आरटीआई संशोधनों पर फिलहाल रोक नहीं, सुप्रीम कोर्ट बोला- निजता और सूचना के अधिकार में संतुलन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने डीपीडीपी एक्ट, 2023 के जरिए आरटीआई कानून में किए गए संशोधनों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया है. अदालत ने कहा कि निजता और सूचना के अधिकार जैसे प्रतिस्पर्धी मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा. मामले को बड़ी पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया है.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (16 फरवरी) को डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट, 2023 और उससे जुड़े 2025 के नियमों के जरिए सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून में किए गए संशोधनों पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया. हालांकि अदालत ने कहा कि वह इन संशोधनों की जांच करेगी ताकि परस्पर टकराते अधिकारों के बीच ‘संतुलन’ स्थापित किया जा सके.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने मामले को एक बड़ी पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया. इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली भी शामिल थे.

अदालत आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक, डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ और उसके पत्रकार नितिन सेठी, तथा नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इन्फॉर्मेशन (एनसीपीआरआई) की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘इसमें कुछ संवेदनशीलता शामिल है. सवाल यह है कि प्रतिस्पर्धी अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.’

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने दलील दी कि संशोधन अत्यधिक व्यापक है और इससे कई मौलिक अधिकारों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है.

याचिकाओं में आरटीआई कानून की धारा 8(1)(j) में डीपीडीपी एक्ट की धारा 44(3) के जरिए किए गए संशोधन को चुनौती दी गई है. इसमें कहा गया है कि यह संशोधन ‘व्यक्तिगत सूचना के खुलासे के दायित्व पर एक व्यापक प्रतिबंध’ लगा देता है. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संशोधन से पहले, यदि बड़े जनहित का प्रश्न हो तो व्यक्तिगत जानकारी भी उजागर की जा सकती थी.

वेंकटेश नायक की याचिका में कहा गया है कि ‘सभी व्यक्तिगत सूचनाओं के खुलासे पर पूर्ण प्रतिबंध, और उसे बड़े जनहित के साथ संतुलित करने की वैधानिक व्यवस्था को खत्म कर देना, डीपीडीपी एक्ट की धारा 44(3) को कई आधारों पर असंवैधानिक बनाता है.’

एनसीपीआरआई की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि प्रतिस्पर्धी अधिकारों का मुद्दा 2019 में संविधान पीठ के फैसले (सीपीआईओ बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल) में पहले ही तय हो चुका है. उन्होंने कहा, ‘उस फैसले में अदालत ने स्पष्ट कहा था कि आरटीआई कानून की धारा 8(1)(j) निजता के अधिकार और सूचना के अधिकार के बीच उचित संतुलन स्थापित करती है, क्योंकि दोनों ही मौलिक अधिकार हैं.’

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उस फैसले में धारा 8(1)(j) पर सीधे तौर पर विचार नहीं किया गया था. उन्होंने कहा, ‘दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क होंगे. दोनों अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है. ‘व्यक्तिगत सूचना’ का अर्थ क्या है, जैसे कुछ प्रश्नों को स्पष्ट करना होगा.’

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यह मामला ‘जटिल, कुछ हद तक संवेदनशील और बेहद दिलचस्प’ है, क्योंकि यह दोनों पक्षों के मौलिक अधिकारों को छूता है और इसमें संतुलन की कवायद जरूरी हो सकती है.

एनसीपीआरआई की ओर से अंतरिम रोक की मांग पर अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल किसी तरह की स्थगन आदेश नहीं दिया जाएगा. मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘स्टे का सवाल ही नहीं उठता. हम मामले का शीघ्र निपटारा करेंगे.’

जब प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार संशोधन का हवाला देकर अब सूचनाएं देने से इनकार कर रही है, तो मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत अंतरिम आदेशों के जरिए संसद द्वारा किए गए विधायी प्रावधानों में दखल नहीं देगी, जब तक कि उसे यह पूरी तरह आवश्यक न लगे.