लोगों को हमारे फैसलों की आलोचना करने का अधिकार है: सुप्रीम कोर्ट

एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के एक पुराने संस्करण में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, खासकर झुग्गीवासियों से जुड़े एक निर्णय पर की गई टिप्पणी को लेकर आलोचना हुई थी. इसको लेकर चिंता जताते हुए दायर एक रिट याचिका को ख़ारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोगों को सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों पर अपनी राय रखने का अधिकार है.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (20 मार्च) को एक रिट याचिका को ख़ारिज कर दिया, जिसमें एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के एक पुराने संस्करण को लेकर चिंता जताई गई थी. इस पुस्तक में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों, खासकर झुग्गीवासियों से जुड़े एक फैसले पर की गई टिप्पणी को लेकर आलोचना हुई थी.

लाइव लॉ के मुताबिक, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कक्षा 8 की पुरानी सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में दिए गए इस कथन पर आपत्ति जताई गई थी कि ‘हाल के फैसले शहर में झुग्गीवासियों को अतिक्रमणकारी के रूप में देखने की प्रवृत्ति रखते हैं.’

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही स्वतः संज्ञान मामले में आदेश दिए जा चुके हैं. उन्होंने मौखिक रूप से यह भी कहा कि लोगों को सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों पर अपनी राय रखने का अधिकार है.

सीजेआई ने यह भी इंगित किया कि संबंधित पाठ्यपुस्तक में आलोचना के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए महत्वपूर्ण हस्तक्षेपों का भी उल्लेख किया गया है, जिससे एक संतुलित दृष्टिकोण सामने आता है.

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, यह याचिका पंकज पुष्कर द्वारा दायर की गई थी, जिसमें पुस्तक में दिए गए उस कथन की ओर ध्यान दिलाया गया था, जिसमें कहा गया था कि ‘हाल के फैसले शहर में झुग्गीवासियों को अतिक्रमणकारी के रूप में देखने की प्रवृत्ति रखते हैं.’

सीजेआई ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, ‘यह किसी फैसले के बारे में एक दृष्टिकोण है. यह स्वस्थ आलोचना है. न्यायपालिका को इसे लेकर अति संवेदनशील क्यों होना चाहिए?’

उन्होंने कहा कि पुस्तक में न्यायपालिका की संरचना, कार्यप्रणाली और उपलब्धियों का भी विस्तार से वर्णन किया गया है.

खंडपीठ ने कहा, ‘इसके बाद यह भी कहा गया है कि कुछ फैसले ऐसे हैं जिन्हें लोग आम नागरिकों के हितों के खिलाफ मानते हैं, यह एक दृष्टिकोण है. लोगों को हमारे फैसलों की आलोचना करने का अधिकार है.’

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने यह आशंका जताई कि इस अंश को पढ़कर झुग्गी में रहने वाला व्यक्ति न्यायपालिका के बारे में नकारात्मक धारणा बना सकता है.

इस पर सीजेआई ने कहा कि किसी फैसले के बारे में धारणा सही भी हो सकती है और गलत भी. वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘किसी अपर्याप्त जानकारी रखने वाले व्यक्ति द्वारा किसी फैसले से बनाई गई धारणा न्यायपालिका के लिए चिंता का विषय नहीं हो सकती.’

ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल में ही कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक की सभी भौतिक प्रतियों को जब्त करने और उसके डिजिटल संस्करणों को इंटरनेट से हटाने का आदेश दिया था, जिसमें ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से जुड़ा एक अध्याय शामिल था. साथ ही पुस्तक की छपाई और वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था. बाद में एनसीईआरटी ने इस अध्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय से माफ़ी मांगी थी.