सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को अरावली पहाड़ियों की परिभाषा के बारे में पर्यावरण मंत्रालय की जिन सिफ़ारिशों को मंज़ूरी दी थी उस पर अब रोक लगा दी है. सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने कहा कि परिभाषा से जुड़े 20 नवंबर के आदेश को फिलहाल स्थगित रखा जाए क्योंकि इसमें कई ऐसे मुद्दे हैं जिनकी और जांच की ज़रूरत है.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को अरावली पहाड़ियों की परिभाषा के बारे में पर्यावरण मंत्रालय की जिन सिफारिशों को मंज़ूरी दी थी उस पर अब रोक लगा दी है.
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, मालूम हो कि अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को लेकर विवाद और लगातार विरोध के बीच सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सोमवार को इस मामले पर सुनवाई की.
इस संबंध में सोमवार (29 दिसंबर) को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने कहा कि अरावली पहाड़ियों की परिभाषा से जुड़े 20 नवंबर के आदेश को फिलहाल स्थगित रखा जाए क्योंकि इसमें कई ऐसे मुद्दे हैं जिनकी और जांच की ज़रूरत है.
पीठ ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर पहले बनी सभी समितियों की सिफारिशों का आकलन करने के लिए एक नई उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव भी दिया. साथ ही अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से भी कहा है कि वे प्रस्तावित समिति की संरचना समेत इस मामले में अदालत की सहायता करें.
अब इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को होगी.
फैसले के बाद अरावली विरासत जन अभियान की संयोजक नीलम अहलूवालिया ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने नई परिभाषा के प्रभाव पर विस्तृत स्वतंत्र अध्ययन का आदेश दिया है. अरावली संरक्षण की मांग को लेकर जन आंदोलन जारी रहेगा.
नई परिभाषा को लेकर विवाद और विरोध प्रदर्शन
गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार की अरावली की पहाड़ियों के लिए दी गई नई परिभाषा को स्वीकारे जाने के बाद से 4 राज्यों के बीच लगभग 700 किलोमीटर तक फैली अरावली के अस्तित्व को लेकर चिताएं पैदा हो गई थीं. नई परिभाषा के हिसाब से ज़मीन से कम से कम 100 मीटर ऊंचे हिस्से को ही अरावली पहाड़ी मानी जाएगी.
इसे लेकर राजस्थान में बड़ी संख्या में लोग केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.
समिति ने कोर्ट के सामने यह बात स्पष्ट नहीं की थी कि इस परिभाषा के अनुसार अरावली की 90% से अधिक पहाड़ियां अरावली के दायरे से बाहर हो जाएंगी. इससे उन क्षेत्रों में खनन और निर्माण को रास्ता मिल सकता है, जिसके गंभीर पर्यावरणीय असर होंगे, खासकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में हवा की गुणवत्ता पर.
भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) के एक आंतरिक मूल्यांकन के अनुसार, राजस्थान के 15 जिलों में फैले 12,081 अरावली के वे पहाड़/टीलें जो 20 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई के हैं, उनमें से सिर्फ 1,048 (यानी केवल 8.7%) ही 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचे हैं.
20 मीटर की ऊंचाई का मानक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इतनी ऊंचाई वाले पहाड़ हवा को रोकने के लिए एक प्राकृतिक अवरोध (विंड बैरियर) की भूमिका निभाते हैं.
ज्ञात हो कि अरावली पर्वतमाला दिल्ली से उत्तर में शुरू होकर हरियाणा और राजस्थान से गुजरते हुए दक्षिण में गुजरात तक फैली हुई है.
पुराने मानकों की अनदेखी
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि अरावली की एक समान परिभाषा तैयार करे. 2010 से, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) अरावली पहाड़ियों को परिभाषित करने के लिए 3-डिग्री ढलान का मानक इस्तेमाल कर रहा था.
इसी उद्देश्य से 2024 में बनाई गई एक तकनीकी समिति ने इस मानक में बदलाव किया और सुझाव दिया कि जिस भौगोलिक संरचना में कम से कम 4.57 डिग्री की ढलान हो और ऊंचाई कम से कम 30 मीटर हो, उसे अरावली पहाड़ी माना जाना चाहिए. इन मानकों से लगभग 40% अरावली क्षेत्र को कवर किया जा सकता था.
लेकिन इसके बावजूद, मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी हलफनामे में एक बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट के ज़रिए 100 मीटर वाली परिभाषा ही सुझाई.
मंत्रालय ने नई परिभाषा को सही ठहराने के लिए ढलान और ऊंचाई के मापदंडों को आपस में मिला दिया और कुछ ऐसे सब्जेक्टिव ऊंचाई मानक पेश किए, जिनके बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि इससे 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली कई पहाड़ियां भी अरावली की श्रेणी से बाहर हो सकती हैं.
पर्यावरणविदों की चिंता है कि सिर्फ़ ऊंचाई के आधार पर अरावली को परिभाषित करने से कई ऐसी पहाड़ियों पर खनन और निर्माण के लिए दरवाज़ा खुल जाने का ख़तरा पैदा हो जाएगा, जो 100 मीटर से छोटी हैं, झाड़ियों से ढंकी हुईं और पर्यावरण के लिए ज़रूरी हैं.
हालांकि, केंद्र सरकार का तर्क है कि नई परिभाषा का मकसद नियमों को मज़बूत करना और एकरूपता लाना है, न कि किसी भी तरह की सुरक्षा को कम करना.