केंद्र ने ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान के बराबर दर्जा, बाधा डालने को दंडनीय बनाने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंज़ूर संशोधन संसद पारित हो जाने के बाद ‘वंदे मातरम’ के गायन के दौरान किसी भी प्रकार की बाधा, अशांति या अनादरपूर्ण कृत्य पर जुर्माना और तीन वर्ष तक की कारावास की सज़ा हो सकती है – ठीक वैसे ही, जैसे कि राष्ट्रगान के संबंध में प्रावधान हैं.

नई दिल्ली: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है, जिसके तहत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के बराबर का दर्जा दिया जाएगा; इसे ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971’ में शामिल किया गया है.

एक बार संसद द्वारा संशोधन पारित हो जाने के बाद ‘वंदे मातरम’ के गायन के दौरान किसी भी प्रकार की बाधा, अशांति या अनादरपूर्ण कृत्य पर जुर्माना और तीन वर्ष तक की कारावास की सज़ा हो सकती है – ठीक वैसे ही, जैसे कि राष्ट्रगान के संबंध में प्रावधान हैं.

यह निर्णय गृह मंत्रालय के उस आदेश के कुछ महीनों बाद आया है, जिसमें ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों को आधिकारिक कार्यक्रमों में बजाने का निर्देश दिया गया था. 28 जनवरी को जारी इस आदेश में यह भी कहा गया था कि यदि ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ दोनों एक साथ प्रस्तुत किए जाएं, तो पहले ‘वंदे मातरम’ बजाया जाए और श्रोताओं को पूरे समय सावधान की मुद्रा में खड़ा रहना होगा.

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस संशोधन का समय काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मोदी सरकार द्वारा इस गीत को लेकर मनाए जा रहे साल भर चलने वाले समारोहों के साथ मेल खाता है. इसके अलावा, यह संशोधन भारतीय जनता पार्टी की पश्चिम बंगाल में हुई ऐतिहासिक चुनावी जीत के ठीक बाद आया है.

1971 का कानून देश के राष्ट्रीय प्रतीकों- जिनमें राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीक-चिह्न, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय आदर्श वाक्य, संविधान और भारत का नक्शा शामिल हैं – के अपमान या अनादर पर सख्त नियम निर्धारित करता है. इन नियमों में एक निर्धारित अवधि और यह अनिवार्यता भी शामिल है कि उस समय उपस्थित सभी लोग सावधान की मुद्रा में खड़े हों. अब, प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य ऐसे ही प्रावधानों को राष्ट्रीय गीत पर भी लागू करना है.

बंकिम चंद्र चटर्जी ने 19वीं सदी के आखिर में संस्कृत-मिश्रित बंगाली में ‘वंदे मातरम’ लिखा था. इसके मूल संस्करण में छह छंद थे. यह गीत सबसे पहले उनके उपन्यास ‘आनंद मठ’ में शामिल किया गया था; इस उपन्यास की कहानी 18वीं सदी के आखिर के उस दौर पर आधारित है, जब बंगाल में अकाल और विद्रोह ने भारी तबाही मचाई थी.

1950 में ‘जन गण मन’ के साथ-साथ ‘वंदे मातरम’ को भी राष्ट्रीय गीत का सम्मान प्राप्त हुआ. यह निर्णय संविधान सभा द्वारा राजेंद्र प्रसाद के मार्गदर्शन में लिया गया था, जिसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इस गीत द्वारा निभाई गई ऐतिहासिक भूमिका को ध्यान में रखा गया था.

हालांकि, इस गीत के केवल पहले दो छंदों को ही राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया गया था. राष्ट्रगान के विपरीत, अब तक ‘वंदे मातरम’ के गायन या प्रस्तुति के लिए कोई आधिकारिक प्रोटोकॉल नहीं था.