26 साल पुराना पेंशन विवाद खत्म करने की तैयारी

महंगाई राहत के लिए अब हर बार नहीं लेनी पड़ेगी छत्तीसगढ़ की मंजूरी

भोपाल/मंगल भारत। मध्यप्रदेश के लाखों पेंशनर्स को महंगाई राहत (डीआर) के भुगतान में होने वाली देरी से जल्द राहत मिल सकती है। राज्य सरकार ने 26 साल पुराने उस प्रशासनिक विवाद को खत्म करने की पहल की है, जिसके कारण हर बार महंगाई राहत बढ़ाने से पहले छत्तीसगढ़ सरकार की सहमति लेनी पड़ती है। मध्यप्रदेश के वित्त विभाग ने छत्तीसगढ़ सरकार को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि कर्मचारियों और पेंशनर्स का विभाजन पूरी तरह हो चुका है, इसलिए डीआर वृद्धि के लिए बार-बार मंजूरी लेने की कोई वैधानिक आवश्यकता नहीं है।
मप्र सरकार ने छत्तीसगढ़ से इस मामले में एकमुश्त स्थायी सहमति देने का आग्रह किया है, ताकि भविष्य में हर छह महीने पर होने वाले पत्राचार और मंजूरी की प्रक्रिया को समाप्त किया जा सके। वर्तमान व्यवस्था में जब भी केंद्र या राज्य सरकार महंगाई राहत बढ़ाती है, तब मध्यप्रदेश को अपने पेंशनर्स को बढ़ी हुई राहत देने से पहले छत्तीसगढ़ सरकार की सहमति का इंतजार करना पड़ता है। कई बार यह प्रक्रिया महीनों तक लंबित रहती है, जिससे पेंशनर्स को समय पर लाभ नहीं मिल पाता। यदि छत्तीसगढ़ सरकार स्थायी सहमति दे देती है, तो मध्यप्रदेश अपने कर्मचारियों की तरह पेंशनर्स को भी तत्काल डीआर का लाभ दे सकेगा।
धारा-49 का दिया हवाला
मध्यप्रदेश ने अपने पत्र में मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम-2000 की धारा-49 का उल्लेख करते हुए कहा है कि कानून में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि महंगाई राहत में हर वृद्धि के लिए दोनों राज्यों की अलग-अलग सहमति आवश्यक होगी। राज्य विभाजन के समय पेंशन संबंधी वित्तीय देनदारियों का बंटवारा पहले ही तय कर दिया गया था। इसके अनुसार कुल देनदारी का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा मध्यप्रदेश और 25 प्रतिशत हिस्सा छत्तीसगढ़ वहन करता है। ऐसे में महंगाई राहत के लिए बार-बार अनुमति लेने की बाध्यता तर्कसंगत नहीं है। वित्त विभाग का कहना है कि जिस राज्य के कर्मचारी सेवानिवृत्त हुए हैं अथवा जिस राज्य को आवंटित किए गए हैं, उनकी पेंशन और उससे जुड़े भुगतान की जिम्मेदारी उसी राज्य की होनी चाहिए। वित्तीय हिस्सेदारी पहले से निर्धारित होने के कारण महंगाई राहत भुगतान के लिए अलग से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है।
अब छत्तीसगढ़ के फैसले पर निगाह
मध्यप्रदेश ने गेंद अब छत्तीसगढ़ सरकार के पाले में डाल दी है। यदि छत्तीसगढ़ कैबिनेट इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है, तो भविष्य में महंगाई राहत बढ़ाने के लिए किसी अतिरिक्त सहमति की आवश्यकता नहीं रहेगी और लाखों पेंशनर्स को समय पर लाभ मिल सकेगा। गौरतलब है कि राज्य पुनर्गठन के बाद पेंशन देनदारी 75:25 के अनुपात में बंटी। डीआर बढ़ाने से पहले दोनों राज्यों की सहमति लेने की परंपरा बनी। लेकिन मप्र के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि छत्तीसगढ़ से मंजूरी आने में कई बार महीनों लग जाते हैं। इस कारण पेंशनर्स को बढ़ी हुई महंगाई राहत समय पर नहीं मिल पाती। ऐसे में मप्र का प्रस्ताव है कि स्थायी सहमति देकर प्रक्रिया को सरल बनाया जाए। हर बार अनुमति लेने की बाध्यता समाप्त हो। इससे फायदा यह होगा कि लाखों पेंशनर्स को समय पर डीआर मिलेगा। प्रशासनिक देरी और पत्राचार की प्रक्रिया खत्म होगी। उम्मीद की जा रही है कि अब 26 साल पुराने विवाद का स्थायी समाधान निकल सकता है। यदि छत्तीसगढ़ सरकार इस प्रस्ताव पर सहमत हो जाती है तो वर्ष 2000 में राज्य विभाजन के बाद से चला आ रहा महंगाई राहत का विवाद पहली बार स्थायी रूप से समाप्त हो सकता है, जिससे मध्यप्रदेश के लाखों पेंशनर्स को सीधे लाभ मिलेगा।