विकसित भारत में असहमति और बहस के लिए ज़्यादा जगह होनी चाहिए: जस्टिस भुइयां

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने एक कार्यक्रम में कहा कि ‘न्यायपालिका के भीतर भी कई लोग ‘राजा से ज़्यादा वफ़ादार’ वाली मानसिकता से ग्रस्त हैं. इसके परिणामस्वरूप लोग बिना ज़मानत और बिना मुक़दमे के महीनों तक जेलों में पड़े रहते हैं.’

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जज, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को कहा कि असहमति जताने पर नागरिकों को जेल में डालना और दलितों के खिलाफ लगातार हो रहे अत्याचार ‘विकसित भारत का मॉडल’ नहीं हो सकते.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बेंगलुरु में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के एक कार्यक्रम में ‘विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिका’ पर बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘हालांकि सरकार का विकसित भारत या 2047 तक एक विकसित भारत बनाने का सपना सराहनीय और हासिल करने लायक है, लेकिन आर्थिक विकास नागरिकों की आज़ादी और गरिमा की कीमत पर नहीं हो सकता.’

उन्होंने कहा, ‘विकसित भारत में असहमति और बहस के लिए ज़्यादा जगह होनी चाहिए. असहमति को अपराध नहीं बनाया जा सकता.’

उन्होंने विरोध प्रदर्शनों, छात्र आंदोलनों और यहां तक कि सोशल मीडिया अभिव्यक्ति पर आपराधिक कानून लागू करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताई.

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य द्वारा ‘लापरवाही से’ आपराधिक मामलों के दर्ज होने का एक पैटर्न देखा गया है, अक्सर छोटी-मोटी बातों पर भी. सार्वजनिक प्रदर्शनों या ऑनलाइन सामग्री के लिए नियमित रूप से एफआईआर दर्ज की जाती हैं, जिससे लोग लंबी जांच और हिरासत में फंस जाते हैं.

जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘न्यायपालिका राज्य को ऐसे मामले दर्ज करने का निर्देश नहीं देती. सार्वजनिक प्रदर्शनों और आंदोलनों, यहां तक कि छात्रों के मामलों में, कभी-कभी मीम्स और सोशल मीडिया पोस्ट पर भी एफआईआर दर्ज कर दी जाती हैं, जांच चलती रहती है, और मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते हैं. फिर सुप्रीम कोर्ट को विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने पड़ते हैं.’

हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अदालतें हमेशा प्रभावी नियंत्रण नहीं बन पाईं. उन्होंने कहा, ‘न्यायपालिका के भीतर भी कई लोग ‘राजा से ज्यादा वफादार’ वाली मानसिकता से ग्रस्त हैं. इसके परिणामस्वरूप लोग बिना जमानत और बिना मुकदमे के महीनों तक जेलों में पड़े रहते हैं.’

जस्टिस भुइयां ने वीआर कृष्ण अय्यर के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया कि जिसमें कहा गया है कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद.’ उन्होंने कहा कि व्यवहार में यह सिद्धांत धीरे-धीरे कमजोर होता गया है और कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत कई मामले इसके उदाहरण हैं.

गृह मंत्रालय द्वारा संसद में पेश आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि यूएपीए के तहत गिरफ्तारी दर ऊंची है, जबकि दोषसिद्धि दर बहुत कम – 2019 से 2023 के बीच ‘1 से 6 प्रतिशत’ के बीच रही है.

उन्होंने कहा, ‘यह इस बात का संकेत है कि इस कानून का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल हो रहा है.’ और साथ ही यह भी जोड़ा कि जब बरी होने की संभावना बहुत ज़्यादा हो, तो पांच से छह साल तक जेल में रखना गंभीर संवैधानिक चिंताएं पैदा करता है.

दलितों के खिलाफ अत्याचार और जाति-आधारित भेदभाव के मुद्दे पर जस्टिस भुइयां ने कहा कि एक विकसित भारत में गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक ऊंच-नीच को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.

उन्होंने कहा, ‘विकसित भारत में हम यह नहीं देख सकते कि माता-पिता अपने बच्चों को दलितों द्वारा बनाया गया भोजन खाने से मना करें. हम यह भी नहीं देख सकते कि दलित पुरुषों को गलियारों में खड़ा कर उन पर पेशाब किया जाए. व्यक्ति की गरिमा की रक्षा होनी चाहिए.’

न्यायपालिका में लैंगिक विविधता पर
जस्टिस भुइयां ने उच्च न्यायपालिका में महिला न्यायाधीशों की कमी पर भी चिंता जताई और नियुक्तियों में लैंगिक विविधता के मुद्दे पर कॉलेजियम प्रणाली की गहन समीक्षा की मांग की. उन्होंने चेतावनी दी कि मौजूदा चयन प्रक्रिया में व्यक्तिपरकता (subjectivity) महिलाओं को संवैधानिक अदालतों से बाहर कर सकती है.

उन्होंने कहा कि कॉलेजियम को इस बात का जवाब देना चाहिए कि जब चयन पूरी तरह से योग्यता-आधारित मानदंडों से हटकर किए जाते हैं, तो महिलाओं की नियुक्ति कम क्यों होती है.

आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि निचली न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है, जहां भर्ती प्रक्रिया अधिक वस्तुनिष्ठ और परीक्षा-आधारित होती है.

उन्होंने कहा, ‘निचली न्यायपालिका में महिला न्यायिक अधिकारियों की संख्या 27 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक है, और तेलंगाना जैसे राज्यों में तो यह बढ़कर लगभग 60 प्रतिशत तक पहुंच गई है. हालांकि, उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर यह रुझान एकदम उलट जाता है, जहां नियुक्तियां कॉलेजियम के माध्यम से की जाती हैं.’

अंत में जस्टिस भुइयां ने कहा कि न्यायपालिका को न तो राज्य की ‘स्थायी आलोचक’ बनना चाहिए और न ही ‘प्रशंसक’, बल्कि उसे अपने मूल कर्तव्य – अधिकारों की रक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने – पर दृढ़ रहना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘न्यायपालिका को बस न्यायपालिका ही बने रहना चाहिए.’