एक ओर तृणमूल कांग्रेस के बाग़ी सासंदों के नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया पार्टी में विलय की ख़बरें ज़ोर पकड़ रही हैं. वहीं, दूसरी ओर एनसीपीआई के नेतृत्व और विलय की स्थिति को लेकर असमंजस की स्थिति नज़र आ रही है. पार्टी के नेताओं और पदाधिकारियों का कहना है कि उन्हें इस विलय की कोई जानकारी ही नहीं है.

नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसदों ने बीते दिनों घोषणा की थी कि वे नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय करेंगे. इस ख़बर के एक दिन बाद ही एनसीपीआई के नेतृत्व और विलय की स्थिति के साथ ही यह कैसे और क्यों हो रहा है, इस बारे में काफी भ्रम की स्थिति नज़र आई.
इस संबंध में पार्टी की अध्यक्ष शेवली कुंडू ने द वायर को बताया कि उन्होंने लगभग एक महीने पहले ही इस्तीफा दे दिया था. वहीं, पार्टी के दो अन्य पदाधिकारियों का कहना है कि उन्हें इन घटनाक्रमों की कोई जानकारी नहीं है, जबकि लोकसभा की चौथी सबसे बड़ी पार्टी के ज़्यादातर सांसद एनसीपीआई में विलय करने की तैयारी कर रहे हैं.
कुंडू ने फोन पर द वायर से कहा, ‘मैं अब अध्यक्ष नहीं हूं क्योंकि मैंने लगभग 20-30 दिन पहले इस्तीफ़ा दे दिया था.’
इस पर जब उनसे पूछा गया कि क्या इस्तीफ़े से पहले उन्हें टीएमसी के बागी नेताओं के साथ विलय के बारे में पता था, तो कुंडू ने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी. वहीं, नए अध्यक्ष की जानकारी को लेकर भी उन्होंने जवाब दिया कि ‘अभी इसका खुलासा नहीं किया जा सकता.’
मालूम हो कि इससे पहले द वायर ने रिपोर्ट किया था कि विलय के ज़मीनी स्तर पर लागू होने से पहले ही एनसीपीआई के अंदर असंतोष की बातें सामने आने लगी थीं. पार्टी के संगठन सचिव शांतनु डे ने द वायर से कहा था कि पार्टी को टीएमसी छोड़कर आने वाले नेताओं का स्वागत नहीं करना चाहिए.
डे ने कहा था, ‘अगर पार्टी का भाजपा के साथ विलय होता, तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होती. हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सम्मान करते हैं और पहले भी भाजपा का समर्थन कर चुके हैं. लेकिन ये टीएमसी नेता… आप जानते हैं कि भ्रष्टाचार के मामले में इनका रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है – शारदा, नारदा, इन सभी मामलों में इनके नाम शामिल हैं.’
भ्रम की स्थिति
वहीं, कुंडू जो सोशल मीडिया पर खुद को पत्रकार, आईएसओ ऑडिटर, ‘नो प्रॉब्लम लॉ पॉइंट’ नाम की लॉ कंपनी की पार्टनर और गणित की पूर्व शिक्षिका बताती हैं, ने सोमवार को द वायर से कहा कि डे अब संगठन सचिव नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि उन्हें पार्टी में सिर्फ़ 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनावों के दौरान ज़िम्मेदारियां दी गई थीं और हो सकता है कि वह अब सदस्य भी न हों.
हालांकि, डे ने सोमवार को द वायर से कहा कि पार्टी के संविधान के अनुसार, राष्ट्रीय समिति के सदस्य चार साल तक अपने पद पर बने रहेंगे.
उन्होंने कहा, ‘पार्टी के संविधान के मुताबिक, राष्ट्रीय समिति के सदस्यों का कार्यकाल चार साल का होता है. इस लिहाज से मैं अभी भी संगठन सचिव हूं. वे ऐसे अध्यक्ष बदल रहे हैं जैसे यह कोई निजी कंपनी हो.’
पार्टी सदस्यों ने यह भी कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि विलय को लेकर क्या हो रहा है.
द वायर से बात करते हुए राज्य युवा महासचिव तिताश भट्टाचार्य ने कहा, ‘हममें से किसी को भी साफ़ तौर पर नहीं पता कि क्या हो रहा है और यह विलय कैसे हो रहा है. हमें इसकी जानकारी सिर्फ़ मीडिया से मिल रही है और हमें यह भी साफ़ तौर पर नहीं पता कि यह विलय कैसे हुआ.’
‘पार्टी सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं होती, यह एक संगठन है, कोई निजी संस्था नहीं. उन्होंने किस आधार पर इस्तीफ़ा दिया, क्या हुआ, और यह विलय कैसे हो रहा है—इन सब बातों के बारे में हमें बिल्कुल भी जानकारी नहीं है. हमें खुशी है कि हम एक बड़े मंच का हिस्सा बनेंगे, लेकिन पूरी प्रक्रिया साफ़ नहीं है कि चीज़ें कैसे हुईं.’
उन्होंने आगे कहा, ‘यह पार्टी उन कार्यकर्ताओं की वजह से है जो इसे लोगों तक ले गए और त्रिपुरा में ज़मीनी स्तर पर काम किया. इसलिए हम यह समझने और इस पर चर्चा करने की कोशिश कर रहे हैं कि बिना किसी बातचीत के यह सब कैसे हो गया.’
द वायर ने उपाध्यक्ष उत्तियो कुंडू से फोन और वॉट्सऐप के ज़रिए भी संपर्क किया है.
मालूम हो कि इससे पहले द वायर ने रिपोर्ट किया था कि हावड़ा में एनसीपीआई का पंजीकृत दफ्तर, ‘जागो बिस्वा’ नाम के एक ई-अख़बार और सोशल ट्रस्ट के दफ्तर के तौर पर भी काम करता है.
उत्तीयो कुंडू समानांतर संगठन ‘जागो बिस्वा’ को चलाते हैं और खुद को गणितज्ञ, लॉ फर्म पार्टनर, आईएसओ ऑडिटर, समाज सेवक, नेचुरोपैथ और योग व नेचुरोपैथी में डिप्लोमा धारक बताते हैं.
उल्लेखनीय है कि रविवार (14 जून) को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात के बाद बागी टीएमसी सांसदों को एनसीपीआई में मिलाने का ऐलान काकोली घोष दस्तीदार ने किया था. वह पिछले महीने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद हुए संसदीय विद्रोह की मुख्य सूत्रधारों में से एक हैं.
दस्तीदार को एनसीपीआई का अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर अटकलें सामने आने के बाद लोकसभा सांसद ने द वायर से कहा कि उन्हें इस बारे में ‘कोई जानकारी नहीं’ है.
एनसीपीआई में विलय के फैसले- जो अयोग्य ठहराए जाने की कानूनी अड़चन से बचने की एक कोशिश लगती है – की घोषणा रविवार को दस्तीदार ने की थी.
उन्होंने दावा किया कि बागी गुट को टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 का समर्थन हासिल है और वे एनसीपीआई में विलय करके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का समर्थन करेंगे.
द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पार्टी 2022 के आखिर में बनी और 2023 में पंजीकृत हुई थी. इसने सिर्फ़ 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में तीन सीटों पर चुनाव लड़ा है. यह पार्टी पश्चिम बंगाल के हावड़ा में पंजीकृत है, लेकिन इसने उस राज्य में कोई चुनाव नहीं लड़ा है.
एनसीपीआई के फेसबुक पेज पर 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के कैंपेन पोस्टर्स में लिखा है: ‘राजनीतिक दल बदलने वालों को नकारकर अपने अधिकारों की रक्षा करें. राजनेताओं का नहीं, बल्कि समाज सेवकों का साथ दें.’