चिर प्रतिद्वंदी नेताओं के बीच सियासी मुकाबलों पर प्रदेश की नजर

प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनावों में इस बार भाजपा व कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबले के बीच सभी की निगाह कुछ खास विधानसभा सीटों पर लगी हुई है। यह वे सीटें हैं जहां पर भाजपा व कांग्रेस के प्रत्याशियों के बीच बीते कई सालों से व्यक्तिगत जंग चलती रही है। इसी जंग की वजह से यह नेता और उनके इलाके चर्चा मे रहे। यही नहीं इस बार दोनों ही दलों ने इन प्रतिद्वंदियों को मैदान में उतार कर उनके बीच चल रही अदावत का हिसाब-किताब चुकता करने का मौका दिया है। इस तरह की सीटों की संख्या करीब दस है। खस बात तो यह है कि इनमें से कई नेताओं के बीच तो व्यक्तिगत रंजिश का लंबा इतिहास है। ऐसे में इन नेताओं के बीच सियासी जीत-हार से ज्यादा महत्वपूर्ण वर्चस्व की जंग को माना जा रहा है।


होशंगाबाद : सीतासरन शर्मा-सरताज सिंह…
विधानसभा अध्यक्ष सीतासरन शर्मा भाजपा और सरताज सिंह कांग्रेस प्रत्याशी हैं। सरताज कुछ दिनों पहले तक भाजपा में थे। वे मंत्री भी रहे हैं। उन्हें प्रदेश के कुछ नेताओं की नापंसद के चलते इस बार भाजपा ने टिकट नहीं दिया तो कांग्रेस का दामन थाम कर मैदान में हैं। वे विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ ताल ठोंक रहे हैं। सांसद रहते हुए सरताज का क्षेत्र में बड़ा कद था। श्री सिंह से पहले मंत्री पद छीना गया था। विधानसभा अध्यक्ष बनते ही शर्मा का आभामंडल बढ़ा तो सरताज का प्रभाव कम हुआ। अब दोनों के बीच कड़ा मुकाबला बना हुआ है।
विजयराघौगढ़ : संजय पाठक-पद्मा शुक्ला
यहां दोनों दलों के प्रत्याशी इस बार दल बदलकर आमने-सामने हैं। संजय पाठक भाजपा और पद्मा शुक्ला कांग्रेस से प्रत्याशी हैं। 2013 में संजय कांग्रेस और पद्मा भाजपा प्रत्याशी थीं। संजय ने कांग्रेस विधायक रहते हुए भाजपा का दामन थामा और उपचुनाव जीते, फिर राज्यमंत्री बने। पद्मा शुरू से संजय के खिलाफ हैं। संजय के भाजपा में आने से घुर विरोधी एक ही पार्टी में हो गए थे, लेकिन विवाद शांत नहीं हुआ। इसके बाद पद्मा कांग्रेस में शामिल हो गईं।
रीवा : राजेंद्र शुक्ल-अभय मिश्रा
राजेंद्र शुक्ल भाजपा और अभय मिश्रा कांग्रेस से प्रत्याशी हैं। मिश्रा पहले भाजपा में थे, लेकिन उनकी शुक्ल से कभी पटरी नहीं बैठी। वे अभी जिला पंचायत अध्यक्ष हैं। भाजपा ने 2013 के चुनाव में मिश्रा की टिकट काटकर उनकी पत्नी नीलम को उ मीदवार बनाया था। वे विधायक बनीं, लेकिन राजेंद्र शुक्ल और अभय मिश्रा का विवाद खत्म नहीं हुआ। मिश्रा ने आखिरकार भाजपा को छोडक़र कांग्रेस का दामन थाम लिया।
गोहद : लालसिंह आर्य-रणवीर जाटव
भाजपा प्रत्याशी लालसिंह आर्य और कांग्रेस प्रत्याशी रणवीर जाटव का विवाद जगजाहिर है। रणवीर के पिता तत्कालीन विधायक माखन जाटव की हत्या के मामले में लालसिंह भी आरोपी बने। लालसिंह आर्य और माखन लाल जाटव में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी। माखन की हत्या के बाद यह दुश्मनी में बदल गई। अब लालसिंह और रणवीर चुनावी रण में एक-दूसरे को चुनौती दे रहे हैं।
अटेर : अरविंद भदौरिया-हेमंत कटारे
अरविंद भदौरिया भाजपा और हेमंत कटारे कांग्रेस प्रत्याशी हैं। हेमंत के पिता सत्यदेव के निधन के बाद इनका विवाद खुलकर सामने आ गया। उपचुनाव में हेमंत विधायक बने और एक छात्रा के यौन शोषण के मामले में विवाद में आए। इसे लेकर आरोप-प्रत्यारोप चले और पीडि़ता ने पोल खोली कि ये सब करने के लिए अरविंद ने उकसाया था। क्षेत्र के धुर विरोध ये नेता अब चुनाव मैदान में आमने-सामने हैं।
लहार : रसाल सिंह-गोविंद सिंह
रसाल सिंह भाजपा और गोविंद सिंह कांग्रेस प्रत्याशी हैं। क्षेत्र में दोनों नेताओं में वर्चस्व की लड़ाई है। रसाल पहले रोन सीट से चुनाव लड़ते रहे हैं। 2008 में परसीमन के बाद ये सीट समाप्त हो गई तो रसाल को गोविंद के मुकाबले में उतरना पड़ा। बीते दो चुनाव से गोविंद का पलड़ा भारी है। इस बार फिर दोनों आमने-सामने हैं।
चुरहट : शर्देन्दू तिवारी-अजय सिंह
शर्देन्दू तिवारी भाजपा और अजय सिंह कांग्रेस प्रत्याशी हैं। ये दोनों 2013 में भी आमने-सामने थे। तिवारी के राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में ये तीसरी पीढ़ी से हैं। दरअसल, शर्देन्दू के बाबा चंद्रप्रताप तिवारी ने चुरहट से अजय सिंह के पिता पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को हराया था। चंद्रप्रताप तब सोशलिस्ट पार्टी में थे। बाद में अर्जुन सिंह सीट बदलकर जीते और कांग्रेस में शामिल हो गए। इससे क्षुब्ध चंद्रप्रताप भी कांग्रेस में आ गए, लेकिन सिंह के मुकाबले वे पिछड़ गए। तब से दोनों परिवारों के बीच राजनीतिक अदावत है। हालांकि, दूसरी पीढ़ी से तिवारी परिवार से कोई राजनीति में नहीं आया था।
नरेला : सारंग-महेंद्र
विश्वास सारंग भाजपा और महेंद्र सिंह चौहान कांग्रेस प्रत्याशी हैं। इनके बीच विधानसभा क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई है। एक-दूसरे के खिलाफ शिकवे शिकायतें आम बात है। शह-मात का खेल भी चलता रहा है। चुनाव आयोग फर्जी मतदाताओं के नामों पर इनके विवाद सामने आए। अब दोनों एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं।
मनावर : बघेल-अलावा
रंजना बघेल भाजपा और हीरा अलावा कांग्रेस प्रत्याशी हैं। जयस की अगुवाई कर रहे अलावा ने रंजना के खिलाफ भी मोर्चा खोला है। भाजपा ने जयस को अपने खेमे में लाने की कोशिश की तो रंजना ने इसका विरोध किया। कांग्रेस ने अलावा को अपने खेमे में शामिल कर लिया।
दतिया : नरोत्तम मिश्रा बनाम राजेंद्र भारती
नरोत्तम मिश्रा भाजपा और राजेंद्र भारती कांग्रेस प्रत्याशी हैं। भारती और मिश्रा के बीच विवाद पुराना है। भारती ने 2008 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम पर पेड न्यूज के जरिए चुनाव जीतने का आरोप लगाया। यह मामला चुनाव आयोग, हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीमकोर्ट तक गया। इनका विवाद थमा नहीं है।