का भी ज़िक्र किया.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस नागरत्ना पटना में चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में पहला डॉ. राजेंद्र प्रसाद मेमोरियल लेक्चर दे रही थीं, जिसका थीम था ‘अधिकारों से परे संवैधानिकता: संरचना क्यों महत्वपूर्ण है.’

कार्यक्रम में नागरत्ना ने कहा, ‘यह बहुत ज़रूरी है कि केंद्रीय संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम करें और राजनीतिक प्रक्रियाओं से प्रभावित न हों.’

उन्होंने आगे कहा कि संवैधानिक ढांचा धीरे-धीरे कमज़ोर होने से टूट सकता है, भले ही अधिकार कागज़ों पर सुरक्षित दिखें.

उन्होंने कहा, ‘संरचना का विघटन तब होता है जब संस्थाएं एक-दूसरे पर नियंत्रण और संतुलन बनाए रखना बंद कर देती हैं. उस स्थिति में चुनाव होते रह सकते हैं, न्यायालय काम करते रह सकते हैं, संसद कानून बनाती रह सकती है – फिर भी सत्ता पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रह जाता क्योंकि संस्थागत अनुशासन समाप्त हो जाता है.’

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि चुनाव आयोग, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) और वित्त आयोग जैसी संस्थाएं सुरक्षित, विशेषज्ञ और विशेष दायित्वों के लिए स्थापित की गई हैं, जहां निष्पक्षता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है.’

उन्होंने कहा, ‘यह बहुत ज़रूरी है कि ये संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम करें और राजनीतिक प्रक्रियाओं से प्रभावित न हों.’

देश के लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव करवाना सिर्फ़ एक नियमित काम नहीं है बल्कि यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से राजनीतिक सत्ता का गठन होता है.

उन्होंने कहा, ‘हमारे संवैधानिक लोकतंत्र ने समय पर चुनावों के माध्यम से सरकारों में सुचारु परिवर्तन का पर्याप्त उदाहरण पेश किया है. इस प्रक्रिया पर नियंत्रण का अर्थ वास्तव में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की परिस्थितियों पर नियंत्रण होता है.’

संविधान की सेहत पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि ‘क्या विधायिका आने वाले कानूनों पर सिर्फ़ मंज़ूरी की मुहर लगाने के बजाय उन पर सोच-विचार करती है’ और ‘क्या कार्यपालिका कानून के दायरे में रहकर शासन करती है, न कि कानून से ऊपर उठकर.’

ज्ञात हो कि वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस नागरत्ना सितंबर 2027 में भारत की मुख्य न्यायाधीश बनने की पंक्ति में हैं.

‘केंद्र सरकार राज्यों को अधीनस्थ न समझे’
जस्टिस नागरत्ना ने इसी सम्बोधन में यह भी कहा कि केंद्र सरकार को राज्यों को ‘बराबर का दर्जा देना चाहिए, न कि अपने अधीन समझना चाहिए.’ उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत का संवैधानिक ढांचा एक ऐसी व्यवस्था बनाता है जिसमें सभी बराबर के साझेदार होते हैं, न कि कोई कम ज्यादा वाला पदानुक्रम.

उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन ‘न तो कोई पदानुक्रम है और न ही प्राथमिकता का प्रश्न’, बल्कि यह एक सावधानीपूर्वक निर्मित संवैधानिक संतुलन है.

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि संघवाद केवल स्वायत्तता तक सीमित नहीं है. उन्होंने कहा, ‘यह सुनिश्चित करता है कि शासन एकतरफा आदेश का विषय न होकर, संवाद और समन्वय का परिणाम हो.’ उन्होंने यह भी जोड़ा कि सत्ता के विभिन्न केंद्र एक-दूसरे के संतुलनकारी के रूप में कार्य करें.

केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर सहयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, ‘राज्य सरकारें संविधान में निर्धारित सीमाओं को छोड़कर केंद्र सरकार के अधीन नहीं हैं.’

उन्होंने कहा कि सत्ता में कौन-सी राजनीतिक पार्टी है, इससे परे जाकर राज्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए. उन्होंने राजनीतिक नेताओं से शासन के मामलों में दलगत विचारों से ऊपर उठने का आग्रह किया.

उन्होंने कहा, ‘केंद्र-राज्य संबंधों के मामले में दलों के बीच के मतभेदों को अलग रखना होगा.’ उन्होंने यह भी कहा कि संवैधानिक शासन इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि केंद्र में कौन-सी पार्टी सत्ता में है और राज्यों में कौन-सी.

उन्होंने जोड़ा कि सरकार के दोनों स्तरों द्वारा चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नागरिकों को समान रूप से मिलना चाहिए.

संस्थागत अखंडता पर बोलते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि संविधान की रक्षा केवल संकट के समय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रमुख संस्थाओं के दैनिक कार्यकलापों पर भी निर्भर करती है. उन्होंने निर्वाचन आयोग, वित्त आयोग, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) और भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग जैसी संस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन्हें स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए, निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए और जनता का भरोसा जीतना चाहिए.