मध्य प्रदेश सरकार द्वारा वित्तपोषित पंचगव्य शोध योजना अब वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों में घिर गई है. जांच में सामने आया है कि कैंसर उपचार के नाम पर मिले करोड़ों रुपये परियोजना से असंबंधित मदों – यात्रा, वाहन, उपकरण और फर्नीचर – पर खर्च किए गए, जबकि ठोस शोध नतीजे नहीं मिले.

मध्य प्रदेश: गौमूत्र-गोबर से कैंसर इलाज परियोजना में 3.5 करोड़ की अनियमितता, 1.75 करोड़ की संदिग्ध खरीद
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा वित्तपोषित पंचगव्य शोध योजना अब वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों में घिर गई है. जांच में सामने आया है कि कैंसर उपचार के नाम पर मिले करोड़ों रुपये परियोजना से असंबंधित मदों – यात्रा, वाहन, उपकरण और फर्नीचर – पर खर्च किए गए, जबकि ठोस शोध नतीजे नहीं मिले.
द वायर स्टाफ
11/01/2026 भारत
(फोटो साभार: www.ndvsu.org)
नई दिल्ली: कैंसर के इलाज में गोबर, गौमूत्र और दूध के इस्तेमाल पर आधारित जिस शोध परियोजना को मध्य प्रदेश सरकार की वित्तपोषित पहल के रूप में प्रचारित किया गया था, वही अब नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में कथित वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोपों के घेरे में आ गई है.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, शोध फंड के दुरुपयोग की शिकायतों के बाद जबलपुर कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने इस मामले की जांच के आदेश दिए और अतिरिक्त कलेक्टर आर.एस. मरावी के नेतृत्व में दो सदस्यीय जांच समिति गठित की. समिति की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि शोध के नाम पर मिले सरकारी धन का इस्तेमाल परियोजना से असंबंधित मदों में किया गया.
अतिरिक्त कलेक्टर मरावी ने बताया कि दस्तावेज़ों की शुरुआती पड़ताल में पाया गया कि करीब तीन लाख रुपये हवाई यात्राओं पर खर्च किए गए, जबकि किसी भी शोध-संबंधित दौरे के ठोस प्रमाण नहीं मिले. इसके अलावा, परियोजना के पैसों से एक कार खरीदी गई और लगभग 15 लाख रुपये वाहन की मरम्मत, पेट्रोल और डीज़ल पर खर्च किए गए.
यह तथाकथित ‘पंचगव्य योजना’ वर्ष 2011 में शुरू की गई थी, जब राज्य सरकार ने गोबर, गौमूत्र और दूध के माध्यम से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज पर शोध के लिए 3.5 करोड़ रुपये मंज़ूर किए थे. हालांकि, जांच में अब तक इस शोध के ठोस और विश्वसनीय नतीजे सामने नहीं आए हैं.
जांच समिति के अनुसार, करीब 1.75 करोड़ रुपये कच्चे माल और मशीनों की खरीद पर खर्च किए गए, लेकिन ये उपकरण बाजार मूल्य से कई गुना अधिक कीमत पर खरीदे गए. इसके अलावा, शोध फंड से लगभग 15 लाख रुपये फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर तथा करीब पांच लाख रुपये अन्य मदों में खर्च किए गए.
मरावी ने बताया कि जांच रिपोर्ट कलेक्टर को सौंप दी गई है और आगे की कार्रवाई प्रशासनिक स्तर पर तय की जाएगी.
वहीं, विश्वविद्यालय के कुलपति मनदीप शर्मा का कहना है कि यह शोध कार्यक्रम वर्ष 2018 में समाप्त हो चुका था और उस समय तकनीकी तथा वित्तीय रिकॉर्ड को मंज़ूरी दी गई थी. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अब परियोजना से जुड़े दस्तावेज़ों की दोबारा समीक्षा कर रहा है और रिकॉर्ड की जांच के बाद मीडिया को आधिकारिक जानकारी दी जाएगी.
पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देने के उद्देश्य से शुरू की गई यह परियोजना अब पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है.