दतिया उपचुनाव: भाजपा-कांग्रेस ने बनाई डबल मॉनिटरिंग रणनीति

दतिया विधानसभा उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए संगठनात्मक ताकत, नेतृत्व की पकड़ और नेताओं की वफादारी की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है। नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही दोनों दलों ने अगले 18 दिनों की चुनावी लड़ाई के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। चुनाव प्रचार के साथ-साथ इस बार एक और समानांतर रणनीति पर काम होगा-अपने ही नेताओं पर नजर रखने की। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा और कांग्रेस दोनों ने ऐसे नेताओं की पहचान कर ली है, जिन पर भितरघात या निष्क्रियता का संदेह है। यही कारण है कि चुनाव प्रचार के साथ-साथ विशेष पर्यवेक्षक और संगठनात्मक टीमें भी पूरे चुनाव के दौरान सक्रिय रहेंगी।
भाजपा नेतृत्व दतिया उपचुनाव को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। पार्टी सूत्रों के अनुसार, दिल्ली से विशेष टीम चुनाव की पूरी मॉनिटरिंग करेगी और हर दिन की रिपोर्ट सीधे केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचेगी। यदि किसी स्तर पर असंतोष, गुटबाजी या भितरघात की आशंका दिखी तो तत्काल डैमेज कंट्रोल किया जाएगा। भोपाल से भी चुनाव प्रबंधन में अनुभवी नेताओं की टीम दतिया में डेरा डालेगी, जो बूथ स्तर तक रणनीति पर काम करेगी। दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए नामांकन के अंतिम दिन कुल 28 उम्मीदवारों ने 32 नाम निर्देशन पत्र दाखिल किए। भाजपा प्रत्याशी ने 2 नामांकन पत्र, कांग्रेस प्रत्याशी ने 3 नामांकन पत्र दाखिल किए। अब 14 जुलाई को नामांकन पत्रों की जांच होगी, जबकि 16 जुलाई नाम वापसी की अंतिम तिथि है।
सामाजिक समीकरण साधने की तैयारी
भाजपा ने विभिन्न सामाजिक वर्गों में प्रभाव रखने वाले नेताओं को भी प्रचार में उतारने का फैसला किया है। इनमें पूर्व मंत्री लाल सिंह आर्य, उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ और मंत्री नारायण सिंह कुशवाहा जैसे नेता लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहेंगे, ताकि पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक में किसी तरह की सेंध न लगे। हालांकि पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने पार्टी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के समर्थन में पूरी ताकत लगाने का भरोसा दिया है, लेकिन संगठन को आशंका है कि कुछ स्थानीय नेता चुनावी समीकरण प्रभावित करने का प्रयास कर सकते हैं। इसी कारण केंद्रीय स्तर पर निगरानी बढ़ाई गई है। भाजपा ने उपचुनाव के लिए 22 सदस्यीय स्टार प्रचारकों की सूची जारी कर दी है। प्रमुख नाम हैं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, वीरेन्द्र कुमार खटीक, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल,डॉ. नरोत्तम मिश्रा, कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल,राकेश सिंह, उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और राजेन्द्र शुक्ल आदि।
सिंधिया की नई भूमिका
उपचुनाव के प्रभारी बनाए गए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रत्याशी के नामांकन के दौरान मौजूद नहीं रहे। पार्टी सूत्रों के अनुसार, उन्हें डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद पैदा हुए असंतोष को शांत करने और पूरे चुनाव अभियान की रणनीतिक निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। साथ ही कांग्रेस द्वारा दतिया राजघराने से जुड़े घनश्याम सिंह को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद भाजपा सिंधिया के प्रभाव का भी चुनाव में पूरा उपयोग करना चाहती है।
कांग्रेस में नामांकन के साथ खुली अंदरूनी कलह
कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह के नामांकन के दिन ही पार्टी की अंदरूनी खींचतान सार्वजनिक हो गई। टिकट के सबसे मजबूत दावेदार रहे अवधेश नायक नामांकन से लेकर जनसभा तक कहीं दिखाई नहीं दिए। यही नहीं, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को मंच से सार्वजनिक रूप से अवधेश नायक से माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने कहा कि 2023 विधानसभा चुनाव में उन्होंने स्वयं नायक की टिकट का विरोध किया था, क्योंकि उस समय उनके भाजपा से पुराने संबंधों को लेकर आशंकाएं थीं। दिग्विजय ने यह भी स्वीकार किया कि यदि उनके व्यवहार से नायक का अपमान हुआ हो तो वह क्षमा चाहते हैं।
अवधेश नायक की नाराजगी बनी कांग्रेस की चिंता
दिग्विजय सिंह की माफी के बावजूद अवधेश नायक कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। इससे कांग्रेस के भीतर उनकी नाराजगी और गहरी मानी जा रही है। मीडिया से बातचीत में नायक ने साफ कहा कि उन्हें विधानसभा चुनाव में टिकट देने का भरोसा दिया गया था। इस बार भी पुराने राजनीतिक संबंधों के आधार पर उन पर संदेह किया गया। उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी से शिकायत नहीं, बल्कि प्रदेश नेतृत्व से नाराजगी है। मेरे सामने सभी विकल्प खुले हैं। उनके इस बयान ने भाजपा में वापसी की चर्चाओं को और हवा दे दी है। कांग्रेस ने दतिया उपचुनाव के लिए जारी स्टार प्रचारकों की सूची में भी अवधेश नायक को शामिल नहीं किया। सूची में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी, उमंग सिंघार, हरीश चौधरी राजेंद्र भारती, राधेलाल बघेल और महेंद्र बौद्ध सहित कई वरिष्ठ नेताओं को जगह मिली, लेकिन नायक का नाम नहीं होने से उनकी नाराजगी और चर्चा का विषय बन गई।
अब चुनाव नहीं, संगठन की परीक्षा
दतिया उपचुनाव का परिणाम केवल विधायक तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि किस दल में संगठन कितना मजबूत है, कौन नेता पार्टी के प्रति कितना वफादार है और किसकी राजनीतिक पकड़ वास्तव में कायम है। भाजपा जहां भितरघात रोकने के लिए हाईटेक मॉनिटरिंग पर भरोसा कर रही है, वहीं कांग्रेस को अपने ही नेताओं की नाराजगी और एकजुटता की चुनौती से जूझना पड़ रहा है। अगले 18 दिन दतिया की राजनीति के साथ-साथ प्रदेश की दोनों प्रमुख पार्टियों के संगठनात्मक भविष्य की भी दिशा तय करेंगे।