सत्ता के रास्ते के दरवाजे में… बागी बन रहे मुसीबत

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब महज छह माह का


समय ही रह गया है। ऐसे में कांग्रेस व भाजपा का पूरा फोकस प्रदेश के निमाड़ अंचल पर है। यह वो अंचल है जिसे प्रदेश की सत्ता का प्रवेश द्वार कहा जाता है। इस अंचल में विधानसभा की 23 सीटें आती हैं। अंचल के तहत आने वाले खंडवा, खरगोन, धार, बड़वानी और बुरहापुर जिलों में फैले पूर्वी व पश्चिमी निमाड़ के इन विधानसभा सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बागी मुसीबत बनते रहे हैं। वैसे यहां की 15 या इससे ज्यादा सीटें जिस राजनीतिक दल के पास जाती रहीं वही मध्य प्रदेश की सत्ता में पहुंचने की स्थिति के करीब पहुंच जाता है। प्रदेश का निमाड़ विंध्य-सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला से दो तरफ से घिरे और बीच में नर्मदा नदी वाला क्षेत्र है, जिसका पौराणिक सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास है इसी अंचल में महेश्वर, मांधाता व ओंकारेश्वर जैसे इलाके आते हैं। महेश्वर की पहचान प्राचीन समय में महिष्मती के रूप में होती थी और कालिदास ने भी नर्मदा व महेश्वर का वर्णन किया है। वर्तमान में निमाड़ में मध्य प्रदेश के खंडवा, खरगोन, बुरहानपुर, बड़वानी व धार जिले आते हैं। इन जिलों में प्रदेश की 23 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां का अधिकांश क्षेत्र आदिवासी जनजातियों वाला है, जिनमें गौंड, बैगा, कोरकू, भिलाला, भील, शबर जनजातियां प्रमुख रुप से शामिल हैं। यही वजह है विधानसभा की 23 सीटों में से 14 सीटों पर इन जनजातीय समाज के प्रतिनिधि ही विधायक निर्वाचित होते हैं।
निमाड़ की 23 सीटों में से कांग्रेस ने आम चुनाव में 16 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, लेकिन जिन 22 विधायकों ने दलबदल कर सरकार को गिराने में महत्वपूर्ण रोल निभाया था, उनमें से तीन इसी अंचल से आते हैं। इस अंचल में बागियों की वजह से भी भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही नुकसान झेलना पड़ा है। बड़वानी सीट पर जहां रमेश पटेल के खिलाफ राजन मंडलोई उतरे तो कांग्रेस को तीसरे स्थान पर रहना पड़ गया था, तो खंडवा में भाजपा के बागी कौशल मेहरा की वजह से देवेंद्र वर्मा की बढ़त 26492 कम हो गई थी। इसी तरह पंधाना सीट पर कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी छाया मोरे को बागी रूपानी नंदू बारे की वजह से हारने पर मजबूर होना पड़ा था। इसकी वजह थी रुपानी को मिलने वाले 25456 मत । बुरहानपुर में कांग्रेस उम्मीदवार रवींद्र महाजन को कांग्रेस से जुड़े परिवार के ही सुरेंद्र सिंह शेरा के मैदान में उतर जाने से जमानत तक गंवाना पड़ गई थी और शेरा निर्दलीय जीत गए थे। भगवानपुरा सीट से कांग्रेस अधिकृत प्रत्याशी विजय सिंह सोलंकी के खिलाफ बागी हुए केदार भाई डाबर निर्दलीय ही जीतकर विधायक बन गए। हालांकि बाद में विजय सिंह सोलंकी ने भाजपा की सदस्यता ले ली। वहीं, भाजपा को भी इन बागियों की वजह से महेश्वर सीट पर तीसरे स्थान पर खिसकना पड़ा था, जिसमें बागी राजकुमार मेव भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी से 14 हजार वोट अधिक पाने में सफल रहे थे। इसी तरह बदनावर में भी भाजपा के अधिकृत प्रत्याशी भंवर सिंह शेखावत के खिलाफ राजेश अग्रवाल बागी हो गए थे, जिससे 2018 में कांग्रेस प्रत्याशी राजवर्धन सिंह दत्तीगांव की जीत का रास्ता खुल गया था। बाद में कमलनाथ सरकार को गिराने वाले विधायकों के समूह का हिस्सा बन गए थे। हालांकि बागी राजेश अग्रवाल की बगावत में शेखावत ने कैलाश विजयवर्गीय पर अग्रवाल को हर तरह से मदद करने के आरोप तक लगाए गए थे और अभी एक साल पहले राजेश अग्रवाल को नागरिक आपूर्ति निगम का उपाध्यक्ष बना दिया गया है।
टिकटों को लेकर होता रहा टकराव
निमाड़ में पीसीसी के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव और उनके विरोधियों के बीच यहां टिकट वितरण को लेकर टकराव होता रहा है। खासतौर पर खरगोन जिले में वे अपने विरोधियों को टिकट दिए जाने के खिलाफ दिखते रहे हैं। पार्टी में उनके विरोधी माने जाने वाले रवि जोशी व सुरेंद्र सिंह शेरा समय- समय पर उनकी मुखालफत भी करते रहे हैं।
भाजपा के लिए गढ़ रहा निमाड़
पिछले पांच चुनाव के परिणामों से यह क्षेत्र भाजपा का गढ़ बन चुका है। लेकिन 2018 में यहां से कांग्रेस को मिली सफलता से यह मिथक भी टूट गया था। खंडवा की हरसूद, खंडवा, पंधाना, बड़वानी, धार सीटें पांच या चार जीतकर भाजपा का यहां वर्चस्व दिखने लगा था। पांच में से तीन बार अपने पक्ष में परिणाम करने वाली सीटों में भी भाजपा ने कांग्रेस को हारने पर मजबूर कर रखा है। मगर इस क्षेत्र में आदिवासी युवाओं के संगठन जयस का प्रभाव बीते एक दशक में धीरे-धीरे बढ़ा है और पढ़े लिखे आदिवासी समाज में उसकी पकड़ के चलते राजनीतिक दलों से वे सवाल जवाब करने लगे हैं। जयस को कांग्रेस की बी टीम भी कहा जाता है और 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने इसके नेता डॉ. हीरालाल अलावा को टिकट देकर संगठन का सपोर्ट हासिल भी किया था।