क्यों राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में मोदी और भाजपा जवाबदेही से बच नहीं सकते

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला अब केवल आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रह गया है. यह भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक विश्वसनीयता, राम मंदिर से जुड़ी उनकी भूमिका, ट्रस्ट की जवाबदेही और हिंदुत्व की राजनीति पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला, जिसकी जांच उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) और राज्य पुलिस कर रही है, अब बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए इस मामले से खुद को अलग दिखाना बेहद मुश्किल साबित हो रहा है.

हालिया सर्वेक्षणों, जैसे कि सी-वोटर के एक सर्वे, से पता चलता है कि एनडीए के 53.7 प्रतिशत मतदाताओं का मानना है कि इस चोरी से उनका भरोसा प्रभावित हुआ है. श्रद्धालु इस घटना को केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था के साथ हुए गंभीर विश्वासघात के रूप में देख रहे हैं. इसका सीधा असर भाजपा के सबसे वफादार मतदाता आधार पर पड़ता दिखाई दे रहा है.

चूंकि भाजपा ने राम मंदिर के निर्माण और उससे जुड़े प्रतीकों को पूरी तरह अपनी राजनीतिक पहचान से जोड़ दिया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इस धार्मिक परियोजना का पूरा श्रेय लिया था, इसलिए अब मंदिर के भीतर कुछ भी गलत होने पर उससे जुड़ी जवाबदेही और आरोपों से भी वे बच नहीं सकते. खासकर तब, जब चोरी का आरोप उन लोगों पर लगा हो, जिन्हें स्वयं मोदी ने इस परियोजना के संचालन के लिए चुना था.

यहां छह ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए राम मंदिर में हुई चढ़ावे की चोरी के मामले से खुद को अलग दिखाना मुश्किल हो रहा है.

1. राम मंदिर भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है, सिर्फ एक धार्मिक परियोजना नहीं

राम मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक परियोजना नहीं है, बल्कि भाजपा और व्यापक संघ परिवार की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि और पहचान का प्रतीक है. राम जन्मभूमि आंदोलन के दम पर ही भाजपा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंची और मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसकी सबसे प्रमुख शख्सियत थे.

मोदी ने बार-बार राम मंदिर के निर्माण का पूरा श्रेय स्वयं लिया और इसे उस सदियों पुराने वादे की पूर्ति के रूप में पेश किया, जिसके तहत 1992 में हिंदुत्व कार्यकर्ताओं द्वारा ढहाई गई बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने की बात कही जाती रही थी.

ऐसे में मंदिर परिसर के भीतर होने वाला कोई भी घोटाला या विवाद स्वतः भाजपा से जुड़ जाता है, क्योंकि यही वह प्रतीक है, जिसे पार्टी ने अपने चुनावी लाभ के लिए सबसे प्रभावी राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया.

2. मंदिर ट्रस्ट का गठन और नियुक्तियां सीधे मोदी सरकार ने कीं

प्रधानमंत्री मोदी इस विवाद को किसी स्थानीय या स्वतंत्र प्रशासनिक विफलता बताकर इससे पल्ला नहीं झाड़ सकते. श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, जो राम मंदिर के संचालन और उसकी वित्तीय व्यवस्था की देखरेख करता है, का गठन केंद्र सरकार ने किया था और इसके 15 में से 12 सदस्यों को सीधे केंद्र सरकार ने नामित किया था.

फरवरी 2020 में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं लोकसभा में इस ट्रस्ट के गठन की घोषणा की थी और यह माना जाता है कि ट्रस्ट के सदस्यों के चयन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.

ऐसे में स्वाभाविक रूप से जनता ट्रस्ट के सदस्यों की जवाबदेही को सीधे उस प्रधानमंत्री से जोड़कर देख रही है, जिन्होंने इस ट्रस्ट का गठन कराया और उसके सदस्यों की नियुक्ति की.

3. चंपत राय और मोदी के करीबी रिश्ते
यह विवाद सीधे उन लोगों तक पहुंचता है, जो भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े रहे हैं. श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, जिन्होंने हाल ही में नैतिक आधार पर अपने पद से इस्तीफा दिया, आरएसएस के वरिष्ठ नेता और विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के उपाध्यक्ष हैं. उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी सहयोगी भी माना जाता है.

इसके अलावा, चंपत राय के ड्राइवर की गिरफ्तारी और ट्रस्ट के अन्य प्रशासकों पर लगे आरोपों ने भाजपा के लिए यह कहना मुश्किल बना दिया है कि इस मामले में शामिल लोग संगठन से असंबद्ध या अलग-थलग व्यक्ति हैं.

इतना ही नहीं, बजरंग दल के संस्थापक और भाजपा नेता विनय कटियार भी सार्वजनिक रूप से ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों पर सवाल उठा चुके हैं. इससे यह विवाद भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के भीतर भी चर्चा और आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन गया है.

4. यह विवाद मोदी की तीन सबसे बड़ी राजनीतिक दावेदारियों पर चोट करता है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक छवि मुख्य रूप से तीन दावों पर टिकी रही है-

हिंदुत्व के सबसे बड़े संरक्षक होने का दावा, यानी हिंदू आस्था और पवित्र स्थलों के रक्षक के रूप में अपनी पहचान.
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का दावा, जिसके जरिए भाजपा खुद को परिवारवादी और भ्रष्ट दलों से अलग बताती रही है.
राष्ट्रवाद के नाम पर कुशल और प्रभावी शासन देने का दावा, जिसके तहत बेहतर प्रशासन और विकास को राष्ट्रवाद से जोड़कर पेश किया जाता है.
राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला इन तीनों दावों को एक साथ प्रभावित करता है. यह विवाद करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र रहे एक पवित्र धार्मिक स्थल में कथित कुप्रबंधन की ओर इशारा करता है. साथ ही, यह लंबे समय तक एक बेहद चर्चित परियोजना में व्यवस्थित भ्रष्टाचार की आशंका भी पैदा करता है और भाजपा के ‘स्वच्छ और कुशल शासन’ के दावे पर भी सवाल खड़े करता है.

यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए इस पूरे मामले को महज एक छोटी प्रशासनिक चूक बताकर खारिज कर देना आसान नहीं है.

5. श्रद्धालुओं के चढ़ावे की चोरी भाजपा के लिए नैतिक और राजनीतिक संकट

यह मामला दानपात्र से कुछ पैसे चोरी होने का नहीं है. जांच एजेंसियों के अनुसार, यह एक सुनियोजित गिरोह का काम था, जिसमें करीब 200 लोगों के शामिल होने का आरोप है. आरोप है कि यह गिरोह स्थानीय ज्वेलरों को दरकिनार करते हुए मंदिर में आए सोने-चांदी जैसे बहुमूल्य धातुओं को ट्रेन के जरिए कर्नाटक भेजता था, जहां उन्हें पिघलाया जाता था.

इतना ही नहीं, आरोप यह भी है कि इस गिरोह ने मंदिर के निम्न आय वर्ग के कर्मचारियों के लिए भेजे गए सर्दियों के जैकेटों से भरे ट्रकों को भी अपने कब्जे में ले लिया. आरोपित नेटवर्क का आकार और उसके काम करने का तरीका इतना व्यापक बताया जा रहा है कि सत्तारूढ़ भाजपा के लिए इसे महज एक छोटी प्रशासनिक चूक या लापरवाही बताकर टालना आसान नहीं है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मामला सरकारी धन या किसी कॉरपोरेट अनुबंध में कथित अनियमितता का नहीं, बल्कि आम श्रद्धालुओं के चढ़ावे और दान से जुड़ा है.

ऐसे में, जो पार्टी स्वयं को हिंदू आस्था और धर्म की सबसे बड़ी संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करती रही है, उसके लिए यह आरोप कि देश के नए बने राम मंदिर में श्रद्धालुओं का चढ़ावा ही कथित रूप से चोरी या दुरुपयोग का शिकार हुआ, राजनीतिक ही नहीं बल्कि गंभीर नैतिक संकट भी पैदा करता है..
6. मोदी की चुप्पी संदेह पैदा करती है

इस पूरे मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक चुप्पी को कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत विपक्षी दल लगभग रोज़ मुद्दा बना रहे हैं. उनका आरोप है कि भाजपा ने आस्था का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया, लेकिन जब भ्रष्टाचार के आरोप सामने आए तो वह चुप्पी साध गई.

वहीं, यदि मोदी या भाजपा इस मामले पर विस्तार से कोई बयान देते हैं, तो ट्रस्ट के धन के प्रबंधन, निगरानी व्यवस्था और आंतरिक जांच जैसे कई सवाल उठ खड़े हो सकते हैं, जिनकी दिशा और दायरे को पार्टी पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाएगी.

यही वजह है कि भाजपा एक ऐसे राजनीतिक जाल में फंसती दिखाई देती है, जहां चुप रहना मामले को दबाने की कोशिश जैसा लगता है, जबकि खुलकर बोलना मोदी के नेतृत्व में व्यवस्था की विफलता को स्वीकार करने जैसा प्रतीत हो सकता है.

प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मामला कुछ गिरफ्तारियों के साथ खत्म हो जाने वाली खबर नहीं है. यह उनकी अपनी राजनीतिक रणनीति और फैसलों से पैदा हुई एक संरचनात्मक राजनीतिक कमजोरी है, जिससे केवल चुप्पी साधकर बाहर नहीं निकला जा सकता.