जस्टिस वर्मा के इस्तीफ़े के बाद भी कई सवालों के जवाब मिलने बाक़ी

सरकारी आवास पर कथित कैश मिलने के मामले में आरोपी जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफ़ा दे दिया है. उनका यह क़दम तकनीकी रूप से चल रही महाभियोग की प्रक्रिया को ख़त्म कर देगा. लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि क्या एक बार फिर कोई न्यायाधीश संसद के दोनों सदनों द्वारा औपचारिक रूप से हटाए जाने से पहले, इस्तीफ़ा देकर संवैधानिक प्रक्रिया से बच गया है?

नई दिल्ली: लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित समिति, जिसने 14 मार्च 2025 को जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास के आउटहाउस से बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने के आरोपों की जांच शुरू की थी, अभी तक कोई खास प्रगति नहीं कर पाई है. इसी बीच जस्टिस वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनके तबादले के बाद से उन्हें कोई न्यायिक काम नहीं सौंपा गया था. 9 अप्रैल को राष्ट्रपति को लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा, ‘मैं आपके माननीय पद को उन कारणों से बोझिल नहीं करना चाहता, जिनके चलते मुझे यह पत्र लिखना पड़ा है, लेकिन गहरे दुख के साथ मैं तत्काल प्रभाव से इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा देता हूं.’

उनका यह इस्तीफा तकनीकी रूप से चल रही महाभियोग की प्रक्रिया को खत्म कर देगा. लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि क्या एक बार फिर कोई न्यायाधीश संसद के दोनों सदनों द्वारा औपचारिक रूप से हटाए जाने से पहले इस्तीफा देकर संवैधानिक प्रक्रिया से बच निकला?

ज्ञात हो कि उनका यह इस्तीफा महीनों तक उनके द्वारा अपनी गलती स्वीकारने से इनकार करने के बाद आया है.

महाभियोग की प्रक्रिया में आम तौर पर कई तथ्य सामने आते हैं और दोनों पक्षों की गवाही सुनी जाती है. उस समय संसद लगभग एक अदालत की तरह काम करती है. इससे सच्चाई सामने आती है और उन पहलुओं पर रोशनी पड़ती है, जहां सबसे ज्यादा जरूरत होती है.

इस्तीफा स्वीकार होने के बाद जस्टिस वर्मा, पहले के कई मामलों की तरह, एक पूर्व हाईकोर्ट जज को मिलने वाली सभी सुविधाओं और पेंशन के हकदार होंगे. ऐसा प्रतीत होगा जैसे उनके ऊपर कभी कोई मामला था ही नहीं.

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं:

क्या वे भ्रष्टाचार के दोषी थे?

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना द्वारा गठित तीन जजों की समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘30 तुगलक क्रिसेंट, नई दिल्ली स्थित सरकारी आवास के स्टोर रूम में नकदी मिली थी, जो जस्टिस वर्मा के आधिकारिक कब्जे में था.’ रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि उस स्टोर रूम तक पहुंच जस्टिस वर्मा और उनके परिवार के नियंत्रण में थी, और यह निष्कर्ष मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर निकाला गया.

रिपोर्ट के मुताबिक, 15 मार्च 2025 की सुबह तड़के इस जली हुई नकदी को वहां से हटा दिया गया था.

लेकिन आज तक यह स्पष्ट नहीं है कि यह पैसा किसका था. जस्टिस वर्मा ने यह जरूर कहा कि जिस कमरे में नकदी मिली, वह उनके आवास का हिस्सा नहीं था, लेकिन वहां पैसे होने से उन्होंने इनकार नहीं किया.

ऐसे में सवाल है- यह पैसा किसका था? क्या यह किसी मामले के बदले दी गई रिश्वत थी या फिर जस्टिस वर्मा किसी साजिश के शिकार थे?

क्या मामला यहीं खत्म हो जाना चाहिए?

नहीं, बिल्कुल नहीं. भले ही जज ने इस्तीफा दे दिया हो, लेकिन यह जानना जरूरी है कि पैसा किसका था. रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘तड़के उस नकदी को स्टोर रूम से हटाया गया.’ ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि पैसा किसने हटाया और वह असल में किसका था. और इसका पता केवल निष्पक्ष जांच से लगाया जा सकता है. पुलिस को भी यह बताना चाहिए कि वह पैसा या उसके अवशेष कहां हैं.

इस मामले से खुद जस्टिस वर्मा की भी साख जुड़ी है. अगर उनके समर्थकों के मुताबिक, यह पूरी घटना उनकी छवि खराब करने की साजिश थी, तो एक निष्पक्ष जांच से यह सच सामने आ सकता है और उनकी प्रतिष्ठा कुछ हद तक बहाल हो सकती है.

लेकिन क्या ऐसा होगा?

अब तक के अनुभव बताते हैं कि ऐसा होना मुश्किल है. उनके इस्तीफे के साथ मामला लगभग खत्म हो जाता है. लेकिन उनका इस्तीफा न तो दोष स्वीकार करना है और न ही उन्हें क्लीन चिट देता है.

जजों की समिति की रिपोर्ट का क्या?
तीन जजों की इस समिति ने 10 दिनों में 55 गवाहों से बात की, घटनास्थल का दौरा किया और 10 चश्मदीद गवाहों के बयानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि उन्होंने जली या आधी जली हुई नकदी देखी थी.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘रिकॉर्ड पर मौजूद प्रत्यक्ष और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि 22 मार्च 2025 को सीजेआई के पत्र में लगाए गए आरोपों में पर्याप्त दम है. साबित हुआ आचरण इतना गंभीर है कि जस्टिस यशवंत वर्मा को पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए.’

यह रिपोर्ट आगे की किसी ठोस जांच का आधार बन सकती है.

क्या सच्चाई कभी सामने आएगी?

संभवतः नहीं. आम तौर पर माना जाता है कि अब जस्टिस वर्मा शांतिपूर्ण सेवानिवृत्त जीवन जी सकेंगे. लेकिन हम लोग अनिश्चित समय में जी रहे हैं. अगर कोई जिम्मेदार व्यक्ति इस मामले को दोबारा देखने का फैसला करता है, तब सच्चाई सामने आ सकती है.

अब तक हुई जांच का क्या होगा?

इस्तीफे के बाद इस समिति को भंग कर दिया जाएगा. लेकिन अगर समिति ने अब तक जो काम किया है, उसे सार्वजनिक किया जाए, तो यह न्यायपालिका सहित सभी संस्थानों के लिए अच्छा होगा. हालांकि, ऐसा होने की संभावना बहुत कम है… लगभग न के बराबर.

जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक उच्च न्यायपालिका की साख को जो नुकसान हुआ है, वह मिट नहीं पाएगा. और जस्टिस वर्मा का यह मामला गलत कारणों से लंबे समय तक याद रखा जाएगा.