पुलिस थानों में काम कर रहे सीसीटीवी की कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय गृह सचिव को तलब किया

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस थानों में काम कर रहे सीसीटीवी कैमरों की कमी को लेकर केंद्रीय गृह सचिव को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया. इससे पहले 2020 में पुलिस थानों में हिरासत में अत्याचार रोकने के लिए सीसीटीवी कैमरे और रिकॉर्डिंग उपकरण ज़रूरी तौर पर लगाने का निर्देश दिया था.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को पुलिस थानों में काम करने वाले (functional) सीसीटीवी कैमरों की कमी को लेकर केंद्र सरकार से सवाल करते हुए केंद्रीय गृह सचिव को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया.

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, इस स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मीडिया में आई हालिया खबरों के बारे में भी जानकारी मांगी, जिनमें एक चीनी कंपनी द्वारा बनाए गए सीसीटीवी कैमरों को हटाए जाने की बात कही गई है.

जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राजा ठाकरे, जो केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, ने कहा कि इस संबंध में अभी तक कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं किया गया है, तो अदालत ने कहा, ‘इस मामले को कल फिर से सूचीबद्ध किया जाए. गृह सचिव इस अदालत के समक्ष उपस्थित रहें ताकि इस अदालत द्वारा निगरानी की जा रही योजना के क्रियान्वयन में उनसे उचित सहायता ली जा सके.’

जब न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) और वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने कहा कि केरल में सबसे बेहतर व्यवस्था है, तो जस्टिस नाथ ने कहा, ‘यदि आप कहते हैं कि केरल में सबसे बेहतर व्यवस्था है, तो अन्य राज्य इसे क्यों नहीं अपना सकते?’

उन्होंने यह भी कहा कि इस पर संबंधित अधिकारियों द्वारा चर्चा की जानी चाहिए.

न्याय मित्र दवे ने अदालत को बताया कि अधिकांश राज्यों ने सीसीटीवी कैमरे लगा दिए हैं और वे केंद्रीकृत डैशबोर्ड स्थापित करने की प्रक्रिया में हैं.

सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक समाचार रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका शुरू की थी, जिसमें पिछले आठ महीनों में 11 हिरासत में मौतों का उल्लेख था और इसे पुलिस थानों में कार्यरत सीसीटीवी कैमरों की कमी से जोड़ा गया था.

इससे पहले सीबीआई, ईडी और एनआईए जैसी एजेंसियों के ऑफिस में हिरासत में यातना रोकने के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाने के न्यायिक निर्देश पर केंद्र के कोई जवाब न देने पर सुप्रीम कोर्ट ने 25 नवंबर, 2025 को पूछा था कि क्या केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को ‘बहुत हल्के में’ ले रही है.

ज्ञात हो कि 2020 में जस्टिस रोहिंटन एफ. नरीमन (अब रिटायर्ड) की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में केंद्र को पुलिस थानों में हिरासत में अत्याचार रोकने के लिए सीसीटीवी कैमरे और रिकॉर्डिंग उपकरण ज़रूरी तौर पर लगाने का निर्देश दिया था.

अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), राजस्व खुफिया विभाग (डीआरआई), सीरियस फ्रॉड इंवेस्टिगेशन ऑफिस (सीएफआईओ) और ‘कोई भी एजेंसी जो पूछताछ करती है और गिरफ्तार करने की शक्ति रखती है’, के कार्यालयों में सीसीटीवी और रिकॉर्डिंग उपकरण लगाने का निर्देश दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में कहा था कि सीसीटीवी और रिकॉर्डिंग उपकरण का इस्तेमाल सम्मान और जीवन के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए सुरक्षा के तौर पर किया जाएगा.

जस्टिस नरीमन ने निर्देश दिया था, ‘क्योंकि इनमें से ज़्यादातर एजेंसियां ​​अपने ऑफिस में पूछताछ करती हैं, इसलिए उन सभी ऑफिस में सीसीटीवी लगाना ज़रूरी होगा जहां ऐसी पूछताछ और आरोपी को हिरासत में लिया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पुलिस थानों में होता है.’