गोविंद दादा : राजनीति के उस व्यक्तित्व की कथा जो स्वाभिमान और सेवा का प्रतीक बना
बलराम पांडेय (9893572905)
सीधी जिले की राजनीतिक फिजाओं में एक नाम जब-जब गूंजता है, तो लोग सम्मान में सिर झुका लेते हैं — गोविंद दादा। एक ऐसा नाम, जो केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक युग की निशानी है। आज, 2 अगस्त को जब उनका जन्मदिन है, तो यह केवल जन्मदिवस नहीं, बल्कि उस संघर्ष, सिद्धांत और सादगी की भी पुनः स्मृति है, जो उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में जिया।
एक साधारण गांव से असाधारण सफर तक
1949 में चुरहट क्षेत्र के कोष्टा गांव में पंडित हनुमान प्रसाद मिश्र के घर जन्मे गोविंद मिश्र, विरासत में राजनीतिक चेतना लेकर नहीं आए थे, लेकिन पिताजी के संस्कारों ने उन्हें सेवा और स्वाभिमान के बीज बचपन में ही दे दिए थे। चुरहट के स्कूल से प्रारंभिक पढ़ाई कर, विदिशा के एस.ए.टी.आई. कॉलेज से डिप्लोमा और मऊगंज से एलएलबी पूरी कर, वह जीवन के सुरक्षित रास्ते शासकीय नौकरी में दाखिल हो गए। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
जब भीतर राजनीति का ज्वार फूटा
साल था 1977 — देश में आपातकाल के बाद लोकतंत्र की नयी सुबह थी। गोविंद जी सिहावल में पदस्थ थे, लेकिन दिल में राजनीतिक लहरें हिलोरे मार रही थीं। और तब उन्होंने वह कर दिखाया जो साहसी ही करते हैं — नौकरी को अलविदा कहा और कलेक्टर अजीत जोगी के समक्ष त्यागपत्र देकर चुनावी रण में कूद पड़े। पहली बार निर्दलीय चुनाव लड़ना केवल प्रतीकात्मक था, क्योंकि सामने अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज थे।
जनता पार्टी से लेकर भाजपा तक का सफर
राजनीति में हार एक पड़ाव भर है, मंज़िल नहीं। 1980 में जनता पार्टी से चुनाव लड़ा, फिर 1985 में भी पार्टी उम्मीदवार बने। 1989 में भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता लेकर उन्होंने पार्टी की विचारधारा के साथ खुद को जोड़ा। 1990 में जब भाजपा ने उन्हें प्रत्याशी बनाया, तो सामने अजय सिंह थे, और ये मुकाबला हमेशा की तरह दिलचस्प रहा।
पहली जीत और सत्ता की शुरुआत
1993 में जब प्रदेश की राजनीति ने करवट ली और चुरहट से राव परिवार चुनावी मैदान से बाहर था, तब गोविंद मिश्र ने मौका पहचाना और पहली बार विधायक बने। यह वह समय था जब उनके भीतर के जनप्रतिनिधि को जनता ने खुलकर स्वीकारा। बाद में उन्हें ऊर्जा विकास निगम का अध्यक्ष बना कर राज्यमंत्री का दर्जा भी दिया गया।
सांसद के रूप में बेदाग़ कार्यकाल
वर्ष 2009 में जब सीधी लोकसभा सामान्य हुई, तो गोविंद दादा ने पूरे जिले का प्रतिनिधित्व करते हुए दिल्ली की संसद में पहुंच बनाई। सांसद के रूप में उनकी ईमानदार उपस्थिति और सक्रिय सहभागिता को सम्मानित भी किया गया। लेकिन राजनीति में निर्णय हमेशा अपने हाथ में नहीं होते अगली बार पार्टी ने टिकट नहीं दिया, और उन्होंने स्वयं को धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से अलग कर लिया।
विधायक से सांसद तक — और फिर भी जनता के बीच
1993 में पहली बार विधायक बने और 2009 में सांसद। सांसद रहते उन्होंने ईमानदारी और उपस्थिति के ऐसे मानक बनाए, जिनके लिए उन्हें संसद में सम्मानित भी किया गया।
लेकिन राजनीति में उतार-चढ़ाव आते हैं — अगली बार पार्टी ने टिकट नहीं दिया और उन्होंने गरिमा के साथ सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली। लेकिन जनता से नहीं।
जनप्रतिनिधि नहीं, जन-सेवक बने
गोविंद दादा की राजनीति की सबसे बड़ी ताक़त थी — जनता की छोटी से छोटी जरूरत को भी अपने दायित्व का हिस्सा मानना।
उन्होंने ही चुरहट में यह परंपरा शुरू की कि मुख्यमंत्री सहायता कोष से गरीबों का इलाज, स्कूलों में बेंच, भवन, पुस्तक वितरण जैसे कार्य, हैंडपंप और नालीकरण जैसे बुनियादी कार्यों के लिए सीधे पहल करना — यह केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं, उनकी निजी जिम्मेदारी थी।
आज जो कार्य अन्य नेता ‘उपलब्धि’ कहकर प्रचारित करते हैं, उसकी नींव सबसे पहले गोविंद मिश्रा ने रखी थी — चुपचाप, बिना शोर के।
उनके इस नवाचार को बाद में अन्य नेताओं ने भी अपनाया और राजनीति में सामाजिक सेवाओं का एक नया आयाम बना।
बिना पद के भी सबसे अधिक उपस्थित
आज भी गोविंद दादा किसी पद पर नहीं हैं, लेकिन लोगों के दिलों में उनकी उपस्थिति पहले से भी ज्यादा गहरी है।उनके जन्मदिन पर आज भी सैकड़ों लोग बिना औपचारिकता, बिना झिझक के उनके घर पहुंच जाते हैं — केवल उनका आशीर्वाद लेने। और उनकी एक बड़ी खासियत — अगर कोई भी व्यक्ति उनसे मिलने उनके घर आता है, तो वह बिना चाय-नाश्ता किए लौट नहीं सकता।
यह आत्मीयता उन्हें बाकी नेताओं से अलग करती है — क्योंकि वो लोगों को सिर्फ वोटर नहीं, परिवार मानते हैं।
आमजन के निमंत्रणों को निभाने की मिसाल
चुरहट की राजनीति में जन-संपर्क की आत्मीय परंपरा की नींव भी गोविंद दादा ने ही रखी।
उन्होंने ही यह परंपरा शुरू की कि किसी भी आम नागरिक का निमंत्रण छोटा नहीं होता — चाहे विवाह हो, धार्मिक आयोजन हो या पारिवारिक भोज — दादा ससम्मान उपस्थित होते। रात के 1 बजे भी लौटते नहीं थे जब तक हर निमंत्रण पूरा न हो जाए। बाद में इस परंपरा को चुरहट के अन्य नेताओं ने भी अपनाया और उन्हें भी राजनीतिक लाभ मिला — लेकिन आदर्श और शुरुआत गोविंद दादा से ही थी।
