मनरेगा को ख़त्म करने के फैसले को क़ानूनी चुनौती देगी कर्नाटक सरकार

कर्नाटक मंत्रिमंडल द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया कि वीबी- जी राम जी अधिनियम को स्वीकार नहीं किया जाएगा और इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी. नया क़ानून भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित काम के अधिकार का उल्लंघन करता है, संविधान द्वारा पंचायतों को प्रदत्त वैध अधिकारों को रौंदता है और 73वें तथा 74वें संवैधानिक संशोधनों की भावना के ख़िलाफ़ है.

नई दिल्ली: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को खत्म करने और केंद्र सरकार द्वारा विकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम लागू किए जाने के अपने विरोध को और आगे बढ़ाते हुए कर्नाटक सरकार इस फैसले को कानूनी रूप से चुनौती देने की संभावनाओं पर विचार करेगी.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य मंत्रिमंडल ने गुरुवार को न केवल कानूनी उपाय तलाशने का फैसला किया, बल्कि सत्ता के विकेंद्रीकरण का प्रावधान करने वाले संविधान के 73वें संशोधन को हुए ‘नुकसान’ को उजागर करने के लिए ‘जनता की अदालत’ में जाने का भी निर्णय लिया.

कैबिनेट बैठक के बाद प्रेस वार्ता में विधि एवं संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल ने कहा, ‘पंचायतों ने मनरेगा को खत्म करने के खिलाफ कानूनी उपाय अपनाने के लिए राज्य सरकार से संपर्क किया है. मंत्रिमंडल में विस्तृत विचार-विमर्श के बाद हमने महाधिवक्ता से यह पता लगाने को कहा है कि हाईकोर्ट या शीर्ष अदालत में जाने की कानूनी संभावनाएं क्या हैं. हम राजनीतिक और कानूनी – दोनों तरह की लड़ाई लड़ेंगे.’

पाटिल ने 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बाद नए कानून के अधिनियमन पर सवाल उठाया और कहा कि केंद्र ने राज्यों से परामर्श किए बिना यह अधिनियम पारित किया है. उन्होंने कहा, ‘इससे राज्यों पर वित्तीय बोझ भी बढ़ गया है. मनरेगा को खत्म करने से काम के अधिकार पर चोट पड़ी है और शक्तियों का केंद्रीकरण होगा. अब केंद्र यह तय करेगा कि किस गांव में किस तरह का काम किया जाएगा, जिससे पंचायतों की शक्तियां छीनी जाएंगी.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मंत्रिमंडल द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया, ‘सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया है कि इस अधिनियम को स्वीकार नहीं किया जाएगा और इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी.’

प्रस्ताव के अनुसार नया कानून भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित काम के अधिकार का उल्लंघन करता है, संविधान द्वारा पंचायतों को प्रदत्त वैध अधिकारों को रौंदता है और 73वें तथा 74वें संवैधानिक संशोधनों की भावना के खिलाफ है.

प्रस्ताव में आगे कहा गया, ‘यह अधिनियम संघीय ढांचे को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, क्योंकि न केवल राज्यों को परामर्श प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रखा गया है, बल्कि उनसे 40 प्रतिशत खर्च वहन करने की अपेक्षा भी की गई है, वह भी उन शर्तों पर जिन्हें केंद्र ने राज्यों को विश्वास में लिए बिना एकतरफा तय किया है.’

पाटिल ने ‘वीबी- जी राम जी’ के प्रावधानों की आलोचना करते हुए कहा कि यह कानून इसके तहत पंजीकृत मजदूरों को ठेकेदारों के भरोसे छोड़ देता है.
उन्होंने आरोप लगाया कि नया अधिनियम ठेकेदारों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया है. जहां मनरेगा के तहत स्थानीय ग्राम पंचायत के फैसलों के आधार पर लाभार्थियों को अपने आसपास रोजगार मिलता था, वहीं ‘वीबी- जी राम जी’ के तहत कई लोगों को काम की गारंटी नहीं होगी, क्योंकि अब केंद्र यह तय करेगा कि किन जिलों में काम कराया जाएगा.