15 साल के शासन के अंत की दहलीज पर ममता सरकार, जानिए भाजपा की ऐतिहासिक बढ़त की वजहें

तृणमूल के लिए सबसे बड़ा झटका बड़े पैमाने पर हुए ध्रुवीकरण को माना जा रहा है. शुरुआती आकलनों के अनुसार हिंदू वोटों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में गया है. इस एकजुटता ने राज्य की पारंपरिक जातीय और क्षेत्रीय राजनीति को पीछे छोड़ दिया है.

नई दिल्ली: हालिया भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे बड़े उलटफेरों में गिनी जा सकने वाली तस्वीर पश्चिम बंगाल से उभरती दिख रही है. भारतीय जनता पार्टी राज्य में अगली सरकार बनाने की ओर मजबूती से बढ़ती नजर आ रही है, जबकि इसके साथ ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के 15 साल लंबे शासन का अंत होता दिखाई दे रहा है. सुबह 11 बजे के बाद जैसे-जैसे मतगणना आगे बढ़ी, शुरुआती रुझान एक स्पष्ट भगवा लहर में बदलते दिखे, जिसने उन राजनीतिक गढ़ों को भी हिला दिया जिन्हें अब तक अभेद्य माना जाता था.

तृणमूल कांग्रेस की गिरावट सबसे साफ तौर पर उसके पारंपरिक मजबूत इलाकों में दिखाई दे रही है. शुरुआती चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक भाजपा ने पश्चिम बंगाल के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में उल्लेखनीय बढ़त बनाई है. बीरभूम, पूर्व बर्दवान, हुगली और आदिवासी बहुल जंगलमहल जैसे जिले, जो कभी तृणमूल के अटूट जनाधार माने जाते थे, वहां भाजपा लगातार बढ़त दर्ज करती दिख रही है. यह बदलाव राज्य की जमीनी राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत माने जा रहे हैं.

उभरते मतदान रुझानों का सूक्ष्म विश्लेषण बताता है कि राज्य में सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव आया है. पिछले एक दशक से अधिक समय तक तृणमूल कांग्रेस की चुनावी ताकत दो प्रमुख आधारों पर टिकी रही- महिला मतदाताओं का भारी समर्थन और मुस्लिम वोटों का व्यापक एकजुट आधार. मौजूदा रुझान बताते हैं कि दोनों स्तंभ कमजोर पड़े हैं.

तृणमूल के लिए सबसे बड़ा झटका बड़े पैमाने पर हुए ध्रुवीकरण को माना जा रहा है. शुरुआती आकलनों के अनुसार हिंदू वोटों का बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में गया है. इस एकजुटता ने राज्य की पारंपरिक जातीय और क्षेत्रीय राजनीति को पीछे छोड़ दिया है.

दूसरी ओर, मुस्लिम वोट, जिस पर तृणमूल करीबी मुकाबलों में भरोसा करती रही है, बंटा हुआ नजर आ रहा है. पार्टी नेतृत्व को अल्पसंख्यक मतदाताओं के बड़े पैमाने पर एकतरफा समर्थन की उम्मीद थी, लेकिन शुरुआती संकेत वैसा नहीं दिखा रहे. इसका असर उन सीटों पर खास तौर से पड़ा है जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है.

सत्ता पक्ष के लिए एक और बड़ा संकेत यह है कि कल्याणकारी योजनाओं पर आधारित आक्रामक चुनावी रणनीति भी अपेक्षित लाभ देती नहीं दिख रही. चुनाव से पहले राज्य सरकार ने प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण योजनाओं पर खास जोर दिया था. महिला मतदाताओं को साधने के लिए लक्ष्मी भंडार योजना की राशि में 500 रुपये की बढ़ोतरी की गई. वहीं युवाओं को आकर्षित करने के लिए 1,500 रुपये मासिक युवा साथी भत्ता योजना लाई गई.

लेकिन शुरुआती रुझान बताते हैं कि महिलाओं और युवाओं से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला. जो महिला वोटर लंबे समय तक ममता बनर्जी की सबसे भरोसेमंद ताकत मानी जाती थीं, उनमें भी बदलाव के संकेत दिख रहे हैं. स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप, सत्ता विरोधी भावना और बदलाव की इच्छा नकद सहायता योजनाओं पर भारी पड़ती दिख रही है. युवाओं के बीच बेरोजगारी और बदलाव की राजनीति ने असर डाला है.

कोलकाता में दिन चढ़ने के साथ तृणमूल मुख्यालय कालीघाट में सन्नाटा बताया जा रहा है, जबकि भाजपा के राज्य मुख्यालय में जश्न का माहौल है. अगर यही रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदलने वाला क्षण माना जाएगा. भाजपा ने हिंदू वोटों के बड़े ध्रुवीकरण और विपक्षी मतों के बिखराव का लाभ उठाते हुए पूर्वी भारत की सबसे कठिन राजनीतिक जमीन पर निर्णायक बढ़त बना ली है.