सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बोले- अतीत में ईमानदारी से काम करने वाले जजों के बचाव में विफल रहा है कॉलेजियम

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि शीर्ष अदालत का कॉलेजियम अतीत में साहस और ईमानदारी के साथ काम करने वाले न्यायाधीशों का साथ देने में विफल रहा है. उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे उदाहरण न्यायाधीशों को करिअर में तरक्की पर नैतिकता को प्राथमिकता देने से हतोत्साहित कर सकते हैं.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस दीपांकर दत्ता ने शनिवार (21 मार्च) को एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि शीर्ष अदालत का कॉलेजियम अतीत में साहस और ईमानदारी के साथ काम करने वाले न्यायाधीशों का साथ देने में विफल रहा है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस दत्ता ने ‘न्यायिक शासन की पुनर्कल्पना’ विषय पर आयोजित सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए चेतावनी दी कि ऐसे उदाहरण न्यायाधीशों को करिअर में तरक्की पर नैतिकता को प्राथमिकता देने से हतोत्साहित कर सकते हैं.

उन्होंने कहा, ‘कई न्यायाधीशों ने व्यापक हित के लिए जोखिम उठाने का मानसिक साहस और दृढ़ विश्वास दिखाया है. लेकिन वर्तमान समय में कितने न्यायाधीश अपने करिअर की तरक्की से ऊपर नैतिकता को प्राथमिकता देंगे? क्या आप उनसे यह अपेक्षा करते हैं कि वे अपने कहे अनुसार व्यवहार करने का साहस दिखाएं? यह बात पचाना मुश्किल है.’

उन्होंने आगे बताया कि पहले भी ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जब कॉलेजियम द्वारा जजों की सच्चाई और ईमानदारी के लिए उनके साथ हुए उत्पीड़न से उन्हें बचाने का प्रयास नहीं किया गया.
उन्होंने कहा कि कॉलेजियम सदस्यों को अपने साथी न्यायाधीशों का बचाव करना चाहिए. जस्टिस दत्ता ने मंच पर उपस्थित कॉलेजियम सदस्य जस्टिस बीवी नागरत्ना से भी अपील की कि वे इस अवसर पर आगे आएं और ऐसे न्यायाधीशों के साथ खड़े होकर उन्हें उत्पीड़न से बचाएं.

उन्होंने कहा, ‘कॉलेजियम के सदस्य के रूप में मेरी आपसे अपील है कि आप इस अवसर पर आगे आएं और उन न्यायाधीशों का समर्थन करें जो आपके द्वारा उस विशेष व्याख्यान में कही गई बातों के अनुरूप कार्य करते हैं.’

जजों को सही निर्णय लेने में संकोच नहीं करना चाहिए: जस्टिस नागरत्ना

उल्लेखनीय है कि यहां जस्टिस दत्ता केरल उच्च न्यायालय में कृष्णमूर्ति अय्यर स्मृति व्याख्यान में जस्टिस नागरत्ना द्वारा दिए गए हालिया भाषण का जिक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि न्यायाधीशों को सही निर्णय लेने में संकोच नहीं करना चाहिए, भले ही इससे उनकी पदोन्नति रुक ​​जाए या सत्ता में बैठे लोग नाराज हो जाएं.

मालूम हो कि जस्टिस नागरत्ना ने इस महीने की शुरुआत में एक कार्यक्रम में कहा था, ‘जज के रूप में हमें हमेशा अपने पद की शपथ का पालन करना चाहिए, जो हमारा न्यायिक धर्म है, और अपने करिअर पर इसके परिणामों की परवाह किए बिना इसे निभाना चाहिए.’

शनिवार को जस्टिस दत्ता ने बीआर आंबेडकर का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि किसी भी संस्थागत ढांचे की प्रभावशीलता अंततः उसे संचालित करने वालों पर निर्भर करती है.

उन्होंने आगे कहा कि संविधान की सफलता उसके कार्यान्वयनकर्ताओं की ईमानदारी पर निर्भर करती है. उन्होंने कहा कि यही सिद्धांत कॉलेजियम पर भी लागू होता है और इसके परिणाम इसमें शामिल न्यायाधीशों की गुणवत्ता और उनके द्वारा लिए गए निर्णयों पर निर्भर करते हैं.

इस अवसर पर जस्टिस दत्ता और जस्टिस नागरत्ना दोनों ने अदालतों विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवकाश लेने को लेकर हाल ही में हुई आलोचनाओं का भी जवाब दिया.

‘न्यायाधीश अवकाश के दौरान काम करना बंद नहीं करते’

दोनों ने कहा कि लोगों के बीच यह भ्रम दूर किया जाना चाहिए कि न्यायाधीश अवकाश के दौरान काम करना बंद कर देते हैं.

इस संबंध में जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘न्यायाधीश सुबह से शाम तक मामलों की सुनवाई करते हैं. जब उन्हें छुट्टियां मिलती हैं, तो वे उनका उपयोग फैसले लिखने के लिए करते हैं, न कि इधर-उधर जाने के लिए लंबी अवधि की यात्रा भत्ता (एलटीसी) लेने के लिए.’

इसी संदर्भ में जस्टिस दत्ता ने कहा कि ऐसी आलोचनाएं वे लोग करते हैं जिन्हें न्यायाधीश के दैनिक जीवन का कोई अनुभव नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘हम राष्ट्र की सेवा के लिए हैं. लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि न्यायाधीशों पर इतना दबाव डाला जाए कि उनसे किसी प्रकार की चूक होने का खतरा बना रहे, जिसके परिणामस्वरूप अन्याय हो सकता है. कृपया न्यायाधीशों पर थोड़ी दया दिखाएं.’

अधिवक्ताओं के सरकारी पैनल में 50% वकील महिलाएं होनी चाहिए: सीजेआई सूर्यकांत

इसी बीच, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अधिवक्ताओं के सरकारी पैनल में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण की वकालत की और ‘कानूनी पेशे में लैंगिक समानता’ सुनिश्चित करने के व्यापक प्रयास के तहत महिला वकीलों, विशेष रूप से मातृत्व अवकाश के दौरान, सहायता के लिए एक समर्पित वित्तीय कोष बनाने का आह्वान किया.

बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि सरकार को मौजूदा 15 से 30 प्रतिशत के मानदंड से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना होगा कि पैनल में शामिल सभी अधिवक्ताओं में से कम से कम आधे महिला अधिवक्ता हों.
उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से वकालत के शुरुआती वर्षों में महिला वकीलों के लिए वित्तीय सहायता प्रणाली बनाने का भी आग्रह किया, जिसमें मातृत्व अवकाश के दौरान मानदेय आधारित सहायता शामिल हो.

उन्होंने कहा, ‘इन उपायों से महिलाओं को अवसर और स्थिरता दोनों प्राप्त होंगे.’

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे उपायों से यह सुनिश्चित होगा कि महिला वकील बार में प्रवेश स्तर के बाद भी विधि पेशे में अपनी भागीदारी बनाए रखें.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हितधारकों के लिए ऐसे उपाय लागू करना महत्वपूर्ण है ताकि ‘समानता की व्यापक संवैधानिक दृष्टि’ औपचारिक गारंटियों से आगे बढ़कर ‘वास्तविक जीवन’ में साकार हो सके.

‘राष्ट्रीय विधि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में 50% से अधिक छात्र महिलाएं हैं’

उन्होंने विधि पेशे में ‘प्रवेश स्तर पर उत्साहजनक रुझानों’ की ओर भी इशारा किया और बताया कि अब राष्ट्रीय विधि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में 50% से अधिक छात्र महिलाएं हैं और बार में नए प्रवेशकों में भी उनका एक महत्वपूर्ण अनुपात है.

उन्होंने कहा, ‘यह समाज में आए बदलाव को दर्शाता है. इससे पता चलता है कि परिवार और समाज अब महिलाओं, हमारी बेटियों को विधि पेशे में आने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं.’

हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा कि यह बात निर्विवाद है कि प्रवेश स्तर से आगे बढ़ने पर भागीदारी में भारी गिरावट आती है. उन्होंने कहा, ‘असली सवाल यह है कि क्या हम करिअर में प्रगति के साथ उस समानता को बनाए रख पाएंगे.’

मुख्य न्यायाधीश ने उन व्यवस्थागत बाधाओं की गहन जांच का आह्वान किया जो महिलाओं को पेशे से बाहर धकेलती हैं.

सीजेआई ने यह भी कहा कि महिला वकीलों के लिए सुरक्षित कार्य वातावरण बनाना अत्यंत आवश्यक है, विशेष रूप से अदालत के बाद चैंबर में देर तक काम करने के समय को देखते हुए.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस प्रकार के संस्थागत अवसर महिलाओं को बेहतर वातावरण और ‘विश्वसनीयता’ हासिल करने में मदद करेंगे.