मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की जेंडर संबंधी पूर्वाग्रहों को काम करने संबंधी हैंडबुक को ‘हार्वर्ड जैसी सोच से प्रभावित’ बताया है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘सरल’ और ‘व्यावहारिक’ बनाने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है.

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मंगलवार (11 फरवरी) को कहा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ द्वारा तैयार की गई ‘हैंडबुक ऑन कॉम्बैटिंग जेंडर स्टीरियोटाइप्स’ हैंडबुक (लैंगिक पूर्वाग्रहों से बचने के लिए बनाई गई पुस्तिका) बलात्कार पीड़ितों और आम लोगों के लिए ज्यादा उपयोगी नहीं है. उन्होंने कहा कि यह किताब ‘बहुत ज्यादा तकनीकी’ है और ‘हार्वर्ड जैसी सोच से प्रभावित’ लगती है.
टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, उन्होंने संकेत दिया कि इस पुस्तिका को अधिक व्यावहारिक और प्रभावी बनाने के लिए एक पैनल गठित किया जाएगा, जो इसमें आवश्यक संशोधन सुझाएगा.
ज्ञात हो कि साल 2023 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की पहले से पुस्तिका को इस उद्देश्य से तैयार किया गया था कि न्यायाधीश पितृसत्तात्मक भाषा को पहचान सकें और उससे बच सकें. लेकिन वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का मानना है कि यह अत्यधिक अकादमिक है और मुकदमेबाजों की जमीनी हकीकत से जुड़ा नहीं है. उन्होंने इस विषय में व्यावहारिक प्रशिक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया है.
सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां उस स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान आईं, जो 17 मार्च 2025 को दिए गए इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले से जुड़ा था. हाईकोर्ट ने कहा था कि ‘स्तनों को पकड़ना’ और महिला पीड़िता के पायजामे का कमरबंद तोड़ना बलात्कार का ‘प्रयास’ नहीं, बल्कि केवल बलात्कार की ‘तैयारी’ है. तैयारी और प्रयास के बीच किया गया यह अंतर कथित रूप से असंवेदनशील होने के कारण व्यापक आलोचना का विषय बना था.
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष ही इस फैसले का संज्ञान लेते हुए उस पर रोक लगा दी थी और न्यायिक दृष्टिकोण पर चिंता व्यक्त की थी. मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने औपचारिक रूप से हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट को आरोपियों के खिलाफ बलात्कार के प्रयास के आरोप में मुकदमा आगे बढ़ाने का निर्देश दिया.
पुस्तिका पर पीठ का मत
पीठ का मत है कि 30 पृष्ठों की इस पुस्तिका में यौन उत्पीड़न से जुड़े विभिन्न पहलुओं को अत्यधिक फॉरेंसिक और तकनीकी दृष्टिकोण से समझाया गया है, जिसे न तो पीड़िता, न उसके परिजन और न ही आम नागरिक आसानी से समझ पाएंगे. मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट कहा, ‘यह अत्यधिक हार्वर्ड-केंद्रित है.’
पीठ ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी – एनजेए) को निर्देश दिया कि वह विषय-विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और अधिवक्ताओं को शामिल करते हुए एक समिति गठित करे. यह समिति पूरे विषय की पुनर्समीक्षा कर नए दिशा-निर्देश तैयार करे और अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को सौंपे.
न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में वकीलों की सहायता ली जाएगी, जिनमें एमिकस क्यूरी शोभा गुप्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका शामिल हैं. पुस्तिका को अंतिम रूप दिए जाने के बाद एनजेए इसे उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के लिए अध्ययन सामग्री के रूप में तैयार करे. न्यायाधीशों को चरणबद्ध तरीके से बुलाकर यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई में अपेक्षित संवेदनशीलता के बारे में प्रशिक्षण दिया जाए.
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, ‘सुप्रीम कोर्ट में बैठकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उपदेश देने से कोई लाभ नहीं. उन्हें राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए.’
गौरतलब है कि पिछले वर्ष 26 मार्च को, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया था और उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी थी. साथ ही, फैसले में झलक रही असंवेदनशीलता पर गहरी आपत्ति भी जताई थी.
16 अगस्त को जारी इस पुस्तिका में ऐसे अनेक शब्दों और वाक्यांशों की सूची दी गई है जो महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह या रूढ़ धारणाओं को मजबूत करते हैं. इनके स्थान पर अधिक संतुलित और तटस्थ भाषा के प्रयोग का सुझाव दिया गया है. उदाहरण के लिए, ‘व्यभिचारिणी’ जैसे शब्द के बजाय ‘विवाह के बाहर संबंध रखने वाली महिला’ जैसे वर्णनात्मक शब्दों के उपयोग की बात कही गई है. इसी प्रकार ‘प्रेम प्रसंग’ के स्थान पर ‘विवाहेतर संबंध’ शब्द के प्रयोग की अनुशंसा की गई है.
पुस्तिका में यह भी सुझाव है कि कई अपमानजनक या नकारात्मक अर्थ वाले शब्दों – जैसे ‘करिअर उन्मुखी महिला’, ‘पवित्र महिला’, ‘चरित्रहीन महिला’, ‘वेश्या’, ‘बदचलन महिला’ – की जगह केवल ‘महिला’ शब्द का प्रयोग किया जाए, ताकि भाषा में निहित पूर्वाग्रह को कम किया जा सके.