गणतंत्र में आधी हिस्सेदारी केवल स्त्रीवादी आग्रह नहीं, लोकतांत्रिक तर्क की स्वाभाविक परिणति है. आधी दुनिया को एक-तिहाई पर रोक देना प्रतिनिधित्व का संशोधन है, न्याय नहीं. भाजपा सचमुच ‘नारी शक्ति वंदन’ की राजनीति करती है तो उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि वंदन का नैतिक अर्थ प्रतीक नहीं, साझेदारी है; और साझेदारी का अर्थ 33 नहीं, 50 है.

लोकसभा में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 गिर गया. यह बिल लोकसभा का आकार बढ़ाने, नए परिसीमन और महिलाओं के आरक्षण को 2029 चुनाव से लागू करने का रास्ता साफ करने वाला था. 528 सदस्यों ने मतदान किया; 298 पक्ष में थे, 230 विपक्ष में; लेकिन संवैधानिक संशोधन को दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है, जो 352 अंक दूर खड़ा रहा. ठंडा, निर्विकार, लगभग क्रूर.
पर जो गिरा, वह केवल एक विधेयक नहीं था; भारतीय लोकतंत्र की मेज़ पर रखा खंडित दर्पण था, जिसमें इच्छा, न्याय, रणनीति, स्त्री, सत्ता, संख्या, भय और भविष्य- सब बहुत धुंधले थे. इसीलिए यह पराजय रैपिड क्लाइमेक्स नहीं, यह लोकतंत्र के उस क्षण का नाम है, जब न्याय को स्थापत्य की कांपती दरारों से बांध दिया गया.
स्त्री को नागरिक तो माना, पर सत्ता का स्वाभाविक पात्र नहीं
इस विवाद की धुंध, धूल और संसदीय शोर के बीच एक प्रश्न है, जो किसी भी गंभीर लोकतंत्र का पीछा नहीं छोड़ता. प्रतिपक्षी दल वर्षों से कहते आए हैं कि जातिगत जनगणना के बाद ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी’ सुनिश्चित हो, तब इस तर्क का सबसे सीधा, सबसे उजला, सबसे नैतिक और सबसे कठिन दावेदार कौन है?
स्त्रियां. वे इस देश की आधी आबादी हैं. आधा मतदाता समुदाय भी. समाज की आधी स्मृति भी. लेकिन क्या वे केवल आधा श्रम करती हैं? क्या वे आधी देखभाल करती हैं? क्या वे आधा धैर्य धारण करती हैं? क्या वे आधी पीड़ा सहती हैं? क्या वे आधी आशा रखती हैं? नहीं. वे दोगुना श्रम, तिगुनी देखभाल, चौगुना धैर्य अपने भीतर किसी गहरे, नील, मौन सरोवर की तरह संजोए रहती हैं; पांच गुना अधिक घावों को अपनी मुस्कान की महीन तहों के नीचे छिपाए चलती हैं और आशा तो वे इस समाज से दस गुना रखती हैं. फिर 33 प्रतिशत ही क्यों? 50 प्रतिशत क्यों नहीं?
यदि भारतीय राजनीति प्रतिनिधित्व के न्याय की भाषा बोल रही है तो उसे अपने ही तर्क से डरना नहीं चाहिए. ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी’ का सबसे दीप्त, सबसे असहज, सबसे अवरोधक निष्कर्ष यही है कि महिलाओं के पक्ष में 50 प्रतिशत भागीदारी केवल मांग नहीं, तर्क का अपरिहार्य फल है.
यहां ठहरकर 33 प्रतिशत की ऐतिहासिकता को समझना होगा. यह लंबे समय से तत्काल न्याय नहीं, स्थगित वचन है. 33 प्रतिशत कोई सनातन न्याय-सिद्धांत नहीं, भारतीय राजनीति का एक ऐतिहासिक समझौता है. समझौते कभी-कभी इतिहास को आगे धकेलते हैं, पर उन्हें न्याय का अंतिम रूप मान लेना वैसा ही है जैसे संध्या की लालिमा को पूर्ण प्रभात समझ लिया जाए. वह सुंदर हो सकती है, पर वह सूर्योदय नहीं.
असल संकट यह है कि भारतीय लोकतंत्र ने स्त्री को लंबे समय तक नागरिक तो माना, पर सत्ता का स्वाभाविक पात्र नहीं. संसद और विधानसभाओं में उसका प्रवेश आज भी ऐसे देखा जाता है जैसे वह कोई ‘विशेष’ उपस्थिति हो. विरल, अपवादस्वरूप और लगभग प्रसादवत्-न कि सहज, नैसर्गिक और निर्विवाद अधिकार.
राजनीति की भाषा, चुनावी हिंसा, धन का असंतुलित प्रवाह, टिकट-वितरण की अपारदर्शी सुरंगें, दलीय नेटवर्क, पारिवारिक वंशवाद, चरित्र-हनन की संस्कृति, सार्वजनिक जीवन में स्त्री के प्रति संशय से भरी दृष्टि- ये सब मिलकर उस दीवार का निर्माण करते हैं, जिसे पुरुष राजनीति बड़ी बेफ़िक्री से ‘प्रतिस्पर्धा’ कहती है.
यह प्रतिस्पर्धा वैसी ही निष्पक्ष है जैसे ऊंचे किले की प्राचीर पर खड़े लोग नीचे धूल में खड़े लोगों से कहें-दौड़ो, छलांग लगाओ, ऊपर आ जाओ, हम तो केवल योग्यता देखते हैं.
इसलिए जब कोई कहता है कि योग्य महिलाएं बिना आरक्षण भी जीत सकती हैं तो वह योग्यता की नहीं, विशेषाधिकार की रक्षा कर रहा होता है. लोकतंत्र में मेरिट का अर्थ यह नहीं कि जो पहले से दरवाज़े के भीतर हैं, वही बार-बार योग्य घोषित होते रहें. लोकतंत्र में मेरिट का पहला नाम है-बराबर प्रवेश. और बराबर प्रवेश के बिना योग्यता का हर मंत्र अंततः विशेषाधिकार की ही कोई सुसंस्कृत प्रार्थना बन जाता है.
इसीलिए महिला आरक्षण को दया, प्रतीकवाद या सदाशय उदारता की तरह देखना बौद्धिक दुष्टता है. प्रतिनिधित्व केवल संख्या नहीं; वह अनुभव का संस्थानीकरण है, जीवन की उन गंधों, थकानों, भयों, उम्मीदों और अदृश्य परिश्रमों को कानून की भाषा में, नीति की संरचना में, सार्वजनिक प्राथमिकताओं की सूची में जगह देना है, जिन्हें सदियों तक निजी मानकर किनारे कर दिया गया.
आधी हिस्सेदारी केवल स्त्रीवादी आग्रह नहीं, लोकतांत्रिक तर्क की परिणति है
जो समाज अपनी विधायिकाओं में स्त्री-अनुभव को अनुपस्थित रखता है, वह कानूनों में भी जीवन के उन हिस्सों को अधूरा पढ़ता है, जिन्हें स्त्रियां रोज़ अपने कंधों, अपनी देह, अपनी नींद, अपनी स्मृति और अपने मौन में ढोती हैं- देखभाल, पोषण, जल, शिक्षा, स्वास्थ्य, यात्रा की सुरक्षा, घरेलू हिंसा, लैंगिक उत्पीड़न, वेतन-असमानता, संपत्ति तक पहुंच और वह अवैतनिक श्रम जिसकी बदौलत घर, बाज़ार, परिवार, जाति, परंपरा और अंततः यह पूरा समाज रोज़ सुबह फिर से चल पड़ता है.
गणतंत्र में आधी हिस्सेदारी केवल स्त्रीवादी आग्रह नहीं, लोकतांत्रिक तर्क की स्वाभाविक परिणति है. आधी दुनिया को एक-तिहाई पर रोक देना प्रतिनिधित्व का संशोधन है, न्याय नहीं. भाजपा सचमुच ‘नारी शक्ति वंदन’ की राजनीति करती है तो उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि वंदन का नैतिक अर्थ प्रतीक नहीं, साझेदारी है; और साझेदारी का अर्थ 33 नहीं, 50 है.
पार्टी की सबल महिलाओं को दरकिनार कर देना कौन-सा वंदन है? स्त्री को पूजना और स्त्री को सत्ता देना-ये दोनों एक बात नहीं हैं. भारतीय राजनीति ने सदियों तक स्त्री का सांस्कृतिक महिमामंडन किया है और राजनीतिक हाशियाकरण भी. उसने उसे देवी कहा, पर निर्णायक मेज़ पर जगह नहीं दी. उसने उसके त्याग की गाथाएं गाईं, जो हिस्सेदारी के बिंदु पर अचानक हिसाब-किताब में कृशकाय हो उठीं. जो व्यवस्था स्त्री से त्याग का शतक मांगे और सत्ता में उसे तिहाई दे, वह सम्मान नहीं करती; वह अनुपातित अन्याय करती है.
पर ठीक यहीं सरकार की राजनीतिक कल्पना की सीमा भी खुलती है. महिलाओं के न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व को किसी अन्य शक्ति-पुनर्गठन परियोजना से बांध देना वस्तुतः महिलाओं के प्रश्न को बंधक बनाना है. सरकार सचमुच नारी-प्रतिनिधित्व को ऐतिहासिक प्राथमिकता मानती तो वह पहले से मौजूद 543 सीटों के भीतर या एक स्पष्ट, सर्वसम्मत, संघीय-संतुलित फ़ॉर्मूले के साथ या दलीय टिकट-कोटा जैसी बाध्यकारी व्यवस्थाओं के माध्यम से इस दिशा में बढ़ती.
किसी आपत्ति का यह अर्थ नहीं कि महिलाएं प्रतीक्षा करें; इसका अर्थ केवल यह है कि राज्य उनके अधिकार को किसी दूसरी राजनीति की शर्त न बनाए. स्त्री का न्याय इतना कोमल नहीं कि वह हर गठजोड़ के साथ बांध दिया जाए, न इतना दुर्बल कि वह किसी और शक्ति-गणित की छाया में ही अस्तित्व पाए. न्याय को सचमुच न्याय रहना है तो उसे अपनी ही रोशनी में खड़ा होना होगा.
जाति के संदर्भ में ‘अनुपात’ की मांग
फिर एक प्रश्न और है, जिसे भारतीय लोकतंत्र ने बड़ी सुविधा से टाल रखा है. जब प्रतिनिधित्व की भाषा जाति के संदर्भ में ‘अनुपात’ की मांग करती है तो क्या महिलाओं के भीतर की सामाजिक विषमताएं अदृश्य हो जानी चाहिए? स्त्री कोई एकरंगी, समतल, एकरस श्रेणी नहीं है. वह दलित भी है, आदिवासी भी, पिछड़ी भी, अल्पसंख्यक भी, गरीब भी, ग्रामीण भी, शहरी श्रमिक भी, शिक्षित मध्यवर्गीय भी और उन सबके बीच लगातार फंसी हुई वह भी, जिसकी आवाज़ परिवार, जाति, धर्म और बाज़ार सब मिलकर कमज़ोर कर देते हैं. इसलिए उस आधे हिस्से के भीतर भारत की सामाजिक विविधता का न्यायपूर्ण प्रतिबिंब भी उपस्थित हो.
भारतीय गणतंत्र में स्त्री को वर्टिकली भी आधी हिस्सेदारी मिले और हॉरिजेंटली भी. यही वह बिंदु है, जहां महिला आरक्षण और जातिगत जनगणना का विमर्श एक-दूसरे से भिड़ते नहीं, अपितु एक दूसरे को अधिक सत्य, अधिक सटीक, अधिक लोकतांत्रिक बनाते हैं.
राज्यसभा और विधान परिषदों का प्रश्न तो और भी अधिक विचित्र, और किसी अर्थ में अधिक उजागर करने वाला है. यदि ये सदन पुनर्विचार, गहराई, संस्थागत विवेक, विशेषज्ञता और संघीय संतुलन के लिए हैं तो उनमें पुरुष-प्रधानता और भी अधिक असंगत, अधिक बनावटी, अधिक अशोभनीय प्रतीत होती है. 2023 के विधायी ढांचे में भी इनके लिए कोई सीधा प्रावधान नहीं था, जबकि पहले की संसदीय सिफ़ारिशें वहां प्रतिनिधित्व की रूपरेखा बनाने की आवश्यकता स्वीकार कर चुकी थीं.
आज जब महिलाओं की हिस्सेदारी लोकसभा में 14 प्रतिशत, राज्यसभा में 17 प्रतिशत और राज्य विधानसभाओं में 10 प्रतिशत के आसपास है, तब ऊपरी सदनों को ‘स्वाभाविक’ रूप से पुरुष-विशेषाधिकार का अभयारण्य बने रहने देना लोकतांत्रिक छल है. इन सदनों के लिए या तो संवैधानिक आरक्षण या दलों पर बाध्यकारी टिकट-कोटा या नामांकन तथा अप्रत्यक्ष चुनाव की प्रक्रिया में वैधानिक लैंगिक संतुलन-कुछ न कुछ अनिवार्य उपाय करने ही होंगे. वरना पुनर्विचार के नाम पर पुराने विशेषाधिकारों की अधिक परिष्कृत पुनरावृत्ति होगी.
कुछ लोग कहेंगे कि 50 प्रतिशत की मांग अतिवादी है. नहीं- यह पहली बार अनुपात और लोकतंत्र को एक ही वाक्य में ईमानदारी से रखने का साहस है. अतिवाद तो यह है कि महिलाएं समाज का कई गुना भार उठाएं, पर सत्ता का एक-तिहाई हिस्सा पाने पर भी कृतज्ञता दिखाएं. कुछ लोग फिर ‘प्रॉक्सी महिलाओं’ का तर्क देंगे. यह तर्क स्थानीय निकायों के अनुभव के सामने बार-बार फीका पड़ा है; स्वयं संसदीय विश्लेषणों ने यह संकेत किया है कि महिलाओं के आरक्षण को लेकर जो भय फैलाए गए थे, वे निर्णायक रूप से वैसे सिद्ध नहीं हुए, जैसे अक्सर दावा किया जाता था.
और यदि कहीं प्रॉक्सी की संभावना है भी तो उसका उपचार आरक्षण को नकारना नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, वित्तीय समर्थन, सुरक्षा, दलीय लोकतंत्रीकरण, राजनीतिक संसाधनों तक पहुंच और संस्थागत संरक्षण की गहरी संरचनाएं निर्मित करना है.
भारतीय राजनीति को अब यह निर्णय करना होगा कि वह स्त्री को क्या समझती है- सभा में ताली बजाने वाली नैतिक उपस्थिति या निर्णय की मेज़ पर बैठी हुई समान भागीदार? यदि उत्तर दूसरा है तो 33 प्रतिशत पर ठहरना कठिन है.
33 प्रतिशत इतिहास की एक सीढ़ी हो सकती है; मंज़िल नहीं. मंज़िल वह है, जहां कोई दल ‘नारी शक्ति वंदन’ कहे और देश उससे पूछे-वंदन या बराबरी? सम्मान या हिस्सेदारी? और वह दल बिना हिचके कहे-बराबरी, हिस्सेदारी और आधा गणराज्य. स्त्री के प्रति न्याय का सबसे सटीक वाक्य यही रहेगा: आधी आबादी को तिहाई नहीं, न्यूनतम आधा हिस्सा चाहिए.
क्योंकि लोकतंत्र में स्त्री को कम देना केवल स्त्री के साथ अन्याय नहीं; वह गणराज्य को उसकी ही आधी आत्मा से वंचित करना है. और जो गणराज्य अपनी आधी आत्मा को दरवाज़े पर रोक देता है, वह चाहे जितने ध्वज फहराए, भीतर से अभी पूरा स्वतंत्र नहीं, बेड़ियों से जकड़ा हुआ है.