अवधूत रामायणी स्वामी स्वयमानंद गिरी महाराज का गृह ग्राम आगमन
पत्रकारों से संवाद, उद्देश्य-साधना और राष्ट्रव्यापी मिशन पर रखे विचार
चुरहट/ मंगल भारत
अपने गृह ग्राम आगमन पर अवधूत रामायणी स्वामी स्वयमानंद गिरी महाराज ने स्थानीय पत्रकारों से विस्तृत बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अपने जीवन के उद्देश्य, साधना पथ और राष्ट्र-समाज के लिए संचालित मिशनों पर खुलकर प्रकाश डाला। स्वामी जी ने कहा कि उनका संपूर्ण जीवन गौ माता, राज्य माता, राष्ट्र माता और विश्व माता की सेवा, संरक्षण और जागरण को समर्पित है।
स्वामी स्वयमानंद गिरी महाराज का जन्म ग्राम पंचायत छोटा टिकट में 20 अगस्त 1961 को हुआ। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने डढिया स्कूल से प्राप्त की, जहाँ उन्होंने कक्षा आठवीं तक अध्ययन किया। इसके बाद वे कक्षा नौवीं में प्रतिभावान छात्र के रूप में उच्च शिक्षा हेतु सीधी चले गए।
उन्होंने बताया कि दसवीं कक्षा की पढ़ाई के दौरान ही उनके जीवन में गहरा आध्यात्मिक परिवर्तन आया और 17 जनवरी 1977 को श्री सीताराम जी की भक्ति में लीन होकर उन्होंने गृह त्याग कर दिया। इसके पश्चात वे प्रयागराज पहुंचे, जहाँ उन्होंने सन्यास ग्रहण किया।
आध्यात्मिक साधना के क्रम में 26 जनवरी 1977 को वे अटल अखाड़ा में सम्मिलित हुए। स्वामी जी ने बताया कि अटल अखाड़े के इष्ट देवता श्री गणेश जी हैं, जिनकी कृपा से उनका साधना पथ निरंतर प्रगाढ़ और सुदृढ़ होता गया।
उन्होंने कहा कि 1980 से उन्होंने अहमदाबाद सन्यास आश्रम से सामाजिक-आध्यात्मिक कार्यों की विधिवत शुरुआत की और तब से लेकर आज तक वे शंकराचार्य जी तथा गोपाल मणि के साथ मिलकर “गौ माता, राज्य माता, राष्ट्र माता, विश्व माता मिशन” में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

वर्तमान में स्वामी स्वयमानंद गिरी महाराज एक पारिवारिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए अपने गृह ग्राम आए हुए हैं। इस अवसर पर उन्होंने क्षेत्र में भी सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना के विस्तार हेतु विभिन्न मिशनों पर कार्य करने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में गौ-संरक्षण, युवा जागरण, नैतिक शिक्षा और सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
इसी क्रम में स्वामी जी ने हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से भी मुलाकात की, जहाँ उन्होंने अपने मिशन की विस्तृत जानकारी देते हुए राज्य में इसे आगे बढ़ाने और व्यापक स्तर पर लागू करने पर चर्चा की।
स्वामी स्वयमानंद गिरी महाराज की मेधा के किस्से भी क्षेत्र में चर्चित रहे हैं। कहा जाता है कि वे पढ़ाई में इतने प्रतिभाशाली थे कि जब उन्हें मेधावी छात्र के रूप में जिले के छात्रावास में अध्ययन हेतु भेजा गया, तब तत्कालीन कलेक्टर अजीत जोगी ने उनके लिए अतिरिक्त पुस्तकों की व्यवस्था करवाई। बताया जाता है कि स्वामी जी ने वे सभी पुस्तकें अल्प समय में पढ़ लीं और पुनः नई पुस्तकें मंगाने की इच्छा जताई, किंतु बजट की समस्या के कारण उस समय और पुस्तकें उपलब्ध नहीं कराई जा सकीं।
स्वामी स्वयमानंद गिरी महाराज के आगमन से क्षेत्र में आध्यात्मिक उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा का माहौल है। स्थानीय नागरिकों ने उनके विचारों को प्रेरणादायी बताते हुए भविष्य में उनके मार्गदर्शन में सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ने की इच्छा प्रकट की है।
महाराज जी के जीवन से जुड़े और भी रोचक व प्रेरक प्रसंग अगले अंक में प्रकाशित किए जाएंगे।